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उपन्यास >> दो भद्र पुरुष

दो भद्र पुरुष

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :270
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7642
आईएसबीएन :9781613010624

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दो भद्र पुरुषों के जीवन पर आधारित उपन्यास...


: ३ :

दिल्ली पहुँच गया तो कार्य की व्यस्तता में उस औरत तथा उसके पति को सर्वथा भूल-सा गया। उसने उनका पता तो पूछा नहीं था। इस कारण उनका पत्र आए बिना वह कुछ लिख अथवा कह नहीं सकता था। यह भी कारण था कि वे दोनों उसके मस्तिष्क से निकल गये।

उस घटना को भी एक वर्ष व्यतीत हो चुका था। गजराज दक्षिण में गया हुआ था। चरणदास कुछ कागजात देखने के लिए गजराज की कोठी में आया तो वहाँ ड्राइंगरूम में एक अति सुन्दर स्त्री को बैठे देख चकित रह गया। चरणदास को आये देख लक्ष्मी अपने कमरे से निकल आई और उस औरत का परिचय देने लगी। उसने बताया, ‘‘यह औरत तुम्हारे जीजाजी से मिलने के लिए आई है। कहती है इसकी उनसे वाकफियत है। वे इससे लखनऊ में मिलते रहे हैं। उनके कहने पर ही यह उनसे यहाँ मिलने के लिए आई है। भैया! तुम इससे काम-धाम पूछ लो।’’

चरणदास सोचने लगा कि इस औरत के विषय में गजराज ने कभी बात तो की नहीं। फिर भी उसकी मोटी-मोटी, काली-काली, तरल आँखें देख चरणदास के मन में सहानुभूति उमड़ आई। वह ड्राइंगरूम में एक सोफे पर बैठी थी। लक्ष्मी उसके पास बैठ गई। चरणदास ने स्टूल ले उसके सामने बैठते हुए कहा, ‘‘आप कम्पनी के काम से आई हैं अथवा किसी निजी काम से?’’

‘‘दोनों किस्म के कामों से। मेरा नाम शरीफन है। मैं रायबरेली की रहने वाली हूँ। मेरे खाविन्द का दस हज़ार रुपये का बीमा हुआ था। उसके मुतल्लिक झगड़ा पड़ गया है। मैं इसी बाबत मैनेजिंग डायरेक्टर से बात करने के लिए आई हूँ।’’

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