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उपन्यास >> दो भद्र पुरुष

दो भद्र पुरुष

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :270
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7642
आईएसबीएन :9781613010624

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दो भद्र पुरुषों के जीवन पर आधारित उपन्यास...


: २ :

गजराज ने जब लाहौर वाली सर्राफे की दुकान बन्द की थी तो वह अनिश्चित मन था कि वह ठीक कर रहा है अथवा नहीं। दिल्ली के लिए दो खिंचाव उसके मन पर प्रभाव डाल रहे थे। एक तो दिल्ली हिन्दुस्तान की राजधानी बन गई थी और उन्नति की आकांक्षा रखने वालों के मन में यह था कि दिल्ली में चलकर रहना चाहिए। दूसरे वह जानता था कि सुनार और सर्राफे का काम बिना खोट मिलाए और झूठ बोले चलता नहीं। उसको स्वभाव से ही झूठ बोलने से घृणा थी।

गजराज के पिता दिल खोलकर दान-दक्षिणा दिया करते थे और कभी गजराज उनसे कहता कि वे इस प्रकार धन व्यर्थ में क्यों देते हैं तो गिरधारी लाल कह देता, ‘‘देखो बेटा! कमाई बिना बेईमानी के नहीं होती। उस बेईमानी से अर्जित धन को भले कार्यों में व्यय कर मैं उस पाप से मुक्त होना चाहता हूँ।’’

‘‘पर आप बेईमानी करते ही क्यों हैं?’’

‘‘बेटा! यदि ऐसा न करूँ तो यह काम सारा ठप्प हो जाए। सब लोग दूसरों के पास जाने लगेंगे। वे बेईमानी भी करेंगे और फिर उस सब धन को अपने ही सुख-चैन के लिए व्यय कर देंगे। धर्म-कर्म में कुछ नहीं लगायेंगे। मैं कम-से-कम इतना तो करता ही हूँ।’’

अपने पिता की यह जीवन-मीमांसा गजराज को पसन्द नहीं आयी थी। अतः जब उनका देहान्त हुआ तो उसने सर्राफे की दुकान बन्द कर दी और लाहौर में लगा सारा धन एकत्रित कर दिल्ली का रास्ता पकड़ा।

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