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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

2

बिहारीलाल देवगढ़ गया और फिर कॉलेज में पढ़ने के लिए शीघ्र ही लौट आया। इस समय तक दो घटनाएँ घट चुकी थीं।

एक तो सेठजी ने लक्ष्मीघर नाम का एक मुंशी देवगढ़ भेज दिया था, जो लड़की बेचने का प्रबन्ध करने लगा था। इसका अभिप्राय यह था कि मोतीराम का यह आरोप कि फकीरचन्द सेठजी की लड़की कम मूल्य पर बेच रहा है, मान लिया गया था। दूसरी बात यह हुई कि लड़की की बिक्री का हिसाब ढील से मिलने लगा।

दूसरी ओर शकुन्तला की सास और श्वसुर एक दिन शकुन्तला से मिलने आये और कहने लगे कि उसके पति ने एक पत्र भेजा है कि उसकी तिजोरी की चाबी शकुन्तला के पास है, वह उनको दे दे।

‘‘तो उनकी चिट्ठी आई है? मुझको उन्होंने, जबसे वे गये हैं, चिट्ठी नहीं भेजी।’’ शकुलन्तला ने कहा।

‘‘तुमसे लड़कर जो गया है।’’

‘‘लड़कर गये तो अपनी तिजोरी की चाबी मुझे क्यों दे जाते?’’ शकुन्तला को अपनी सास के कहने पर सन्देह होने लगा था। उसने आगे कहा, ‘‘आप उनका पत्र दिखा दें, जिसमें उन्होंने चाबी आपको देने के लिए लिखा है।’’

‘‘उसके पत्र में कुछ व्यापार की बातें हैं, वे हम दिखाना नहीं चाहते।’’

‘‘मैं पत्र देखे बिना चाबी नहीं दूँगी। उन्होंने मुझको कहा था कि मैं चाबी आपको न दूँ।’’

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