लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


8

बिहारीलाल से सीता के देवर लक्ष्मण बनने का आश्वासन ले, ललिता उससे यह पूछने के लिए उत्सुक हो उठी कि उसके भैया अपनी होनेवाली पत्नी के विषय में क्या विचार करते हैं। यद्यपि अब तो उसको बिहारीलाल से भी एकान्त में मिलने में संकोच होने लगा था, तो भी उसका मन किसी ऐसे अवसर को पाने के लिए व्याकुल हो रहा था। यह अवसर उसे शीघ्र ही मिल गया।

कुएँ से पानी भरकर घर के भीतर ले जाया जाता था। सेठ साहब तो झाँसी गये हुए थे। घर का नौकर दोपहर के समय कहीं चला गया था। घर में पानी की आवश्यकता पड़ी, तो ललिता गगरा ले कुएँ पर जा पहुँची। स्कूल में छुट्टी होने के कारण बिहारी कुएँ की जगत पर बैठा कपड़ों को साबुन लगा रहा था।

ललिता गगरे को रस्सी बाँधने लगी तो बिहारीलाल ने कहा, ‘‘छोड़ो भाभी ! मैं पानी निकाल देता हूँ।’’

‘‘अभी तो सगाई भी नहीं हुई, भाभी कैसे हो गई?’’

‘‘किन्तु अब इसमें सन्देह भी क्या है?’’ बिहारीलाल ने गगरा उसके हाथ से लेते हुए पूछा।

‘‘कौन जाने तुम्हारे भैया भी काली बहू पसन्द न करें तो?’’

‘‘माँ ने तो कह दिया है कि तुम पार्वती के समान गोरी हो।’’

‘‘पर माँ के बेटे ने तो नहीं कहा और वे भी तो अपने छुटके भैया की तरह कह सकते हैं। कौन जाने?’’

‘‘तब तो यह बात जानने की है।’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book