खजाने का रहस्य - कन्हैयालाल Khajane Ka Rahasya - Hindi book by - Kanhaiyalal
लोगों की राय

उपन्यास >> खजाने का रहस्य

खजाने का रहस्य

कन्हैयालाल

ebook On successful payment file download link will be available
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
आईएसबीएन : 9781613013397 मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पृष्ठ :56 पुस्तक क्रमांक : 9702

Like this Hindi book 1 पाठकों को प्रिय

152 पाठक हैं

भारत के विभिन्न ध्वंसावशेषों, पहाड़ों व टीलों के गर्भ में अनेकों रहस्यमय खजाने दबे-छिपे पड़े हैं। इसी प्रकार के खजानों के रहस्य

एक

कुछ पुराने संकेतों की शोध करते समय पुरातत्व-वेत्ता डा. भास्कर को यह विदित हुआ कि भारत के विभिन्न ध्वंसावशेषों, पहाड़ों व टीलों के गर्भ में अनेकों रहस्यमय खजाने दबे-छिपे पड़े हैं।

बस फिर क्या था। उन्होंने तुरन्त अपना जीवन-लक्ष्य निश्चित कर लिया। मन-ही-मन संकल्प लिया कि वे इन खजानों की खोज करने में ही अपना जीवन खपा देंगे।

इस दुष्कर कार्य को सम्पन्न करने के लिए घनघोर परिश्रम, स्थिर- बुद्धि और सहनशीलता की जितनी आबश्यकता थी, उससे भी अधिक गोपनीयता भी जरूरी थी। फिर इस नीरस और कष्ट-साध्य कार्य के लिए किसी सहयोगी का होना भी परमाबश्यक था, निपट अकेले उनके बस का वह कार्य न था।

अस्तु शोध-कार्य समाप्त करते ही उन्होंने अपने सरीखे धुन-के-धनी. और साहसी सहयोगी की खोज शुरू कर दी। उस जोखिम-भरे और अनिश्चित लाभ के काम के लिए कोई साथी मिलना आसान न था। वे बहुत दिनों तक उचित सहयोगी के लिए भटकते रहे, किन्तु व्यर्थ! परन्तु एक कहाबत है- 'कमर बाँध करिये जो काम, निश्चित होंय सहायक राम।' इसी उक्ति से प्रेरणा लेकंर डॉ. भास्कर प्रयास करते ही रहे और उनकी निरंतर की जाने वाली साधना ने प्रभाव भी दिखाया - उन्हें माधव नामक एक सहयोगी मिल ही गया।

माधव की न केवल पुरातत्व के कार्यों में रुचि थी, बल्कि वह जीप- कार आदि गाड़ियाँ भी चलाना जानता था, साथ ही भोजन बनाना भी। डा. भास्कर के लिए उसका यह गुण सोने में सुगन्ध बन गया।

उन्होंने माधव से सम्पर्क होने के दूसरे दिन ही एक नयी जीप खरीद ली और उसे माधव को सौंपते हुए बोले- 'माधवजी, आपका सहयोग मिल जाने से मैं अपने कठिन कार्य में अवश्य सफल हो जाऊँगा, यह मेरे अन्तर्मन की आबाज है।'

अपनी प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती है? डी. भास्कर जैसे प्रकाण्ड विद्वान के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर माधव भी प्रसन्न होता हुआ बोला- 'डा. साहब, आप सरीखे विद्वान का साथ प्राप्त करना मेरे लिए भी गौरव की बात है। आप अपने उद्देश्य में सफल हों, यही मेरी कामना है।'

माधव के उत्तर से संतुष्ट होते हुए डा. साहब बोले- 'ठीक है बन्धु! मैं शीघ्र ही सबसे बड़े सम्भावित खजाने (अजयगढ़) की खोज के लिए भारत-सरकार से अनुमति लेने का प्रयास करूँगा।'

अवश्य, शीघ्र ही प्रयास करिए सर! पत्थरों से सिर खुजाने की मेरी अभिलाषा भी तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है।' माधव ने कहा। माधव की यह बात सुनकर डा. भास्कर मुस्कराकर बोले- 'शुरू- शुरू में बहुत-से लोगों की यही अभिलाषा रहती है। अभी पहाड़ों, टीलों की काल्पनिक सुखद यात्रा का भाव मन में बसा है, किन्तु जब यथार्थ का सामना करना पड़ेगा और ऐसे-ऐसे भयानक खण्डहरों - जिनमें सिवा चमगादड़ और उल्लुओं के, अन्य पक्षी भी बसेरा न लेते हों - से पाला पड़ेगा तो सारी चौकड़ी भूल जाओगे, बच्चू! तब सारा उत्साह ठण्डा पड़ जायगा।

'ऐसा नहीं होगा, डा. साहब! मैं रसिक प्रकृति का व्यक्ति नहीं हूँ। मुझे शुष्क बालू में भी प्रकृति की स्निग्ध तरलता के दर्शन होते हैं। मेरा मन नीरस स्थानों की यात्रा से भी उचटेगा नहीं।'

अन्य पुस्तकें

To give your reviews on this book, Please Login