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उपन्यास >> दो भद्र पुरुष

दो भद्र पुरुष

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :270
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7642
आईएसबीएन :9781613010624

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दो भद्र पुरुषों के जीवन पर आधारित उपन्यास...


गजराज हँस पड़ा। बोला, ‘‘ओह! यह बात तो मैं भूल ही गया था। अच्छा, मैं आज उससे मिलूँगा।’’

इसी उद्देश्य से आज गजराज शाम को चार बजे कार्य से लौट आया। किन्तु चरणदास को आज आने में विलम्ब हो गया था। पूरे एक घण्टे की प्रतीक्षा के पश्चात् गजराज बेचैनी का अनुभव करने लगा था क्योंकि अपना काम भी वह अपने मुन्शी पर छोड़ आया था और इधर जिस उद्देश्य से आया था, वह भी पूरा होता नहीं दिखाई दे रहा था। वह उठकर लॉन में ठहलने लगा। लॉन के किनारे-किनारे पेड़ लगे थे और वह उनकी छाया में टहल रहा था। गजराज मन में विचार कर रहा था कि चरणदास इससे इतना तटस्थ क्यों रहता है? क्या वह उसकी किसी प्रकार सहायता नहीं कर सकता?

उसके मन में प्रश्न उत्पन्न होने लगा कि वह सहायता क्यों करे? लक्ष्मी का भाई होना ही तो कोई प्रबल कारण नहीं। वह निर्धन है, यह भी कोई कारण नहीं। संसार में निर्धनों की संख्या कम नहीं है। तो फिर वह क्यों अपने मार्ग से हटकर उसकी सहायता करे?

वह इन प्रश्नों का उत्तर सोच ही रहा था कि चरणदास ने साइकल पर कोठी में प्रवेश किया। उसे देख गजराज का विचार भंग हुआ और वह उससे मिलने के लिए कोठी की ओर चल पड़ा।

चरणदास ने भी गजराज को लॉन से कोठी की ओर आते देखा तो उसने साइकिल एक पेड़ के साथ टिका दी और गजराज की ओर बढ़कर हाथ जोड़ कहने लगा, ‘‘जीजाजी, नमस्ते।’’

‘‘आओ भाई चरणदास! तुम तो दिल्ली में होते हुए भी गायब ही रहते हो, कहीं दिखाई ही नहीं देते?’’

‘‘मैं आता तो प्रायः नित्य हूँ, परन्तु आज सदृश व्यस्त व्यक्ति से मिलना भी तो एक सौभाग्य की बात है। जब-जब भी मैं आया हूँ, आप काम पर ही रहे हैं। यह मेरा परम सौभाग्य है कि आज आपके दर्शन हो गये।’’

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