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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘ठीक तो है माताजी ! अभी तो ललिता का जीवन बचाने के लिए समय है। कहीं और अधिक देर हो गई तो सम्भव है कि उसकी जान बच ही न सके।’’

‘‘मैं एक बात और करूँगी।’’ सूसन ने कहा, ‘‘मैं जाने से पहले सेठजी को कहती जाऊँगी कि यदि यह भूख-हड़ताल बन्द नहीं हुई, तो मैं पुलिस में रिपोर्ट कर दूँगी। इस प्रकार सेठजी शीघ्र ही मान जायेंगे।’’

सूसन तो चली गई, परन्तु पन्नादेवी और शकुन्तला उसके प्रस्ताव पर विचार करने लगीं। पन्नादेवी का कहना था, ‘‘मुझसे भूखा रहा जायेगा अथवा नहीं, कह नहीं सकती।’’

‘‘मैं तो रह सकती हूँ। जो कुछ ललिता कर सकती है, वह क्या मैं नहीं कर सकती?’’

‘‘मेरा मन डरता है।’’

‘‘तो माताजी ! आप व्रत न रखिये। पर मैं तो आज से ही व्रत रख रही हूँ।’’

पन्नादेवी शकुन्तला का मुख देखती रह गई। पिछली रात भी घर में किसी ने खाना नहीं खाया था। इस समय, जब खाने के लिए नौकर ने बुलाया तो शकुन्तला ने खाने के कमरे में जाने से इन्कार कर दिया। पन्नादेवी वहाँ गई। सेठजी चिन्तित-भाव से बैठे हुए थे। रामचन्द्र खाने को तैयार बैठा था।

पन्नादेवी आई तो सेठ ने कहा, ‘‘शकुन्तला को भी कह देतीं?’’

‘‘कहा है। पर वह भी व्रत रख रही है।’’

‘‘क्यों?’’

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