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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


ललिता उठकर बैठ गई और पत्र को पढ़ने लगी। उसने पत्र को कई बार पढ़ा और फिर माँ को वापस देकर कहा, ‘‘अब तो एक ही मार्ग रह गया है।’’

‘‘क्या?’’ सेठजी ने भीतर आते हुए पूछा।

‘‘मैं अब जीने में कोई रस अथवा सार नहीं पाती।’’

‘‘देखो ललिता ! मैंने जब्बलपुर वालों को लिख दिया है कि तुम्हारी सगाई तुम्हारे वयस्क होने के पश्चात् ही हो सकेगी, पहले नहीं। मैं समझता हूँ कि यही तुम चाहती थीं।’’

‘‘हाँ, एक घण्टा पहले यही आपसे माँगती थी, परन्तु आप नहीं मानते थे। अब इस पत्र को पढने के पश्चात् तो मैं आपसे एक ही बात माँगती हूँ कि आप अब यहाँ से चले जाइये। मैं शीघ्रातिशीघ्र अपना प्राणान्त कर देना चाहती हूँ।’’

‘‘क्यों अब क्या हुआ है?’’

‘‘हुआ यह है कि आपका रक्त इस शरीर को नसों में प्रवाहित हो रहा है और वह दूषित है। उसको शरीर से निकाल देने का एक ही उपाय है कि नया शरीर धारण किया जाये, जिसमें वह कलुषित रक्त न हो।’’

‘‘तो तुम भी मेरे रक्त को दूषित समझने लगी हो?’’

‘‘इसके अतिरिक्त अब हो ही क्या सकता है ! यह दूषित शरीर देवता की भेंट के लिए ठीक नहीं माना जा रहा न?’’

‘‘तुम पागल हो गई हो।’’

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