रामचरितमानस अर्थात् रामायण(बालकाण्ड) - गोस्वामी तुलसीदास Ram Charit Manas Arthat Tulsi Ramayan(Bal Kand) - Hindi book by - Goswami Tulsidas
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रामचरितमानस अर्थात् रामायण(बालकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 1980
पृष्ठ :135
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2085
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गोस्वामी तुलसीदास कृत रामायण को रामचरितमानस के नाम से जाना जाता है। इस रामायण के पहले खण्ड - बालकाण्ड में गोस्वामी जी इस मनोहारी राम कथा के साथ-साथ तत्त्व ज्ञान के फूल भगवान को अर्पित करते चलते हैं।


विश्वमोहिनी का स्वयंवर, शिवगणों को तथा भगवान को शाप और नारद का मोह-भंग



दो०- बिरचेउ मग महँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।
श्रीनिवासपुर ते अधिक रचना बिबिध प्रकार॥१२९॥


उस (हरिमाया) ने रास्ते में सौ योजन (चार सौ कोस) का एक नगर रचा। उस नगरकी भाँति-भाँतिकी रचनाएँ लक्ष्मीनिवास भगवान विष्णुके नगर (वैकुण्ठ) से भी अधिक सुन्दर थीं। १२९ ॥

बसहिं नगर सुंदर नर नारी।
जनु बहु मनसिज रति तनुधारी॥
तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा।
अगनित हय गय सेन समाजा॥

उस नगरमें ऐसे सुन्दर नर-नारी बसते थे मानो बहुत-से कामदेव और [उसकी स्त्री] रति ही मनुष्य-शरीर धारण किये हुए हों। उस नगरमें शीलनिधि नामका राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेनाके समूह (टुकड़ियाँ) थे॥१॥

सत सुरेस सम बिभव बिलासा।
रूप तेज बल नीति निवासा॥
बिस्वमोहनी तासु कुमारी।
श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी॥

उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रोंके समान था। वह रूप, तेज, बल और नीतिका घर था। उसके विश्वमोहिनी नामकी एक [ऐसी रूपवती] कन्या थी, जिसके रूपको देखकर लक्ष्मीजी भी मोहित हो जायें ॥२॥

सोइ हरिमाया सब गुन खानी।
सोभा तासु कि जाइ बखानी॥
करइ स्वयंबर सो नृपबाला।
आए तहँ अगनित महिपाला॥


वह सब गुणों की खान भगवान की माया ही थी। उसकी शोभाका वर्णन कैसे किया जा सकता है। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इससे वहाँ अगणित राजा आये हुए थे॥३॥

मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ।
पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ॥
सुनि सब चरित भूपगृह आए।
करि पूजा नृप मुनि बैठाए॥


खिलवाड़ी मुनि नारदजी उस नगरमें गये और नगरवासियोंसे उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजाके महलमें आये। राजाने पूजा करके मुनिको [आसनपर] बैठाया।। ४॥

दो०- आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।
कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि॥१३०॥


[फिर] राजाने राजकुमारीको लाकर नारदजीको दिखलाया [और पूछा कि-] हे नाथ! आप अपने हृदयमें विचारकर इसके सब गुण-दोष कहिये। १३०॥

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी।
बड़ी बार लगि रहे निहारी॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने।
हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥

उसके रूपको देखकर मुनि वैराग्य भूल गये और बड़ी देरतक उसकी ओर देखते ही रह गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने आपको भी भूल गये और हृदयमें हर्षित हुए, पर प्रकटरूपमें उन लक्षणोंको नहीं कहा॥१॥

जो एहि बरइ अमर सोइ होई।
समरभूमि तेहि जीत न कोई॥
सेवहिं सकल चराचर ताही।
बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥

[लक्षणोंको सोचकर वे मनमें कहने लगे कि] जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायगा और रणभूमिमें कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधिकी कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे॥२॥

लच्छन सब बिचारि उर राखे।
कछुक बनाइ भूप सन भाषे॥
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं।
नारद चले सोच मन माहीं॥


सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदयमें रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया। राजासे लड़की के सुलक्षण कहकर नारदजी चल दिये। पर उनके मन में यह चिन्ता थी कि- ॥३॥

करौं जाइ सोइ जतन बिचारी।
जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी॥
जप तप कछु न होइ तेहि काला।
हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला॥


मैं जाकर सोच-विचारकर अब वही उपाय करूँ, जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इस समय जप-तपसे तो कुछ हो नहीं सकता। हे विधाता ! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी? ॥ ४॥

दो०- एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।
जो बिलोकि रीझै कुरि तब मेलै जयमाल॥१३१॥


इस समय तो बड़ी भारी शोभा और विशाल(सुन्दर)रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझपर रीझ जाय और तब जयमाल [मेरे गलेमें] डाल दे॥ १३१ ॥

हरि सन मागौं सुंदरताई।
होइहि जात गहरु अति भाई॥
मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ।
एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥

[एक काम करूँ कि] भगवानसे सुन्दरता माँगूं; पर भाई ! उनके पास जाने में तो बहुत देर हो जायगी। किन्तु श्रीहरिके समान मेरा हितू भी कोई नहीं है, इसलिये इस समय वे ही मेरे सहायक हों॥ १॥

बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला।
प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने।
होइहि काजु हिएँ हरषाने।


उस समय नारदजीने भगवानकी बहुत प्रकारसे विनती की। तब लीलामय कृपालु प्रभु [वहीं] प्रकट हो गये। स्वामीको देखकर नारदजीके नेत्र शीतल हो गये और वे मनमें बड़े ही हर्षित हुए कि अब तो काम बन ही जायगा ॥ २ ॥

अति आरति कहि कथा सुनाई।
करहु कृपा करि होहु सहाई॥
आपन रूप देहु प्रभु मोही।
आन भाँति नहिं पावौं ओही॥


नारदजीने बहुत आर्त (दीन) होकर सब कथा कह सुनायी [ और प्रार्थना की कि] कृपा कीजिये और कृपा करके मेरे सहायक बनिये। हे प्रभो! आप अपना रूप मुझको दीजिये और किसी प्रकार मैं उस (राजकन्या) को नहीं पा सकता॥३॥

जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा।
करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥
निज माया बल देखि बिसाला।
हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥

हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिये! मैं आपका दास हूँ। अपनी मायाका विशाल बल देख दीनदयालु भगवान मन-ही-मन हँसकर बोले- ॥ ४ ॥

दो०- जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार॥१३२॥

हे नारदजी! सुनो, जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, दूसरा कुछ नहीं। हमारा वचन असत्य नहीं होता ॥ १३२॥

कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी।
बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ।
कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥


हे योगी मुनि ! सुनिये. रोगसे व्याकुल रोगी कुपथ्य मांगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करनेकी ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान अन्तर्धान हो गये॥१॥

माया बिबस भए मुनि मूढ़ा।
समुझी नहिं हरि गिरा निगूढा॥
गवने तुरत तहाँ रिषिराई।
जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई।


[भगवानकी] मायाके वशीभूत हुए मुनि ऐसे मूढ़ हो गये कि वे भगवानकी अगूढ़ (स्पष्ट) वाणीको भी न समझ सके। ऋषिराज नारदजी तुरंत वहाँ गये जहाँ स्वयंवरकी भूमि बनायी गयी थी॥२॥

निज निज आसन बैठे राजा।
बहु बनाव करि सहित समाजा।।
मुनि मन हरष रूप अति मोरें।
मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें॥


राजालोग खूब सज-धजकर समाजसहित अपने-अपने आसनपर बैठे थे। मुनि (नारद) मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरेको न वरेगी ॥३॥

मुनि हित कारन कृपानिधाना।
दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा।
नारद जानि सबहिं सिर नावा॥

कृपानिधान भगवानने मुनिके कल्याणके लिये उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता; पर यह चरित कोई भी न जान सका। सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया ॥४॥

दो०- रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।
बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ॥१३३॥

वहाँ दो शिवजीके गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मणका वेष बनाकर सारी लीला देखते-फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे॥१३३॥

जेहिं समाज बैठे मुनि जाई।
हृदय रूप अहमिति अधिकाई॥
तहँ बैठे महेस गन दोऊ।
बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥


नारदजी अपने हृदयमें रूपका बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज (पंक्ति) में जाकर बैठे थे, ये शिवजीके दोनों गण भी वहीं बैठ गये। ब्राह्मणके वेषमें होनेके कारण उनकी इस चालको कोई न जान सका॥१॥

करहिं कूटि नारदहि सुनाई।
नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥
रीझिहि राजकुअरि छबि देखी।
इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥


वे नारदजीको सुना-सुनाकर व्यंग्य वचन कहते थे- भगवानने इनको अच्छी 'सुन्दरता' दी है। इनकी शोभा देखकर राजकुमारी रीझ ही जायगी और 'हरि' (वानर) जानकर इन्हींको खास तौर से वरेगी।। २।।।

मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ।
हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।
जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी।
समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥


नारद मुनिको मोह हो रहा था, क्योंकि उनका मन दूसरेके हाथ (मायाके वश) में था। शिवजीके गण बहुत प्रसन्न होकर हँस रहे थे। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रममें सनी हुई होनेके कारण वे बातें उनकी समझमें नहीं आती थीं (उनकी बातोंको वे अपनी प्रशंसा समझ रहे थे) ॥३॥

काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा।
सो सरूप नृपकन्याँ देखा।
मर्कट बदन भयंकर देही।
देखत हृदयँ क्रोध भा तेही॥

इस विशेष चरितको और किसीने नहीं जाना, केवल राजकन्याने [नारदजीका] वह रूप देखा। उनका बन्दरका-सा मुँह और भयंकर शरीर देखते ही कन्याके हृदयमें क्रोध उत्पन्न हो गया ॥ ४ ॥

दो०- सखीं संग लै कुअरि तब चलि जनु राजमराल।
देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल॥१३४॥

तब राजकुमारी सखियोंको साथ लेकर इस तरह चली मानो राजहंसिनी चल रही है। वह अपने कमल-जैसे हाथोंमें जयमाला लिये सब राजाओंको देखती हुई घूमने लगी॥१३४॥

जेहि दिसि बैठे नारद फूली।
सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली॥
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं।
देखि दसा हर गन मुसुकाहीं॥


जिस ओर नारदजी [रूपके गर्वमें ] फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका। नारद मुनि बार-बार उचकते और छटपटाते हैं। उनकी दशा देखकर शिवजीके गण मुसकराते हैं ॥१॥

धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला।
कुरि हरषि मेलेउ जयमाला॥
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा।
नृपसमाज सब भयउ निरासा॥


कृपालु भगवान भी राजाका शरीर धारण कर वहाँ जा पहुँचे। राजकुमारीने हर्षित होकर उनके गलेमें जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान दुलहिनको ले गये। सारी राजमण्डली निराश हो गयी ॥२॥

मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी।
मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥
तब हर गन बोले मुसुकाई।
निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥


मोहके कारण मुनिकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इससे वे [राजकुमारीको गयी देख] बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठसे छूटकर मणि गिर गयी हो। तब शिवजीके गणोंने मुसकराकर कहा-जाकर दर्पणमें अपना मुँह तो देखिये! ॥३॥

अस कहि दोउ भागे भय भारी।
बदन दीख मुनि बारि निहारी॥
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा।
तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥


ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे। मुनिने जलमें झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिवजीके उन गणोंको अत्यन्त कठोर शाप दिया ॥४॥

दो०- होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।
हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥१३५॥

तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनिको हँसी करना ॥१३५ ॥

पुनि जल दीख रूप निज पावा।
तदपि हृदय संतोष न आवा॥
फरकत अधर कोप मन माहीं।
सपदि चले कमलापति पाहीं॥


मुनिने फिर जलमें देखा, तो उन्हें अपना (असली) रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। उनके ओंठ फड़क रहे थे और मनमें क्रोध [भरा] था। तुरंत ही वे भगवान कमलापतिके पास चले ॥१॥

देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई।
जगत मोरि उपहास कराई।
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी।
संग रमा सोइ राजकुमारी।।


[मनमें सोचते जाते थे-] जाकर या तो शाप दूंगा या प्राण दे दूंगा। उन्होंने जगतमें मेरी हँसी करायी। दैत्योंके शत्रु भगवान हरि उन्हें बीच रास्तेमें ही मिल गये। साथमें लक्ष्मीजी और वही राजकुमारी थीं ॥२॥

बोले मधुर बचन सुरसाईं।
मुनि कहँ चले बिकल की नाईं।
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा।
माया बस न रहा मन बोधा॥

देवताओंके स्वामी भगवानने मीठी वाणीमें कहा-हे मुनि! व्याकुलकी तरह कहाँ चले? ये शब्द सुनते ही नारदको बड़ा क्रोध आया; मायाके वशीभूत होनेके कारण मनमें चेत नहीं रहा ॥३॥

पर संपदा सकहु नहिं देखी।
तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी॥
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु।
सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु॥


[मुनिने कहा-] तुम दूसरोंकी सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत है। समुद्र मथते समय तुमने शिवजीको बावला बना दिया और देवताओंको प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया ॥४॥

दो०- असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।
स्वारथ साधक कटिल तम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥१३६॥


असुरोंको मदिरा और शिवजीको विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर [कौस्तुभ] मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपटका व्यवहार करते हो॥१३६॥

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई।
भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू।
बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥


तुम परम स्वतन्त्र हो, सिरपर तो कोई है नहीं, इससे जब जो मनको भाता है, [स्वच्छन्दतासे] वही करते हो। भलेको बुरा और बुरेको भला कर देते हो। हृदयमें हर्ष-विषाद कुछ भी नहीं लाते॥१॥

डहकि डहकि परिचेहु सब काहू।
अति असंक मन सदा उछाहू॥
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा।
अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा।


सबको ठग-ठगकर परक गये हो और अत्यन्त निडर हो गये हो; इसीसे [ठगनेके काममें] मनमें सदा उत्साह रहता है। शुभ-अशुभ कर्म तुम्हें बाधा नहीं देते। अबतक तुमको किसीने ठीक नहीं किया था ॥ २ ॥

भले भवन अब बायन दीन्हा।
पावहुगे फल आपन कीन्हा॥
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा।
सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा॥


अबकी तुमने अच्छे घर बैना दिया है (मेरे-जैसे जबर्दस्त आदमीसे छेड़खानी की है)। अतः अपने कियेका फल अवश्य पाओगे। जिस शरीरको धारण करके तुमने मुझे ठगा है, तुम भी वही शरीर धारण करो, यह मेरा शाप है॥३॥

कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी।
करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी।
नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥


तुमने हमारा रूप बन्दरका-सा बना दिया था, इससे बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। [मैं जिस स्त्रीको चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर] तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इससे तुम भी स्त्रीके वियोगमें दु:खी होगे॥४॥

दो०- श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि ॥१३७॥


शापको सिरपर चढ़ाकर, हृदयमें हर्षित होते हुए प्रभुने नारदजीसे बहुत विनती की और कृपानिधान भगवानने अपनी मायाकी प्रबलता खींच ली॥१३७॥

जब हरि माया दूरि निवारी।
नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥
तब मुनि अति सभीत हरि चरना।
गहे पाहि प्रनतारति हरना।


जब भगवानने अपनी मायाको हटा लिया, तब वहाँ न लक्ष्मी ही रह गयीं, न राजकुमारी ही। तब मुनिने अत्यन्त भयभीत होकर श्रीहरिके चरण पकड़ लिये और कहा-हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिये॥१॥

मृषा होउ मम श्राप कृपाला।
मम इच्छा कह दीनदयाला॥
मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे।
कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे।।


हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाय। तब दीनोंपर दया करनेवाले भगवानने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा [से हुआ] है। मुनिने कहा-मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे? ॥२॥

जपहु जाइ संकर सत नामा।
होइहि हृदय तुरत बिश्रामा।
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें।
असि परतीति तजहु जनि भोरें॥


[भगवानने कहा-] जाकर शङ्करजीके शतनामका जप करो, इससे हृदयमें तुरंत शान्ति होगी। शिवजीके समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वासको भूलकर भी न छोड़ना ॥ ३॥

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी।
सो न पाव मुनि भगति हमारी॥
अस उर धरि महि बिचरहु जाई।
अब न तुम्हहि माया निअराई।


हे मुनि! पुरारि (शिवजी) जिसपर कृपा नहीं करते, वह मेरी भक्ति नहीं पाता। हृदयमें ऐसा निश्चय करके जाकर पृथ्वीपर विचरो। अब मेरी माया तुम्हारे निकट नहीं आवेगी॥४॥

दो०- बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥१३८॥


बहुत प्रकारसे मुनिको समझा-बुझाकर (ढाढ़स देकर) तब प्रभु अन्तर्धान हो गये और नारदजी श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान करते हुए सत्यलोक (ब्रह्मलोक) को चले॥१३८॥

हर गन मुनिहि जात पथ देखी।
बिगत मोह मन हरष बिसेषी॥
अति सभीत नारद पहिं आए।
गहि पद आरत बचन सुनाए।


शिवजीके गणोंने जब मुनिको मोहरहित और मनमें बहुत प्रसन्न होकर मार्गमें जाते हुए देखा तब वे अत्यन्त भयभीत होकर नारदजीके पास आये और उनके चरण पकड़कर दीन वचन बोले- ॥१॥

हर गन हम न बिप्र मुनिराया।
बड़ अपराध कीन्ह फल पाया।
श्राप अनुग्रह करहु कृपाला।
बोले नारद दीनदयाला॥

हे मुनिराज! हम ब्राह्मण नहीं हैं, शिवजीके गण हैं। हमने बड़ा अपराध किया, जिसका फल हमने पा लिया। हे कृपालु! अब शाप दूर करनेकी कृपा कीजिये। दीनोंपर दया करनेवाले नारदजीने कहा- ॥२॥

निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ।
बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥
भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ।
धरिहहिं बिनु मनुज तनु तहिआ॥


तुम दोनों जाकर राक्षस होओ; तुम्हें महान् ऐश्वर्य, तेज और बलकी प्राप्ति हो। तुम अपनी भुजाओंके बलसे जब सारे विश्वको जीत लोगे, तब भगवान विष्णु मनुष्यका शरीर धारण करेंगे॥३॥

समर मरन हरि हाथ तुम्हारा।
होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥
चले जुगल मुनि पद सिर नाई।
भए निसाचर कालहि पाई।


युद्धमें श्रीहरिके हाथसे तुम्हारी मृत्यु होगी, जिससे तुम मुक्त हो जाओगे और फिर संसारमें जन्म नहीं लोगे। वे दोनों मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर चले और समय पाकर राक्षस हुए।॥ ४॥

दो०- एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।
सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार॥१३९॥


देवताओंको प्रसन्न करनेवाले, सज्जनोंको सुख देनेवाले और पृथ्वीका भार हरण करनेवाले भगवानने एक कल्पमें इसी कारण मनुष्यका अवतार लिया था।। १३९।।

एहि बिधि जनम करम हरि केरे।
सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे।
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं।
चारु चरित नानाबिधि करहीं।

इस प्रकार भगवानके अनेकों सुन्दर, सुखदायक और अलौकिक जन्म और कर्म हैं। प्रत्येक कल्पमें जब-जब भगवान अवतार लेते हैं और नाना प्रकारकी सुन्दर लीलाएँ करते हैं, ॥ १॥

तब तब कथा मुनीसन्ह गाई।
परम पुनीत प्रबंध बनाई।
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने।
करहिं न सुनि आचरजु सयाने।


तब-तब मुनीश्वरोंने परम पवित्र काव्यरचना करके उनकी कथाओंका गान किया है और भाँति-भाँतिके अनुपम प्रसंगोंका वर्णन किया है, जिनको सुनकर समझदार (विवेकी) लोग आश्चर्य नहीं करते ॥२॥

हरि अनंत हरि कथा अनंता।
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए।
कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।


श्रीहरि अनन्त हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनको कथा भी अनन्त है; सब संतलोग उसे बहुत प्रकारसे कहते-सुनते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर चरित्र करोड़ कल्पोंमें भी गाये नहीं जा सकते॥३॥

यह प्रसंग मैं कहा भवानी।
हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।
सेवत सुलभ सकल दुखहारी॥


[शिवजी कहते हैं कि] हे पार्वती ! मैंने यह बतलानेके लिये इस प्रसंगको कहा कि ज्ञानी मुनि भी भगवानकी मायासे मोहित हो जाते हैं। प्रभु कौतुकी (लीलामय) हैं और शरणागतका हित करनेवाले हैं। वे सेवा करने में बहुत सुलभ और सब दु:खोंके हरनेवाले हैं।॥ ४॥

सो०- सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥१४०॥


देवता. मनुष्य और मुनियोंमें ऐसा कोई नहीं है जिसे भगवानकी महान् बलवती माया मोहित न कर दे। मनमें ऐसा विचारकर उस महामायाके स्वामी (प्रेरक) श्रीभगवानका भजन करना चाहिये। १४०॥
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी।
कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥
जेहि कारन अज अगुन अरूपा।
ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा॥

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