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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘ललिता को तुम भी तो नित्य देखते हो। कैसी लगती है तुमको?’’

‘‘मैंने उसके रूप-रंग को देखा है। परन्तु उसके मन के विकास को तो नहीं देखा। एक धनी बाप की बेटी है, एक मूर्ख अभिमानी भाई की बहन है और वह स्वयं क्या है, मैं नहीं जानता।’’

‘‘अभी बच्ची है। वह तो बन जायेगी, जैसा बनाओगे। रूप-रंग कुछ बुरा नहीं। स्वभाव अच्छा है, काम-काज करती है। अभिमान और मुर्खता अभी तो दिखाई नहीं दी। आगे क्या होगा, यह भगवान् और भाग्य के हाथ में है।’’

‘‘माँ ! तुम जानो और तुम्हारा काम जाने। यदि वह आई तो सबसे अधिक वास्ता तो तुम्हारे साथ ही पड़ेगा। तुम्हीं उसको कुछ सिखाओगी। इस विषय में जैसा तुम कहोगी मैं मान जाऊँगा।’’

इतना कह फकीरचन्द, जो उठकर खाट पर बैठ गया था, पुनः लेट गया और सोने के लिए उसने करवट बदल ली। माँ समझ गई कि वह इससे अधिक कुछ नहीं कहेगा। इस कारण अपने व्यवहार पर मनन करती हुई, अपनी खाट पर जा लेट गई।

अगले दिन फकीरचन्द स्नानादि से निवृत्त हो अल्पाहार के लिए चौके में आया तो उसने ललिता को एक पृथक् चूल्हे पर कुछ पकाते देखा। उसने माँ से पूछा, ‘‘यह क्या बन रहा है माँ?’’

‘‘सेठजी के लिए दलिया।’’

‘‘तो हमने कौन पाप किये हैं जो हमें नहीं मिलेगा?’’

माँ ने केवल यह कह दिया, ‘‘इसके बनने में देर है। तुम्हें जल्दी काम पर जाना है।’’

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