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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘बस, या कुछ और भी दोष हैं उसमें?’’

‘‘बस एक और है। वह राम की बहन है।’’

‘‘बिहारी ! ये सब बातें किसी भी आँखों वाले को दिखाई दे जाती है और तुम क्या समझते हो कि माँ की दृष्टि दुर्बल पड़ रही है। देखो, वह कहती है, रंग तो देश-देश का मेवा है। भगवान् विष्णु और भगवान कृष्ण भी तो श्याम वर्ण थे। तीखी नाक क्रोधी और लड़ाकू स्वभाव की सूचक होती है। मारवाड़ी बोलती है, तो अपनी माँ से बोलती है, जैसे हम अपनी पंजाबी बोलते हैं। तुमको चिढ़ाती इस कारण है कि तुम उससे हँसी करते हो, जो भाभियों से नहीं की जाती। रही राम की बात, वह विवाह के पश्चतात् विचार करेंगे। कुछ और बात हो तो बताओ।’’

‘‘तो भैया ! तुमको वह पसन्द है? तुम उससे विवाह करोगे तो उसको भाभी मानना ही पड़ेगा।’’

‘‘हाँ, नहीं मानोगे तो जानते हो ऐसे देवर को भाभियाँ क्या दण्ड देती हैं?’’

‘‘क्या दण्ड देती है?’’

‘‘कोई झगड़ालू, कुरुप, काली देवरानी लाकर देवर के पल्ले बाँध देती है।’’

‘‘तब तो भैया ! मान जाऊँगा।’’

दोनों हँसने लगे। रोटी का समय हो गया था, संतू उनको बुलाने आया। दोनों उठ तथा हाथ-पाँव और मुख धो-पोंछकर चौके में जा बैठे।

माँ ने दोनों के सामने थाली रखते हुए कहा, ‘‘बहुत हँसी हो रही है आज?’’

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