श्री मद्भगवद्गीता का पहला अध्याय
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श्रीमद्भगवद्गीता भाग 1

महर्षि वेदव्यास

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :59
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 538
आईएसबीएन :000000000

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श्रीपरमात्मने नमः

 

श्रीमद्भागवतगीता

अथ प्रथमोध्यायः

 

श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्ध है। जिस प्रकार एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं में उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उसके पश्चात् जीवन के समरांगण से पलायन करने का मन बना लेता है। उसी प्रकार अर्जुन जो कि महाभारत का महानायक है अपने सामने आने वाली समस्याओं से भयभीत होकर जीवन और कर्मक्षेत्र से निराश हो गया है। अर्जुन की तरह ही हम सभी कभी-कभी अनिश्चय की स्थिति में या तो हताश हो जाते हैं और या फिर अपनी समस्याओं से उद्विग्न होकर कर्तव्य विमुख हो जाते हैं। भारत वर्ष के ऋषियों नें गहन विचार के पश्चात् जिस ज्ञान को आत्मसात् किया उसे उन्होंने वेदों का नाम दिया। इन्हीं वेदों का अंतिम भाग उपनिषद कहलाता है। मानव जीवन की विशेषता मानव को प्राप्त बौद्धिक शक्ति है और उपनिषदों में निहित ज्ञान मानव की बौद्धिकता की उच्चतम अवस्था तो है ही, अपितु बुद्धि की सीमाओं के परे मनुष्य क्या अनुभव कर सकता है यह हमारे उपनिषद् एक झलक दिखा देते हैं। उसी औपनिषदीय ज्ञान को महर्षि वेदव्यास ने सामान्य जनों के लिए गीता में संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है। वेदव्यास की महानता ही है, जो कि 11 उपनिषदों के ज्ञान को एक पुस्तक में बाँध सके और मानवता को एक आसान युक्ति से परमात्म ज्ञान का दर्शन करा सके।

 

धृतराष्ट्र उवाच

 

धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाच्चैव किमकुर्वत संजय।।

 

धृतराष्ट्र बोले- हे संजय ! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पाण्डुके पुत्रों ने क्या किया ? ।। 1।।

इस श्लोक से व्यासजी हमें महाभारत की मानवीय सम्बन्धों की उलझनों और समस्याओं से निकाल कर गीता के अध्यात्म में प्रवेश करवाते हैं। रामायण अपने चौबीस हजार से श्लोकों और महाभारत अपने एक लाख श्लोकों से महाकाव्य के नाम से सर्वविदित हैं। महाभारत का गंभीर विषय हमारा अपना जीवन ही है, अर्थात् मानव जीवन के सभी संभावित, अविवादित और विवादित दोनों प्रकार के विषयों और उनके मानव जीवन पर पड़ने वाले नाना प्रकार के प्रभावों का गहन विवेचन्। भगवद्गीता महाभारत का ही एक अंश है, जिसमें कुल सात सौ श्लोक आते हैं। महाभारत के पाठक जानते हैं कि धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे थे। उनका अंधापन केवल शारीरिक न हो कर वरन् मानसिक एवं बौद्धिक भी था। धृतराष्ट्र का यही मानसिक अंधापन यह जानते हुए भी कि वे स्वयं अंधे होने के कारण राजा होने के योग्य नहीं है, क्योंकि तत्कालीन समय के राजा को कभी भी युद्ध में अपनी सेना का नेतृत्व करना पड़ सकता था। अंधा व्यक्ति युद्ध में अपनी ही सेना के लिए गंभीर समस्या का कारण बन सकता था! वह समय प्रजातांत्रिक व्यवस्था का होता तब संभवतः धृतराष्ट्र राजा बनने के योग्य माने जा सकते थे। अब जब वे ही राजा नहीं बन सकते तो उनके पुत्र का कोई अधिकार सिद्ध नहीं होता है, फिर भी धृतराष्ट्र का मन दुर्योधन को राजा बनाने का अभिलाषी हो जाता है। धृतराष्ट्र का बौद्धिक अंधापन ही है, जो यह जानते हुए भी कि वे सही मार्ग पर नहीं है और उनके समय के सबसे अधिक सक्रिय राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि सुदूर प्रातों में केवल अपने बौद्धिक और मानसिक बल पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने वाले श्रीकृष्ण भी पाँडवों का साथ दे रहे हैं, अपने पुत्रों की असंभावित विजय की आकांक्षा करते हैं। वे धृतराष्ट्र जो कि स्वयं भीष्म की संरक्षता में पले-बढ़े थे, यह भूल जाते हैं, कि धर्म (कुरु कुल की रक्षा का) और राष्ट्र की रक्षा के लिए ही भीष्म ने धृतराष्ट्र और पाण्डु के पिता और चाचा के अशक्त होते हुए भी कुरुकुल की रक्षार्थ उन्हें मूर्त रूप देकर राज्य का संचालन किया था। भीष्म को भी संभवतः यह समझ में आ सकता है कि उन्होंने साधन को ही साध्य बनाने की त्रुटि की है, अतः हो सकता है कि युद्ध क्षेत्र में वे अपनी त्रुटि सुधारने का प्रयास करें और पाण्डवों के विरुद्ध युद्ध में दुर्योधन की मनोकामना पूरी करने में अपनी समग्र शक्ति न लगाएँ। इस प्रकार की प्रबल संभावनाओं के होते हुए भी उनकी बुद्धि उन्हें यह नहीं समझा पाती कि उनका निर्णय अनुचित ही नहीं आत्म-घातक भी है। परंतु मन और बुद्धि की यह विस्मयकारी क्रीड़ा वयष्क होते-होते हम सभी अपने जीवन में कई-कई बार देख चुके होते हैं। मानते हम भी नहीं हैं, बुद्धि सही मार्ग दिखा भी रही हो तो भी हम अपने मन के आगे हार जाते हैं, और न करने वाले कितने ही ऐसे कार्य करते भी हैं, और पछताते भी हैं। इसी संशय में आकंठ डूबे हुए जब धृतराष्ट्र आकुल होते हैं, तो इसी काव्य के रचियता व्यास धृतराष्ट के सारथी संजय को वह दिव्य दृष्टि केवल उतने समय के देते हैं जब तक कि युद्ध चलने वाला है। ऐसा क्यों, युद्ध के पश्चात क्यों नही? इसका एक उत्तर यह भी हो सकता है कि इतना सब देख लेने के बाद संजय स्वयं ही अन्य कुछ नहीं देखना चाहेंगे। गीता के इस पहले श्लोक में धृतराष्ट्र संजय से पूछ रहे हैं कि अपने-अपने कर्मों से प्रेरित होकर युद्ध के लिए प्रवृत्त मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? आज के समय में जिस प्रकार खेलों का विवरण देने वाला उद्घोषक अपने सुनने वाले अथवा दर्शकों में रुचि बढ़ाने के लिए जिस प्रकार दोनों पक्षों के खिलाड़ियों की तैयारी और निर्णायकों की उपस्थिति तथा दर्शकों की संख्या, उस समय का तापमान, सूर्य का प्रकाश और बादलों की उपस्थिति आदि की जानकारी देता है, उसी प्रकार संजय कौरवों और पाण्डवों के सेनानियों, रथियों और महारथियों की आदि की जानकारी देता है। ऐसा माना जा सकता है कि संजय ऐसी अपेक्षा रखता हो कि योद्धाओं का विवरण और उनकी युद्ध क्षमता आदि का विवरण सुनकर संभवतः धृतराष्ट्र अभी भी चेत जायें और इस विनाशकारी युद्ध को रोकने की घोषणा कर दें। ऐसा न भी हो तो यह तो कहा ही जा सकता है कि व्यासजी अपने पाठकों में कथा के मानवीय अनुभवों के प्रति ध्यान आकृष्ट करना चाहते हों।

 

संजय उवाच

 

दृष्ट्रा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसडग्म्य राजा वचनमब्रवीत्।।

 

संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा ।। 2।।

आजकल के समय में क्रिकेट या फुटबाल का मैच आरंभ होने के समय टॉस निर्धारण अथवा दोनों टीमों के कोच और कप्तान आदि जिस प्रकार खेल आरंभ होने के समय मंत्रणा करते हैं उसी प्रकार दुर्योधन युद्ध आरंभ होने के समय द्रोणाचार्य से एक बार पुनः मंत्रणा करने जाता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि उसे युद्धक्षेत्र में द्रोणाचार्य पर भीष्म की अपेक्षा अधिक विश्वास है। इसका कारण संभवतः यही है कि उसने अपने जीवन में द्रोणाचार्य को शिक्षा देते देखा है और उनसे, उसका स्वयं का व्यक्तिगत अनुभव जुड़ा हुआ है। भीष्म उसके लिए ऐतिहासिक पुरुष हैं, भीष्म कुरुवंश के संरक्षक तो हैं, परंतु उसे स्वयं भीष्म के शौर्य को देखने का कोई अनुभव नहीं है। यहाँ हमें ध्यान रखना होगा कि दुर्योधन के दादा आदि भी भीष्म के पुत्रों की आयु के थे। कुरुवंश के सम्मान अथवा रक्षा हेतु भीष्म ने इसके पूर्व जब भी अपना रण कौशल दिखाया था, वह समय दुर्योधन से दो पीढ़ी पहले का था। इसके विपरीत द्रोणाचार्य तो उसके अध्यापक ही थे, उसने और उसके समकक्ष सभी लोगों ने द्रोणाचार्य की देखरेख में शिक्षा ग्रहण की थी। पाठक समझ ही सकते हैं कि द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र के समकक्ष हैं, जबकि भीष्म उसके प्रपितामह की आयु के। दुर्योधन के लिए भीष्म पितामह एक ध्वज की तरह हैं जिसकी रक्षा करनी आवश्यक है, न कि एक योद्धा जो कि युद्ध के निर्णय को बदलने की क्षमता रखता है। यदि पाठक ध्यान दें तो यह समझना बहुत कठिन नहीं है कि लगभग चालीस वर्ष की आयु का दुर्योधन अभी इतना अशक्त भी नहीं है कि वह अपनी इच्छाओं को पूरा करने में स्वयं को शारीरिक रूप से अशक्त मानता हो। हाँ, हम अपने जीवन में इतनी आयु वाले कई लोगों को देखते हैं जो अपनी हठधर्मिता के आगे दिग्रभ्रमित हो जाते हैं। ऐसे लोग अपनी शारीरिक शक्ति और उर्जा का उपयोग अपनी मनमानी करने में ही लगाते हैं। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में लगभग ऐसी ही आयु वाले विश्व नेता ऐसे ही लोग सिद्ध हुए हैं।

 

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूस्।
व्यूढ़ां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।।

 

हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्रद्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डु पुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये।। 3।।

द्रोणाचार्य के शिष्यों में अर्जुन और धृष्टद्युम्न प्रमुख श्रेणी के छात्र थे। गुरु और शिष्य के बीच का संबंध उतना ही फलदायी होता है जितना कि दोनो पक्षों ने इस दिशा में प्रयास किया होता है। द्रोणाचार्य के शिष्य तो सभी थे, फिर अर्जुन और धृष्टद्युम्न ही क्यों प्रथम श्रेणी के शिष्य बने? कौरवों के सभी भाइयों को समान सुविधा उपलब्ध थी, तब युद्ध आरंभ होने के पहले दुर्योधन यहाँ द्रोणाचार्य को यह क्यों कहता है कि आपके शिष्य धृष्टद्युम्न के नेतृत्व में सजी हुई पाण्डवों की सेना को देखिए? क्या वह द्रोणाचार्य को यह याद दिलाना चाहता है कि द्रुपद उनके शत्रु हैं, इस प्रकार उनका क्रोध अधिक भड़काकर पाण्डवों को अधिकाधिक क्षति पहुँचाना चाहता है, अथवा द्रोणाचार्य की भर्त्सना करना चाहता है कि आपने अपने शिष्यों अर्जुन और धृष्टद्युम्न को इतनी अधिक युद्ध विद्या सिखा दी कि अब वे हमारे (और द्रोणाचार्य के) लिए समस्या बन गये हैं। इन दोनो के सांथ ही शिक्षा ग्रहण करने के कारण दुर्योधन को इस तथ्य का गहन अनुभव है कि धृष्टद्युम्न कितना जुझारु और वीर योद्धा है! यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि पाण्डवों की सात अक्षोहिणी सेना, कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के समक्ष छोटी है, पर युद्ध के लिए इतनी छोटी भी नहीं है। इसी लिए वह कहता है पाण्डवों की भारी सेना को देखिए।

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