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उपन्यास >> चंद्रकान्ता

चंद्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8395
आईएसबीएन :978-1-61301-007-5

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चंद्रकान्ता पुस्तक का ई-संस्करण

इक्कीसवां बयान


सिद्धनाथ योगी ने कहा, ‘‘पहले इस खोह का दरवाज़ा खोल मैं इसके अन्दर पहुंचा और पहाड़ी के ऊपर एक दर्रे में बेचारी चन्द्रकान्ता को बेबस पड़े हुए देखा। अपने गुरु से मैं सुन चुका था कि इस खोह में कई छोटे-छोटे बाग हैं जिनका रास्ता उस चश्मे में है जो खोह में बह रहा है, खोह के अन्दर आने पर आप लोगों ने उसे ज़रूर देखा होगा, क्योंकि खोह में उस चश्मे की खूबसूरती भी देखने के काबिल है।’’

सिद्धनाथ की इतनी बात सुनकर सभी ने ‘‘हूं, हां’’ कह के सिर हिलाया इसके बाद सिद्धनाथ योगी कहने लगे–

सिद्ध : मैं लंगोटी बांधकर चश्मे में उतर गया और चश्मे के अन्दर एक छोटा-सा दरवाज़ा इधर-से-उधर और उधर-से-इधर घूमने लगा। एकाएक पूरब की तरफ जल के अन्दर एक छोटा-सा दरवाज़ा मालूम हुआ, गोता लगाकर उसके अन्दर घुसा। आठ-दस हाथ का बराबर जल मिला इसके बाद धीरे-धीरे जल कम होने लगा। यहां तक कि कमर तक जल हुआ। तब मालूम पड़ा कि यहां कोई सुरंग है जिसमें चढ़ाई के तौर पर उंचे की तरफ चला जा रहा हूं।

आधा घण्टा चलने के बाद मैंने अपने को इस बाग के (जिसमें आप बैठे हैं) पश्चिम और उत्तर के कोण में पाया और घूमता-फिरता इस कमरे में पहुंचा। (हाथ का इशारा करके) यह देखिए दीवार में जो अलमारी है, असल में यह अलमारी नहीं दरवाज़ा है। लात मारने से खुल जाता है। मैंने लात मार कर यह दरवाज़ा खोला और इसके अन्दर घुसा। भीतर बिलकुल अन्धकार था, लगभग दो सौ कदम जाने के बाद दीवार मिली। इसी तरह वहां भी लात मारकर दरवाज़ा खोला और ठीक उसी जगह पहुंचा जहां कुमारी चन्द्रकान्ता चपला बेबस पड़ी रो रही थीं। मेरे बगल में से ही एक दूसरा रास्ता चुनार वाले तिलिस्म को गया था, जिसके एक टुकड़े को कुमार ने तोड़ा है।

मुझे देखते ही ये दोनों घबरा गई। मैंने कहा, ‘‘तुम लोग डरो मत, मैं तुम दोनों को छुड़ाने आया हूं।’’ यह कहकर जिस राह से मैं गया था उसी राह से कुमारी चन्द्रकान्ता और चपला को साथ ले इस बाग में लौट आया। इतना हाल, इतनी कैफियत, इतना रास्ता तो मैं जानता था, इससे ज़्यादा इस खोह का हाल मुझे कुछ भी मालूम न था। कुमारी और चपला को खोह के बाहर कर देना या घर पहुंचा देना मेरे लिए कोई बड़ी बात न थी, मगर मैं चाहता था कि यह छोटा-सा तिलिस्म कुमारी के हाथ से टूटे और यहां का माल असबाब इनके हाथ लगे।

मैं क्या, सभी कोई इस बात को जानते होंगे और सभी को यकीन होगा कि कुमारी चन्द्रकान्ता को इस क़ैद से छुड़ाने के लिए ही कुमार चुनारगढ़ वाले तिलिस्म को तोड़ रहे थे, माल ख़जाने की इनको लालच न थी। अगर मैं कुमारी को यहां से निकाल कर आपके पास पहुंचा देता तो कुमार उस तिलिस्म को तोड़ना बन्द कर देते और वहां का खज़ाना यों ही रह जाता। मैं आप लोगों की सुख-समृद्धि चाहने वाला हूं। मुझे कब यह मंजूर हो सकता था कि इतना माल-असबाब बर्बाद हो जाये और कुमार या कुमारी चन्द्रकान्ता को न मिले।

मैंने अपने जी का हाल कुमारी और चपला से कहा और यह भी कहा कि अगर मेरी बात न मानोगी तो तुम्हें इसी बाग में छोड़कर मैं चला जाऊंगा। आखिर लाचार होकर कुमारी ने मेरी बात मंजूर की और कसम खाई कि मेरे कहने के खिलाफ कोई काम न करेगी।

मुझे यह तो मालूम ही न था कि यहां का माल-असबाब क्योंकर हाथ लगेगा और इस खज़ाने की ताली कहां है, मगर यह यकीन हो गया कि कुमारी चन्द्रकान्ता इस तिलिस्म की मालिक होगी। इसी फिक्र में दो रोज़ परेशान रहा। इन बागों की हालत बिलकुल खराब थी, मगर दो-चार फलों के पेड़ ऐसे थे कि हम तीनों ने भूख की तकलीफ न पाई।

तीसरे दिन पूर्णिमा थी। मैं इस बावली के किनारे बैठा सोच रहा था, कुमारी और चपला इधर-उधर टहल रहीं थी, इतने में चपला दौड़ी हुए मेरे पास आई और बोली, ‘‘जल्दी चलिए, इस बाग में एक ताज्जुब की बात दिखाई पड़ी है।’’

मैं सुनते ही उठ खड़ा हुआ और चपला के साथ वहां गया जहां कुमारी चन्द्रकान्ता पूरब की दीवार तले खड़ी गौर से कुछ देख रही थीं। मुझे देखते ही कुमारी ने कहा, ‘‘बाबाजी देखिए उस दीवार की जड़ में एक सुराख है जिसमें से सफेद रंग की बड़ी-बड़ी चीटियां निकल रही हैं। यह क्या मामला है?’’

मैंने अपने उस्ताद से सुना था कि सफेद चीटियां जहां नज़र पड़ें समझना कि वहां ज़रूर कोई खज़ाना या खज़ाने की ताली है। यह खयाल करके मैंने अपनी कमर से खंजर निकाल कुमारी के हाथ में दे दिया और कहा कि तुम इस ज़मीन को खोदो। अस्तु, मेरे कहे मुताबिक कुमारी ने उस ज़मीन को खोदा। हाथ ही भर के बाद कांच की छोटी-सी हांडी उसके भीतर निकली जिसका मुंह बन्द था। कुमारी के ही हाथ से वह हांडी मैंने तुड़वाई। उसके भीतर किसी किस्म का तेल भरा हुआ था जो हांडी टूटते ही बह गया और ताली का एक गुच्छा उसके अन्दर से मिला जिसे पाकर मैं बहुत खुश हुआ।

दूसरे दिन कुमारी चन्द्रकान्ता के हाथ में ताली का गुच्छा देकर मैंने कहा, ‘‘चारों तरफ घूम-घूमकर देखो, जहां ताला नज़र पड़े तालियों में से किसी को लगाकर खोलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं।’’

मुख्तसर ही में बयान करके इस बात को खत्म करता हूं। उस गुच्छे की तीस तालियां थीं, कई दिनों में खोज कर हम लोगों ने तीसों ताले खोले। तीन दरवाज़े तो ऐसे मिले जिनसे हम लोग ऊपर-ही-ऊपर तिलिस्म के बाहर हो जायें। चार बाग और तेईस कोठियां असबाब और खजाने की निकलीं जिनमें हर एक किस्म का अमीरी का सामान और बेहद खज़ाना मौजूद था।

जब ऊपर-ही-ऊपर तिलिस्म से बाहर हो जाने का रास्ता मिला तब मैं अपने घर गया और कई लौडियां और ज़रूरी चीज़ें कुमारी के वास्ते लेकर फिर यहां आया। कई दिनों में यहां के सब ताले खोले गये, तब तक रहते-रहते कुमारी की तबीयत घबरा गई, मुझसे कई दफे उन्होंने कहा ‘कि मैं इस तिलिस्म के बाहर घूमना-फिरना चाहती हूं।’

बहुत जिद्द करने पर मैंने इस बात को मंजूर किया। अपनी कारीगरी से इन लोगों की सूरत बदली और दो तीन घोड़े ला दिये जिन पर सवार होकर ये लोग कभी-कभी तिलिस्म के बाहर घूमने जाया करतीं। इस बात की ताकीद कर दी थी कि अपने को छिपाये रहें जिससे कोई पहचानने न पाये। इन्होंने भी मेरी पूरे तौर पर मानी और जहां तक हो सका अपने को छिपाया। इसी बीच में धीरे-धीरे इन बागों की भी दुरुस्ती की गई।

कुंवर वीरेन्द्रसिंह ने उस तिलिस्म का खज़ाना हासिल किया और यहां का माल-असबाब जो कुछ छिपा था, कुमारी को मिल गया। (जयसिंह की तरफ देखकर) आज तक यह कुमारी चन्द्रकान्ता मेरी लड़की या मालिक थी, अब आपकी जमा आपके हवाले करता हूं।

महाराज शिवदत्त की रानी पर रहम खाकर कुमारी ने दोनों को छोड़ दिया था और इस बात की कसम खिला दी थी कि कुमार से किसी तरह की दुश्मनी न करेंगे। मगर उस दुष्ट ने न मानी, पुराने साथियों से मुलाकात होने पर बदमाशी पर कमर बांधी और कुमार के पीछे लश्कर की तबाही करने लगा। आखिर लाचार होकर मैंने उसे गिरफ्तार किया और इस खोह में उसी ठिकाने पर फिर ला रखा जहां कुमार ने उसे क़ैद करके डाल दिया था। अब और जो कुछ आपको पूछना हो पूछिये, मैं सब हाल कह आप लोगों की शंका मिटाऊं।

सुरेन्द्र : पूछने की तो बहुत सी बातें थीं मगर इस वक़्त इतनी खुशी हुई है कि वे तमाम बातें भूल गया हूं क्या पूछूं? खैर, फिर किसी वक़्तपूछ लूंगा। कुमारी की मदद आपने क्यों की?

जयसिंह : हां, यही सवाल मेरा भी है, क्योंकि आपका हाल जब तक नहीं मालूम होता तबीयत की घबराहट नहीं मिटती, तिस पर आप कई दफे कह चुकें हैं कि मैं योगी या महात्मा नहीं हूं यह सुनकर हम लोग और भी घबरा रहे हैं कि अगर आप वह नहीं हैं जो सूरत से ज़ाहिर है तो फिर कौन हैं?

बाबा : खैर, यह भी मालूम हो जायेगा।

जयसिंह : (कुमारी चन्द्रकान्ता की तरफ देखकर) बेटी, क्या तुम भी नहीं जानती कि यह योगी कौन हैं?

चन्द्रकान्ता : (हाथ जोड़कर) मैं तो सब कुछ जानती हूं मगर कहूं क्योंकर? इन्होंने तो मुझसे सख्त कसम खिला दी है, इसी से मैं कुछ कह नहीं सकती।

बाबा : आप जल्दी क्यों करते हैं। अभी थोड़ी देर में मेरा हाल आपको मालूम हो जायेगा, पहले चलकर उन चीज़ों को तो देखिए जो कुमारी चन्द्रकान्ता को इस तिलिस्म से मिली हैं।

जयसिंह : जैसी आपकी मर्जी।

बाबाजी : उसी वक़्त खड़े हुए और सभी को साथ ले दूसरे बाग की तरफ चले।

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