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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘मैं समझती हूँ कि विवशता तो यह है नहीं। विवशता से मन में असन्तोष बना रहता है। यह असन्तोष न तो सन्तोषी के मुख पर प्रकट हुआ है और न शकुन्तला के।

‘‘आपका यह कहना तो मैं समझ सकती हूँ कि यह सन्तोष और कार्य कृत्रिम परिस्थितियों के कारण उत्पन्न हुआ है। पर मैं पूछती हूँ कि क्या आज की पूर्ण सभ्यता कृत्रिम उपायों की आशय नहीं है? मनुष्य के लिए स्वाभाविक क्या है? सभ्य समाज में हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण स्वभाव का विरोध कर ही व्यतीत होता है।’’

‘‘इसपर भी भारत में सब सुधारक विधवा-विवाह की आवश्यकता को मानते हैं।’’

‘‘विधवा-विवाह की स्वीकृति एक बात है और उसको सबके लिए आवश्यकता मान लेना दूसरी बात है। मैं समझती हूँ कि भारत की नारी तो फ्रेल्टी के लांछन से मुक्त है।’’

‘‘तो तुम अपने को भी भारतीय नारी मानने लगी हो?’’

‘‘इस विषय में भारतीय बनने का यत्न कर रही हूँ।’’

‘‘बहुत-बहुत बधाई हो।’’

‘‘पर मैं विचार करती हूँ कि आपमें और ललिता के पिता में कौन-सी बात साझी है कि आप दोनों के विचार में समानता प्रतीत होती है?’’

‘‘क्या समानता प्रतीत हुई है?’’

‘‘मैंने उनसे कहा था कि ललिता को उसके वयस्क होने तक उसका विवाह न करने का वचन दे दें। वयस्क होने पर वह अपना विवाह करने में स्वतन्त्र हो जायेगी।

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