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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘पर माँ ! पट्टे में तो ऐसा लिखा नहीं है?’’

‘‘पट्टे में तो इस कारण नहीं लिखा गया कि राजा साहब के कर्मचारियों को न तो काम करने का ढँग आता है, न हिसाब गिनने की विधि। हम तो जानते हैं कि भूमि से आय हुई है और उस आय का भाग भूमि के मालिक को मिलना चाहिए।’’

‘‘पर माँ ! भूमि का मालिक राजा कैसे हो गया? उसको भूमि को प्राप्त करने के लिए न तो कुछ व्यय करना पड़ा है और न ही कुछ परिश्रम। मालिक कहाने का तो उससे अधिक अधिकार हमको है।’’

‘‘देखो फकीर ! यह विधान की बात हम घर बैठे कैसे कह सकते हैं? यदि वह स्वामी नहीं होगा, तो सरकार होगी। सरकार तो हमारे साथ इतनी भी रिआयत नहीं करेगी, जितनी राजा साहब ने की है। यह विधान की बात राजा साहब जानें और सरकार जाने। हम विधान बनानेवाले नहीं हैं और न ही विधान के विषय में निर्णय देनेवाले हैं। मेरी बात तो बहुत ही सरल है।

‘‘मान लो, एक बालक की उँगली में अँगूठी पड़ी है और वह उस अँगूठी का मूल्य नहीं जानता। वह अँगूठी को पीतल की मान बेचने चला जाता है। खरीदनेवाले को पता चल जाय कि अँगूठी पीतल की नहीं, सोने की है, तो उसको दो पैसे में खरीद लेने में पाप नहीं लगेगा क्या?

‘‘मैं तो यही बात कह रही हूँ। राजा साहब को इस भूमि का मूल्य पता नहीं था और उन्होंने हमको बिना मूल्य के दे दी है जब हम जान गये हैं कि यह बहुत ही अधिक मूल्य की वस्तु है, तो इसका उचित मूल्य हमको देना ही चाहिए।’’

फकीरचन्द की समझ में बात आ गई। इस कारण उसने कहा, ‘‘माँ ! हमने अभी तक पचास बीघा भूमि जोती है। इस हिसाब से हमें राजा साहब को ढाई सौ रुपये देने चाहिएँ। यह मैं कल दे आऊँगा।’’

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