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गीता प्रेस, गोरखपुर >> शिव पुराण 4 - कोटिरुद्र संहिता

शिव पुराण 4 - कोटिरुद्र संहिता

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :812
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2081
आईएसबीएन :81-293-0099-0

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भगवान शिव की महिमा का वर्णन...


अध्याय ३१

रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग के आविर्भाव तथा माहात्म्य का वर्णन

सूतजी कहते हैं- ऋषियो! अब मैं यह बता रहा हूँ कि रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग पहले किस प्रकार प्रकट हुआ। इस प्रसंग को तुम आदरपूर्वक सुनो। भगवान् विष्णु के रामावतार में जब रावण सीताजी को हरकर लंका में ले गया, तब सुग्रीव के साथ अठारह पद्म वानरसेना लेकर श्रीराम समुद्रतट पर आये। वहाँ वे विचार करने लगे कि कैसे हम समुद्र को पार करेंगे और किस प्रकार रावण को जीतेंगे। इतने में ही श्रीराम को प्यास लगी। उन्होंने जल माँगा और वानर मीठा जल ले आये। श्रीराम ने प्रसन्न होकर वह जल ले लिया। तबतक उन्हें स्मरण हो आया कि 'मैंने अपने स्वामी भगवान् शंकर का दर्शन तो किया ही नहीं। फिर यह जल कैसे ग्रहण कर सकता हूँ?' ऐसा कहकर उन्होंने उस जल को नहीं पिया। जल रख देने के पश्चात् रधुनन्दन ने पार्थिव-पूजन किया। आवाहन आदि सोलह उपचारों को प्रस्तुत करके विधिपूर्वक बड़े प्रेम से शंकरजी की अर्चना की। प्रणाम तथा दिव्य स्तोत्रों द्वारा यत्नपूर्वक शंकरजी को संतुष्ट करके श्रीराम ने भक्तिभाव से उनसे प्रार्थना की।

श्रीराम बोले- उत्तम व्रत का पालन करने वाले मेरे स्वामी देव महेश्वर! आपको मेरी सहायता करनी चाहिये। आपके सहयोग के बिना मेरे कार्य की सिद्धि अत्यन्त कठिन है। रावण भी आपका ही भक्त है। वह सबके लिये सर्वथा दुर्जय है परंतु आपके दिये हुए वरदान से वह सदा दर्प में भरा रहता है। वह त्रिभुवन विजयी महावीर है। इधर मैं भी आपका दास हूँ, सर्वथा आपके अधीन रहनेवाला हूँ। सदाशिव! यह विचारकर आपको मेरे प्रति पक्षपात करना चाहिये।

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