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गीता प्रेस, गोरखपुर >> शिव पुराण 4 - कोटिरुद्र संहिता

शिव पुराण 4 - कोटिरुद्र संहिता

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :812
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2081
आईएसबीएन :81-293-0099-0

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भगवान शिव की महिमा का वर्णन...


तदनन्तर गौतमजी वहाँ उस परम दुर्लभ जल को पाकर विधिपूर्वक नित्य-नैमित्तिक कर्म करने लगे। उन मुनीश्वर ने वहाँ नित्य-होम की सिद्धि के लिये धान, जौ और अनेक प्रकार के नीवार बोआ दिये। तरह-तरह के धान्य, भांति-भांति के वृक्ष और अनेक प्रकार के फल-फूल वहाँ लहलहा उठे। यह समाचार सुनकर वहाँ दूसरे-दूसरे सहस्रों ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी तथा बहुसंख्यक जीव जाकर रहने लगे। वह वन इस भूमण्डल में बड़ा सुन्दर हो गया। उस अक्षय जल के संयोग से अनावृष्टि वहाँ के लिये दुःखदायिनी नहीं रह गयी। उस वन में अनेक शुभकर्मपरायण ऋषि अपने शिष्य, भार्या और पुत्र आदि के साथ वास करने लगे। उन्होंने कालक्षेप करने के लिये वहाँ धान बोआ दिये। गौतमजी के प्रभाव से उस वन में सब ओर आनन्द छा गया।

एक बार वहाँ गौतम के आश्रम में जाकर बसे हुए ब्राह्मणों की स्त्रियाँ जल के प्रसंग को लेकर अहल्या पर नाराज हो गयीं। उन्होंने अपने पतियों को उकसाया। उन लोगों ने गौतम का अनिष्ट करने के लिये गणेशजी की आराधना की। भक्तपराधीन गणेशजी ने प्रकट होकर वर माँगने के लिये कहा, तब ये बोले-'भगवन्! यदि आप हमें वर देना चाहते हैं तो ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे समस्त ऋषि डाँट-फटकार कर गौतम को आश्रम से बाहर निकाल दें।'

गणेशजी ने कहा- ऋषियो! तुम सब लोग सुनो। इस समय तुम उचित कार्य नहीं कर रहे हो। बिना किसी अपराध के उनपर क्रोध करने के कारण तुम्हारी हानि ही होगी। जिन्होंने पहले उपकार किया हो, उन्हें यदि दुःख दिया जाय तो वह अपने लिये हितकारक नहीं होता। जब उपकारी को दुःख दिया जाता है तब उससे इस जगत्‌ में अपना ही नाश होता है।

अपराध बिना तस. कुध्यर्ता हानिरेव च।।
उपस्कृर्त पुरा यैस्तु तेभ्यो दुःख हितै नहि।
यदा च दीयते दुःख तदा नाशो भवेदिह।।
(शि० पु० को० रु० सं० २५। १४-१५)

ऐसी तपस्या करके उत्तम फल की सिद्धि की जाती है। स्वयं ही शुभ फल का परित्याग करके अहितकारक फल को नहीं ग्रहण किया जाता। ब्रह्माजी ने जो यह कहा है कि असाधु कभी साधुताको और साधु कभी असाधुताको नहीं ग्रहण करता, यह बात निश्चय ही ठीक जान पड़ती है। पहले उपवासके कारण जब तुमलोगोंको दुःख भोगना पड़ा था, तब महर्षि गौतम ने जल की व्यवस्था करके तुम्हें सुख दिया। परंतु इस समय तुम सब लोग उन्हें दुःख दे रहे हो। संसार में ऐसा कार्य करना कदापि उचित नहीं। इस बात पर तुम सब लोग सर्वथा विचार कर लो। स्त्रियों की शक्ति से मोहित हुए तुमलोग यदि मेरी बात नहीं मानोगे तो तुम्हारा यह बर्ताव गौतम के लिये अत्यन्त हितकारक ही होगा, इसमें संशय नहीं है। ये मुनिश्रेष्ठ गौतम तुम्हें पुन: निश्चय ही सुख देंगे। अत: उनके साथ छल करना कदापि उचित नहीं। इसलिये तुमलोग कोई दूसरा वर माँगो।

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