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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘नींबू और पानी तो ले लेती हूँ। वह भी इसलिए की मैं पिताजी को विचार करने के लिए पर्याप्त समय देना चाहती हूँ।’’

‘‘तुम क्या चाहती हो कि मैं यत्न करूँ तुम्हारे लिए?’’

‘‘तुम?’’ ललिता और सूसन अंग्रेजी में बातचीत कर रही थीं। यद्यपि सूसन अपनी नौकरानी के साथ बातचीत करने से कुछ हिन्दुस्तानी शब्द सीख गई थी, परन्तु मन के भाव प्रकट करने के लिए वे पर्याप्त नहीं थे। इस कारण माँ और शकुन्तला समझ नहीं रही थीं कि सूसन क्या कह रही है। ललिता ने कहा, ‘‘तुम अपना परिचय यहाँ इस घर में दे नहीं सकतीं। दोगी तो भारी हल्ला होगा। हाँ, सहेली बन बातचीत कर सकती हो।’’

‘‘तो ऐसा ही करूँगी।’’

‘‘मैं केवल यह चाहती हूँ कि मेरे वयस्क होने तक मेरा विवाह न किया जाये। जब मैं वयस्क हो जाऊँगी, तो फिर मैं विचार कर लूँगी।’’

‘‘यह तो उचित है।’’

‘‘तो यत्न कर देखो।’’

इसपर सूसन ने पन्नादेवी से कहा, ‘‘आप...इस...विवाह...जबर...क्यों?

पन्नादेवी ने कहा, ‘‘मैं नहीं, यह तो इसके पिता कर रहे है।’’

ललिता ने माँ के कहने का अर्थ समझाया तो उसने पन्नादेवी को कहा, ‘‘हम पिता...से मिलें?’’

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