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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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फकीरचन्द के काम की वर्षगाँठ के निमन्त्रण में प्राप्त कपड़ों की गठरी और हाथ में दो दस-दस रुपये के नोट लिए हुए जब शेषराम घर पहुँचा तो मोतीराम द्वार पर बैठा सिगरेट पी रहा था। उसने शेषराम से पूछा, ‘‘यह क्या है?’’
‘‘बाबूजी की माता ने भोज दिया था और साथ में ये रुपये तथा कपड़े भी दिये हैं।’’
‘‘दिखाओ तो क्या कपड़े हैं?’’
शेषराम ने दिखाये। एक धोती थी और कुर्त्ते के लिए कपड़ा था। पाँच रुपये की लागत के कपड़े होंगे। उनको देख मोतीराम ने नाक चढ़ाकर कहा, ‘‘बस? पचीस रुपये में खरीद लिया।’’
‘‘खरीद लिया? खरीदना कैसा?’’ शेषराम ने विस्मय में अपने भाई का मुख देखते हुए पूछा।
भीतर से उसकी माँ और पिता भी आ गये। वे भी कपड़े देखने लगे। शेषराम ने कहा, ‘‘भैया ! यह तो पुरस्कार है।’’
मोतीराम नाक चढ़ाकर दूसरी ओर देखने लगा। इसपर माँ ने कहा, ‘‘मोती ! तुम भी बाबू की नौकरी कर लो तो ठीक रहेगा।’’
‘‘न माँ ! एक रुपया नित्य पर मैं अपनी जान घोलकर नहीं दे सकता। यह नौ घण्टे काम करता है और मिलता है एक रुपया।’’
‘‘पर इससे अधिक कहाँ मिल सकता है?’’
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