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चन्द्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

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Vyakaran Pustak

चन्द्रकान्ता भाग 1

 

चन्द्रकान्ता: हिन्दी उपन्यास की आधारशिला
प्रेमचन्द-पूर्ववर्ती हिन्दी उपन्यास-साहित्य में दो प्रमुख धारायें प्रवाहित होती दिखाई देती हैं, जिनमें से प्रथम धारा भारतेन्दुयुगीन सुधारवादी नैतिकता प्रधान सामाजिक उपन्यासों की धारा है, जिसका प्रतिनिधित्व लाला श्रीनिवास दास के ‘परीक्षा गुरू’ में मिलता है, और उसकी दूसरी धारा जिसे तिलिस्मी-ऐयारी एवं जासूसी उपन्यास की संज्ञा प्राप्त है, उसके सर्वाधिक चर्चित लेखक बाबू देवकीनन्दन खत्री हैं, और उनकी कलम का जादू है ‘चन्द्रकान्ता’। हम यह निस्संकोच रूप से मानकर चले हैं कि प्रेमचन्द-पूर्ववर्ती उपन्यासकारों में बाबू देवकीनन्दन खत्री सर्वाधिक लोकप्रिय कथाकार हैं और ‘चन्द्रकान्ता’ उनकी प्रथम मौलिक औपन्यासिक सर्जना होते हुए भी उनकी कीर्ति का आधार-स्तम्भ बन गयी है। इसे इन्होंने ‘तिलिस्मी ऐयारी’ उपन्यास का अभिधान दिया है। हिन्दी की यही एकमात्र मात्र ऐसी औपन्यासिक रचना है जिसने तत्कालीन जन साधारण में उपन्यास पढ़ने की प्रवृत्ति जाग्रत की तथा असंख्य निरक्षर उर्दूदां लोगों को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित किया। यदि यह कहा जाये कि इसी रचना ने पहली बार हिन्दी पाठकों को कथारस से अवगत कराकर उन्हें अभिभूत कर लिया तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। अपने युग में (और बहुत बाद तक भी) ‘चन्द्रकान्ता’ का जादू इस प्रकार छाया रहा था कि लोग उपन्यास को उपन्यास न कहकर ‘चन्द्रकान्ता’ कहने लगे थे। जैसे मध्यकालीन भावुक भक्त कवि ‘रसखान’ अपने सवैयों की सरसता और मधुरता के कारण ‘सवैये’ के पर्याय बन गये थे, उसी प्रकार ‘चन्द्रकान्ता’ उपन्यास अपने कथा-रस के कारण ‘उपन्यास’ का समानक लगने लगा था। एक अविच्छिन्न, अजस्त्र और अद्भुत प्रवाह है इसके कथा विस्तार में, और अनन्त कौतूहल इसका प्राण है। भारतीय साहित्य संग्रह का जो कार्य पुस्तक.आर्ग ने सन् 2004 में आरंभ किया है, उसके कार्यकाल में अभी तक सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक भी चन्द्रकान्ता ही रही है। इसकी माँग हमारे पास अमेरिका, कनाडा, जापान, मलेशिया और यहाँ तक कि अफ्रीका में कार्यरत भारतीय करते रहे हैं। भारतवर्ष में तो इसकी लोकप्रियता पाठकों में है ही। पुस्तक.आर्ग इस पुस्तक का प्रथम भाग बेबसाईट पर पढ़ने के लिए उपलब्ध करवा रही है, और भविष्य में अन्य भागों और चन्द्रकान्ता सन्तति को भी उपलब्ध करवायेगी।

‘चन्द्रकान्ता’ (सन् 1888) को मूलत: और प्रमुखत: एक प्रेम-कथा कहा जा सकता है। चार हिस्सों में विभाजित इस उपन्यास की कथा अनायास ही हमें मध्यकालीन प्रेमाख्यानक काव्यों का स्मरण कराती है। इस प्रेम-कथा में अलौकिक और अतिप्राकृतिक तत्त्वों का प्राय: अभाव है और न ही इसे आध्यात्मिक रंग में रंगने का ही प्रयास किया गया है। यह शुद्ध लौकिक * प्रेम-कहानी है, जिसमें तिलिस्मी और ऐयारी के अनेक चमत्कार पाठक को चमत्कृत करते हैं। नौगढ़ के राजा सुरेन्द्रसिंह के पुत्र वीरेन्द्रसिंह तथा विजयगढ़ के राजा जयसिंह की पुत्री चन्द्रकान्ता के प्रणय और परिणय की कथा उपन्यास की प्रमुख कथा है। इस प्रेम कथा के साथ-साथ ऐयार तेजसिंह तथा ऐयारा चपला की प्रेम-कहानी भी अनेकत्र झलकती है। विजयगढ़ के दीवान कुपथसिंह का पुत्र क्रूरसिंह इस उपन्यास का खलनायक है। वह राजकुमारी को हथियाने के लिए अनेक षड्यन्त्र रचता है।

नाज़िम और अहमद जैसे ऐयार उसके सहायक हैं परन्तु अपने कुकृत्यों के अनुरूप ही उसका अन्त हो जाता है। चुनार का राजा शिवदत्तसिंह भी असत् अथवा खल पात्रों की श्रेणी में आता है। वह भी क्रूरसिंह से प्रेरित होकर चन्द्रकान्ता की प्राप्ति का विफल प्रयत्न करता है। वह विजयगढ़ पर आक्रमण करता है, परन्तु नौगढ़ एवं विजयगढ़ के शासकों और वीरेन्द्रसिंह की वीरता तथा जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह आदि ऐयारों के प्रयत्न से परास्त होता है। इन ऐयारों की सहायता से वीरेन्द्रसिंह अनेक कठिनाइयों और बाधाओं का सामना करता हुआ तिलिस्म को तोड़ता है और चन्द्रकान्ता को मुक्त कराता है। इस तिलिस्म से उसे अपार सम्पदा प्राप्त होती है और वह चन्द्रकान्ता का पाणिग्रहण करता है। चपला तेजसिंह की परिणीता बनती है और चम्पा का देवीसिंह से विवाह होता है। हूण और मुगल आक्रमणकारियों के समय से भारत में नारियों का सम्मान कम हुआ और क्रमशः पर्दा प्रथा आदि कुरीतियाँ भारतीय जीवन पर अपना प्रभाव दिखाने लगीं कि आज के समय में सामान्य व्यक्ति पर्दा प्रथा को भारतीय देन समझता है। इस उपन्यास में भी कुछ मिश्रित प्रभाव दिखाई देता है। एक तरफ तो ऐयारी जैसा कार्य जिसमें काफी जोख़िम और साहस का प्रदर्शन करना होता है उसमें चपला, चम्पा तथा आगे के भागों में मनोरमा, गौहर आदि बढ़-चढ़कर भाग लेती बताईं गईं है, वहीं राज परिवार कभी-कभी इसी प्रथा का अभ्यास करते भी दिखे हैं।

देवकीनन्दन खत्री ने समसामयिक नीति-प्रधान उपन्यासों से भिन्न कौतूहल प्रधान ‘तिलिस्मी ऐयारी’ उपन्यास रचना की नयी दिशा को उद्घाटित करने का सफल प्रयास किया। ‘तिलिस्म’ अरबी का शब्द है, जिसका अर्थ है-‘ऐन्द्रजालिक रचना, गाड़े हुए धन आदि पर बनायी हुई सर्प आदि की भयावनी आकृति व दवाओं तथा लग्नों के मेल से बँधा हुआ यन्त्र’। ‘चन्द्रकान्ता’ के चौथे भाग के बीसवें बयान में ऐयार जीतसिंह जरूरत पड़ती थी तो वे बड़े-बड़े ज्योतिषी, नजूमी, वैद्य, कारीगर, तिलिस्म के सम्बन्ध में कहता है-‘‘तिलिस्मी वही शख्स तैयार करता है, जिसके पास बहुत माल-खजाना हो और वारिस न हो।...पुराने जमाने के राजाओं को जब तिलिस्मी बाँधने की आवश्यकता होती थी तब ज्योतिषी, कारीगर और तांत्रिक लोग इकट्ठे किये जाते थे। उन्हीं लोगों के कहे मुताबिक तिलिस्मी बाँधने के लिए जमीन खोदी जाती थी, उसी जमीन के अन्दर खजाना रखकर ऊपर तिलिस्मी इमारत बनायी जाती थी। उसमें ज्योतिषी, नजूमी, वैद्य, कारीगर और तांत्रिक लोग अपनी ताकत के मुताबिक उसके छिपाने की बंदिश करते थे मगर इसके साथ ही उस आदमी के नक्षत्र एवं ग्रहों का भी खयाल रखते थे, जिसके लिए वह खजाना रक्खा जाता था।’’

‘ऐयार’ शब्द भी अरबी का है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- धूर्त अथवा वेश या रूप बदलकर अनोखे काम करने वाला व्यक्ति। ‘ऐयार’ उसको कहते हैं जो हर एक फन जानता हो, शक्ल बदलना और दौड़ना उसके मुख्य काम हैं। ऐयारों के सम्बन्ध में खत्री जी ने ‘चन्द्रकान्ता’ की भूमिका में लिखा है- राजदरबारों में ऐयार भी नौकर होते थे जो कि हरफनमौला, यानी सूरत बदलना, बहुत-सी दवाओं का जानना, गाना-बजाना, दौड़ना, अस्त्र चलाना, जासूसों का काम करना, वगैरह बहुत-सी बातें जाना करते थे। जब राजाओं में लड़ाई होती थी तो ये लोग अपनी चालाकी से बिना खून बहाये व पलटनों की जाने गंवाये लड़ाई खत्म करा देते थे।’’ ’चन्द्रकान्ता’ में लेखक चुनार के बाहर के खण्डहर के तिलिस्म का वर्णन करता है, जहाँ काले पत्थर के खम्भे पर संगमरमर का बगुला है जो किसी के पास आते ही मुँह खोल लेता है और उसे उदरस्थ कर लेता है। चन्द्रकान्ता को यही बगुला निगल लेता है तथा वह तिलिस्म में कैद हो जाती है। उसकी सखी चपला का भी यही हाल होता है। इस तिलिस्म के विषय में एक सुर्ख पत्थर पर लिखा है-‘यह तिलिस्म है, इसमें फंसने वाला कभी बाहर नहीं निकल सकता। हाँ, अगर कोई इसको तोड़े तो सब कैदियों को छुड़ा ले और दौलत भी उसके हाथ लगे। तिलिस्म तोड़ने वाले के बदन में खूब ताकत भी होनी चाहिए, नहीं तो सारी मेहनत व्यर्थ है।’ इस तिलिस्म को तोड़ने की विधि भी एक पुस्तक में लिखी मिलती है, जिसका अर्थ तेजसिंह और ज्योतिषीजी रमल की सहायता से ज्ञात करते हैं। इस पुस्तक की प्राप्ति से वीरेन्द्रसिंह अपने ऐयार साथियों की मदद से अनेक कठिनाइयों, बाधाओं एवं संघर्षों का सामना करता हुआ तिलिस्म को तोड़ने में सफल होता है और चन्द्रकान्ता को मुक्त कराता है। उपन्यास के तीसरे और चौथे हिस्से में मुख्य रूप से इसी तिलिस्मी को तोड़ने की कथा रोचक, कौतूहल पूर्ण और अद्भुत वर्णन है। वनकन्या, सूरजमुखी आदि पात्रों का सृजन और उनके कार्य उपन्यास में रोचकता और कौतूहल की वृद्धि करते हैं। कौतूहल प्रेमी पाठकों को विशेषकर यह अंदाजा लगाने में भी काफी आनन्द आता है कि कब कौन सा ऐयार क्या करामात दिखा रहा है। कई पात्रों के चलते यह कार्य काफी चुनौती भरा बन जाता है। इसी श्रृंखला में भूतनाथ तो सबसे गूढ़ पात्र बन जाता है, यहाँ तक उसके चरित्र को सही प्रकार समझाने के लिए देवकीनन्दन खत्री जी को एक और 23 खण्डों का उपन्यास भूतनाथ लिखना पड़ गया। भूतनाथ और रोहतासमठ दोनों पुस्तकें पुस्तक.आर्ग के द्वारा उपलब्ध हैं।

ऐयारी प्रधान होने के कारण ‘चन्द्रकान्ता’ में ऐयारों की चालों, फनों और घात-प्रतिघातों का बड़ा ही सजीव, रोचक और चमत्कारिक वर्णन मिलता है। उपन्यास में कई ऐयार हैं। वीरेन्द्रसिंह के पक्ष के ऐयार हैं- जीतसिंह, तेजसिंह, और देवीसिंह। क्रूरसिंह के ऐयार हैं- अहमद और नाजिम। शिवदत्त के छ: ऐयार हैं- पण्डित बद्रीनाथ, चुन्नीलाल, रामनारायण, भगवानदत्त, पन्नालाल और घसीटासिंह। उनके पास रमल का ज्ञाता ज्योतिषी जगन्नाथ भी है। चपला और चम्पा ऐयारिनें हैं जो कि चन्द्रकान्ता के साथ रहती हैं। उपन्यास में इन ऐयारों के कार्य पाठकों को चमत्कृत और विस्मित करते हैं। कहीं ये सुंघनी सुंघाकर किसी को बेहोश कर देते हैं और कहीं लखलखा सुंघाकर होश में ले आते हैं। ऐयारी बटुआ इनके पास हमेशा रहता है और इसमें वे सभी आवश्यक सामग्री रखते हैं। जासूसी करने, लड़ने-भिड़ने, गाने-बजाने, नाचने आदि में ये कुशल होते हैं। ऐयारों के कार्य उपन्यास की कथा को मोड़ देते हैं। कहीं देवीसिंह साधू का वेष बनाकर तेजसिंह को सावधान करता है तो कहीं चपला और चम्पा की नकली लाशें हैं। कहीं वनकन्या और सूरजमुखी के करतब हैं, कहीं नकली चन्द्रकान्ता शिवदत्तसिंह से प्रेम प्रदर्शन करती है तो कहीं जालिमखाँ और आफतखाँ अपने-अपने ढंग से आफत और जुल्म ढाते हैं, जीतसिंह रहस्यमय रूप से साधु बाबा बन जाता है। सारे उपन्यास में इन ऐयारों के चमत्कारपूर्ण कार्य पाठक को मुग्ध और स्तम्भित करते हैं। इन ऐयारों की अपनी आचार-संहिता भी है, जिसका पालन करना वे अपना कर्तव्य मानते हैं। उपन्यास में वर्णित ऐयारों के घात-प्रतिघात विशाखदत्त के ‘मुद्राराक्षस’ में वर्णित चाणक्य और राक्षस के राजनीतिक दांव-पेचों का स्मरण करा देते हैं।

वस्तु-संगठन में उत्सुकता और कौतूहल की प्रधानता, पात्रों के सृजन में विविध क्षेत्रों से उनका चयन, बातचीत के संवाद, चुनार, विजयगढ़, नौगढ़ आदि की नदियों, तालाबों, बावड़ियों, खोहों, टीलों, खण्डहरों, पक्षियों, वृक्षों आदि का चित्रात्मक शैली में प्रकृति-चित्रण, युगीन परिस्थितियों का अप्रत्यक्ष रूप में अंकन, बोलचाल की सजीव भाषा, आदर्श चरित्रों की सर्जना द्वारा नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा आदि ‘चन्द्रकान्ता’ की कतिपय ऐसी विशेषतायें हैं; जो लेखक के जीवन अनुभव, कल्पना की विस्मयकारी उड़ान तथा कथा-निर्माण की अद्भुत क्षमता की परिचायक हैं। वस्तुत: तिलिस्म और ऐयारी के सूत्रों से गुंथी हुई प्रेम और रोमांस की यह औपन्यासिक कथा हिन्दी के घटना-प्रधान रोमांचक उपन्यासों की ऐसी शुभ शुरूआत थी, जिसने असंख्य पाठकों को हिन्दी भाषा का प्रेमी बना दिया और हिन्दी उपन्यास को दृढ़ आधारशिला प्रदान की।

-पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज (सांध्य)
-डॉ. रवेलचन्द आनन्द
-(दिल्ली विश्वविद्यालय)
-नेहरू नगर, नयी दिल्ली-110065
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शु्द्ध लौकिक उस वस्तु को कहते हैं जिसका आधार पूर्णतः लौकिक हो।


लेखक की ओर से

 

प्रथम संस्करण से आज तक हिन्दी उपन्यास में बहुत से साहित्य लिखे गये हैं जिनमें कई तरह की बातें व राजनीति भी लिखी गयी है, राजदरबार के तरीके एवं सामान भी जाहिर किये गये हैं, मगर राजदरबारों में ऐयार (चालाक) भी नौकर हुआ करते थे जो कि हरफनमौला, यानी सूरत बदलना, बहुत-सी दवाओं का जानना, गाना-बजाना, दौड़ना, अस्त्र चलाना, जासूसों का काम देना, वगैरह बहुत-सी बातें जाना करते थे। जब राजाओं में लड़ाई होती थी तो ये लोग अपनी चालाकी से बिना खून बहाये व पलटनों की जानें गंवाये लड़ाई खत्म करा देते थे। इन लोगों की बड़ी कदर की जाती थी। इसी ऐयारी पेशे से आजकल बहुरूपिये दिखाई देते हैं। वे सब गुण तो इन लोगों में रहे नहीं, सिर्फ शक्ल बदलना रह गया है, और वह भी किसी काम का नहीं। इन ऐयारों का बयान हिन्दी किताबों में अभी तक मेरी नजरों से नहीं गुजरा। अगर हिन्दी पढ़ने वाले इस आनन्द को देख लें तो कई बातों का फायदा हो। सबसे ज्यादा फायदा तो यह कि ऐसी किताबों को पढ़ने वाला जल्दी किसी के धोखे में न पड़ेगा। इन सब बातों का ख्याल करके मैंने यह ‘चन्द्रकान्ता’ नामक उपन्यास लिखा। इस किताब में नौगढ़ व विजयगढ़ दो पहाड़ी रजवाड़ों का हाल कहा गया है। उन दोनों रजवाड़ों में पहले आपस में खूब मेल रहना, फिर वजीर के लड़के की बदमाशी से बिगाड़ होना, नौगढ़ के कुमार वीरेन्द्रसिंह का विजयगढ़ की राजकुमारी चन्द्रकान्ता पर आशिक होकर तकलीफें उठाना, विजयगढ़ के दीवान के लड़के क्रूरसिंह का महाराज जयसिंह से बिगड़ कर चुनार जाना और चन्द्रकान्ता की तारीफ करके वहाँ के राजा शिवदत्तसिंह को उभाड़ लाना वगैरह। इसके बीच में ऐयारी भी अच्छी तरह दिखलाई गयी है, और ये राज्य पहाड़ी होने से इसमें पहाड़ी नदियों, दर्रों, भयानक जंगलों और खूबसूरत व दिलचस्प घाटियों का बयान भी अच्छी तरह से आया है।

मैंने आज तक कोई किताब नहीं लिखी है। यह पहला ही श्रीगणेश है, इसलिए इसमें किसी तरह की गलती या भूल का हो जाना ताज्जुब नहीं, जिसके लिए मैं आप लोगों से क्षमा माँगता हूँ, बल्कि बड़ी मेहरबानी होगी अगर आप लोग मेरी भूल को पत्र द्वारा मुझ पर जाहिर करेंगे। क्योंकि यह ग्रन्थ बहुत बड़ा है, आगे और छप रहा है, भूल मालूम हो जाने से दूसरी जिल्दों में उसका खयाल किया जायेगा।
[आषाढ़, संवत् 1944 वि] देवकीनन्दन खत्री

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