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हमारे पूज्य देवी-देवता

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15402
आईएसबीएन :9788131010860

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’देवता’ का अर्थ दिव्य गुणों से संपन्न महान व्यक्तित्वों से है। जो सदा, बिना किसी अपेक्षा के सभी को देता है, उसे भी ’देवता’ कहा जाता है...

श्रीहरि

अत्यंत प्राचीन काल की बात है। द्रविड़ देश में एक पांड्यवंशी राजा राज्य करते थे। उनका नाम था-इंद्रद्युम्न। वे भगवान की आराधना में ही अपना अधिक समय व्यतीत करते थे। यद्यपि उनके राज्य में सर्वत्र सुख-शांति थी, प्रजा प्रत्येक रीति से संतुष्ट थी तथापि राजा इंद्रद्युम्न अपना समय राजकार्य में कम ही दे पाते थे। वे कहते थे कि श्री भगवान ही मेरे राज्य की व्यवस्था करते हैं। अतः वे अपने इष्ट परम प्रभु की उपासना में ही दत्तचित्त रहते थे।

राजा इंद्रद्युम्न के मन में आराध्य-आराधना की लालसा उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई। इस कारण वे राज्य का त्याग कर मलय-पर्वत पर रहने लगे। उनका वेश तपस्वियों जैसा था। सिर के बाल बढ़कर जटा के रूप में हो गए थे। राजा इंद्रद्युम्न ने मौन व्रत धारण कर लिया था। वे प्रतिदिन स्नानादि से निवृत्त होकर निरंतर परब्रह्म परमात्मा की आराधना में तल्लीन रहते। उनके मन और प्राण भी श्रीहरि के चरण-कमलों के मधुकर बने रहते। इसके अतिरिक्त उन्हें जगत की कोई भी वस्तु नहीं सुहाती। उन्हें राज्य, कोष, प्रजा तथा पत्नी आदि किसी प्राणी या पदार्थ की स्मृति ही नहीं होती थी।

एक बार की बात है, राजा इंद्रद्युम्न प्रतिदिन की भांति स्नानादि से निवृत्त होकर सर्वसमर्थ प्रभु की उपासना में तल्लीन थे। उन्हें बाह्य जगत का तनिक भी ध्यान न था। संयोगवश उसी समय महर्षि अगस्त्य अपने समस्त शिष्यों के साथ वहां पहुंच गए। लेकिन न पाद्य, न अर्थ्य और न स्वागत ! मौनव्रती राजा इंद्रद्युम्न परमप्रभु के ध्यान में निमग्न थे। इससे महर्षि अगस्त्य कुपित हो गए। उन्होंने इंद्रद्युम्न को शाप दे दिया, ''इस राजा ने गुरुजनों से शिक्षा नहीं ग्रहण की है और अभिमानवश परोपकार से निवृत्त होकर मनमानी कर रहा है। ब्राह्मणों का अपमान करने वाला यह राजा हाथी के समान जड़बुद्धि है, इसलिए इसे घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।'' क्रुद्ध महर्षि अगस्त्य भगवद्भक्त इंद्रद्युम्न को शाप देकर चले गए। राजा इंद्रद्युम्न ने इसे श्री भगवान का मंगलमय विधान समझकर प्रभु के चरणों में सिर रख दिया।

क्षीराब्धि में दस सहस्र योजन लंबा, चौड़ा और ऊंचा त्रिकूट नामक एक पर्वत था। वह पर्वत अत्यंत सुंदर एवं श्रेष्ठ था। उस पर्वतराज त्रिकूट की तराई में ऋतुमान नामक भगवान वरुण का क्रीड़ा-कानन था। उसके चारों ओर दिव्य वृक्ष सुशोभित थे। वे वृक्ष सदा पुष्पों और फलों से लदे रहते थे। उसी क्रीड़ाकानन ऋतुमान के समीप पर्वतश्रेष्ठ त्रिकूट के गहन वन में हथिनियों के साथ एक अत्यंत शक्तिशाली और अमित पराक्रमी गजेंद्र रहता था।

एक बार की बात है। गजेंद्र अपने साथियों सहित तृषाधिक्य से व्याकुल हो गया। कमल की गंध से सुगंधित वायु को सूंघकर वह एक चित्ताकर्षक विशाल सरोवर के तट पर जा पहुंचा। गजेंद्र ने उस सरोवर के निर्मल, शीतल और मीठे जल में प्रवेश किया। पहले तो उसने जल पीकर अपनी तृषा बुझाई, फिर जल से स्नान कर अपना श्रम दूर किया। तत्पश्चात उसने जल क्रीड़ा आरंभ कर दी। वह अपनी सूंड़ में जल भरकर उसकी फुहारों से हथिनियों को स्नान कराने लगा। तभी अचानक गजेंद्र ने सूंड़ उठाकर चीत्कार की। पता नहीं किधर से एक मगर ने आकर उसका पैर पकड़ लिया था। गजेंद्र ने अपना पैर छुड़ाने के लिए पूरी शक्ति लगाई परंतु उसका वश नहीं चला, पैर नहीं छूटा। अपने स्वामी गजेंद्र को ग्राहग्रस्त देखकर हथिनियां, कलभ और अन्य गज अत्यंत व्याकुल हो गए। वे सूड उठाकर चिंघाड़ने और गजेंद्र को बचाने के लिए सरोवर के भीतरबाहर दौड़ने लगे। उन्होंने पूरी चेष्टा की लेकिन सफल नहीं हुए।

महर्षि अगस्त्य के शाप से राजा इंद्रद्युम्न ही गजेंद्र हो गए थे और गंधर्वश्रेष्ठ हुहू महर्षि देवल के शाप से ग्राह हो गए थे। वे भी अत्यंत पराक्रमी थे। संघर्ष चलता रहा। गजेंद्र स्वयं को बाहर खींचता और ग्राह गजेंद्र को भीतर खींचता। सरोवर का निर्मल जल गंदला हो गया था। कमल-दल क्षत-विक्षत हो गए। जल-जंतु व्याकुल हो उठे। गजेंद्र और ग्राह का संघर्ष एक सहस्र वर्ष तक चलता रहा। दोनों जीवित रहे। यह दृश्य देखकर देवगण चकित हो गए।

अंततः गजेंद्र का शरीर शिथिल हो गया। उसके शरीर में शक्ति और मन में उत्साह नहीं रहा परंतु जलचर होने के कारण ग्राह की शक्ति में कोई कमी नहीं आई। उसकी शक्ति बढ़ गई। वह नवीन उत्साह से अधिक शक्ति लगाकर गजेंद्र को खींचने लगा। असमर्थ गजेंद्र के प्राण संकट में पड़ गए। उसकी शक्ति और पराक्रम का अहंकार चूर-चूर हो गया। वह पूर्णतया निराश हो गया किंतु पूर्वजन्म की निरंतर भगवद् आराधना के फलस्वरूप उसे भगवत्स्मृति हो आई। उसने निश्चय किया, 'मैं कराल काल के भय से चराचर प्राणियों के शरण्य सर्वसमर्थ प्रभु की शरण ग्रहण करता हूं।' इस निश्चय के साथ गजेंद्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्तोत्र द्वारा परम प्रभु की स्तुति करने लगा।

गजेंद्र की स्तुति सुनकर सर्वात्मा सर्वदेव रूप श्रीहरि प्रकट हो गए। गजेंद्र को पीड़ित देख श्रीहरि देवमय गरुड़ पर आरूढ़ होकर अत्यंत शीघ्रता से उक्त सरोवर के तट पर पहुंचे। जब जीवन से निराश तथा पीड़ा से छटपटाते गजेंद्र ने हाथ में चक्र लिए गरुडारूढ़ श्रीहरि को तीव्रता से अपनी ओर आते देखा तो उसने कमल का एक सुंदर पुष्प अपनी सूंड़ में लेकर ऊपर उठाया और बड़े कष्ट से कहा, "नारायण! जगद्गुरो ! भगवान! आपको नमस्कार है।"

गजेंद्र को अत्यंत पीड़ित देखकर श्रीहरि गरुड़ की पीठ से कूद पड़े और गजेंद्र के साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर खींच लाए। इसके उपरांत श्रीहरि ने तुरंत अपने तीक्ष्ण चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेंद्र को मुक्त कर दिया।

ब्रह्मादि देवगण श्रीहरि की प्रशंसा करते हुए उनके ऊपर स्वर्गिक सुमनों की वृष्टि करने लगे। दुंदुभियां बज उठीं। गंधर्व नृत्य-गान करने लगे। सिद्ध और ऋषि-महर्षि परब्रह्म श्रीहरि का गुणानुवाद गाने लगे। ग्राह दिव्य शरीरधारी हो गया। उसने श्री भगवान के चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और भगवान के गुणों की प्रशंसा करने लगा।

श्रीहरि के मंगलमय वरद हस्त के स्पर्श से पापमुक्त होकर अभिशप्त हूहू गंधर्व ने प्रभु की परिक्रमा की और उनके त्रैलोक्य वंदित चरण-कमलों में प्रणाम कर अपने लोक चला गया। भगवान श्रीहरि ने गजेंद्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। गंधर्व, सिद्ध और देवगण उनकी लीला का गान करने लगे। गजेंद्र की स्तुति से प्रसन्न होकर सर्वात्मा एवं सर्वभूत स्वरूप श्रीहरि ने सबके समक्ष कहा, "प्यारे गजेंद्र! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल बुद्धि का दान करूंगा।"

तत्पश्चात श्रीहरि ने पार्षद रूप गजेंद्र को साथ लिया और गरुड़ारूढ़ होकर अपने दिव्य धाम के लिए प्रस्थित हो गए।

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