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गीता प्रेस, गोरखपुर >> शिव पुराण 4 - कोटिरुद्र संहिता

शिव पुराण 4 - कोटिरुद्र संहिता

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :812
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2081
आईएसबीएन :81-293-0099-0

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भगवान शिव की महिमा का वर्णन...


अध्याय १८

विन्ध्य की तपस्या, ओंकार में परमेश्वरलिंग के प्रादुर्भाव और उसकी महिमा का वर्णन

ऋषियों ने कहा- महाभाग सूतजी! आपने अपने भक्त की रक्षा करनेवाले महाकाल नामक शिवलिंग की बड़ी अद्‌भुत कथा सुनायी है। अब कृपा करके चौथे ज्योतिर्लिग का परिचय दीजिये- ओंकार-तीर्थ में सर्वपातकहारी परमेश्वर का जो ज्योतिर्लिग है उसके आविर्भाव की कथा सुनाइये।

सूतजी बोले- महर्षियो! ओंकारतीर्थ में परमेशसंज्ञक ज्योतिर्लिंग जिस प्रकार प्रकट हुआ, वह बताता हूँ; प्रेम से सुनो। एक समयकी बात है भगवान् नारद मुनि गोकर्ण नामक शिव के समीप जा बड़ी भक्ति के साथ उनकी सेवा करने लगे। कुछ काल के बाद वे मुनिश्रेष्ठ वहाँ से गिरिराज विन्ध्य पर आये और विन्ध्य ने वहाँ बड़े आदर के साथ उनका पूजन किया। मेरे यहाँ सब कुछ है कभी किसी बात की कमी नहीं होती है इस भाव को मन में लेकर विथ्याचल नारदजी के सामने खड़ा हो गया। उसकी वह अभिमानभरी बात सुनकर अहंकारनाशक नारद मुनि लंबी साँस खींचकर चुपचाप खड़े रह गये। यह देख विन्ध्य पर्वत ने पूछा- 'आपने मेरे यहाँ कौन-सी कमी देखी है? आपके इस तरह लंबी साँस खींचने का क्या कारण है?'

नारदजी ने कहा- भैया! तुम्हारे यहा सब कुछ है। फिर भी मेरु पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है। उसके शिखरों का विभाग देवताओं के लोकों में भी पहुँचा हुआ है। किंतु तुम्हारे शिखर का भाग वहाँ कभी नहीं पहुँच सका है।

सूतजी कहते हैं- ऐसा कहकर नारदजी वहाँ से जिस तरह आये थे, उसी तरह चल दिये। परंतु विन्ध्य पर्वत 'मेरे जीवन आदिको धिक्कार है' ऐसा सोचता हुआ मन-ही-मन संतप्त हो उठा। अच्छा, 'अब मैं विश्वनाथ भगवान् शम्भु की आराधनापूर्वक तपस्या करूँगा' ऐसा हार्दिक निश्चय करके वह भगवान् शंकर की शरण में गया। तदनन्तर जहाँ साक्षात् ओंकार की स्थिति है? वहाँ प्रसन्नतापूर्वक जाकर उसने शिव की पार्थिवमूर्ति बनायी और छ: मासतक निरन्तर शम्भु की आराधना करके शिव के ध्यान में तत्पर हो वह अपनी तपस्या के स्थान से हिलातक नहीं। विन्ध्याचल की ऐसी तपस्या देखकर पार्वतीपति प्रसन्न हो गये। उन्होंने विन्ध्याचल को अपना वह स्वरूप दिखाया, जो योगियों के लिये भी दुर्लभ है। वे प्रसन्न हो उस समय उससे बोले- 'विन्ध्य! तुम मनोवांछित वर मांगो। मैं भक्तों को अभीष्ट वर देनेवाला हूँ और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ।'

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