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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
साथ ही वहाँ मैं राजा साहब को निमन्त्रण दे आया हूँ। वास्तव में मैं उनके घर में पन्द्रह दिन तक मेहमान रहा था, इसी कारण रस्सी तौर पर निमन्त्रण देने गया था, परन्तु वे तो उस अवसर पर आने के लिए तैयार प्रतीत होते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हम वहाँ जाने का विचार तो कई दिन से कर रहे थे। अब सगाई की बात सुन एक पन्थ दो काज वाली बात हो जायेगी।’ इसपर मैंने पन्नादेवी की ओर से राजमाता को भी निमन्त्रण दे दिया है। इस विषय में उन्होंने कुछ नहीं कहा। सो मैं आशा करता हूँ कि परसों राजा साहब ग्यारह बजे के लगभग यहाँ पहुँच जाएँगे। वे मोटर में आ रहे हैं। सगाई की विधि पूर्ण कर सायंकाल मोटर से हम चले जाएँगे।’’
फकीरचन्द राजा साहब के, सम्भवतः राजमाता के साथ, आने की बात सुन कुछ चिन्ता अनुभव करने लगा था। यह देख सेठ ने कहा, ‘‘इसकी तुम चिन्ता न करो। मैं सब प्रबन्ध कर आया हूँ। मैं झाँसी मंे एक शामियाना और एक टैंट तथा फर्नीचर का प्रबन्ध कर आया हूँ। टैंट इत्यादि तो आज ही रेल में आ जाएँगे और उनको लगाने वाले कल आ जाएँगे। साथ ही राजा साहब की सेवा-सुश्रूषा करने के लिए वहाँ के होटल का प्रबन्ध कर आया हूँ।’’
इससे फकीरचन्द को कुछ शांति मिली। वह नहीं जानता था कि किस प्रकार एक राजा का स्वागत करना चागिए। अब पूर्ण उत्तरदायित्व सेठजी को अपने ऊपर लेते देख उसको सन्तोष हुआ।
फकीरचन्द ने गाँव के प्रायः सब नर-नारियों को निमन्त्रण दे उन सब में मिठाई बाँटने का प्रबन्ध कर दिया। इसके लिए उसने ललितपुर से हलवाई बुलाकर एक दिन पूर्व ही मिठाई बनवानी आरम्भ कर दी थी।
निश्चित दिन सेठजी ने ललिता की फकीरचन्द से सगाई कर दी। उस समय राजा साहब और रानी तथा राजमाता भी उपस्थित हो गई थीं। यह बात तो गाँव में पहली बार हुई थी। इसलिए गाँव के खाते-पीते लोगों की ओर से राजमाता को भेंट देने का आयोजन कर दिया गया। राजमाता यह नहीं चाहती थीं; परन्तु रामहरष ने गाँव के लोगों की ओर से आग्रह किया तो वे मान गईं। अतएव सगाई की विधि के तुरन्त ही पश्चात् गाँव के रहने वालों ने राजमाता को भेंट दीं। एक सौ एक रुपए से लेकर, दो-दो रुपये तक भेंट दी गई। इससे एक हजार से ऊपर रुपया राजा साहब को मिला। फकीरचन्द ने इकावन रुपये और सेठ ने एक सौ एक रुपया भेंट किया।
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