चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 4 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8402
आईएसबीएन :978-1-61301-029-7

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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 का ई-पुस्तक संस्करण...

आठवाँ बयान


इस जगह हमें भूतनाथ के सपूत लड़के तथा खुदगर्ज और मतलबी ऐयार नानक का हाल पुनः लिखना पड़ा।

हम ऊपर के किसी बयान में लिख आये हैं कि जिस समय नानक अपने मित्र की ज्याफत में तन-मन-धन और आधे शरीर से लौलीन हो रहा था, उसी समय उस पर वज्रपात हुआ, अर्थात् एक नकाबपोश ने उसके बाप की दुर्दशा का हाल बताकर उसे अन्धे कूएँ में ठकेल दिया। लोग कहते हैं कि उसे अपने बाप की मुहब्बत कुछ भी न थी, हाँ, अपनी माँ को कुछ-कुछ जरूर चाहता था, जिस पर उसकी नयी नवेली दुलहिन ने कुछ ऐसा मुट्ठी में कर लिया था कि उसी को सबकुछ तथा इष्टदेव समझे हुए था और उसकी उपासना से विमुख होना हराम समझता था। यद्यपि वह अपने बाप की कुछ परवाह नहीं रखता था और न उसको कुछ प्रेम ही था, मगर वह अपने बाप से डरता उतना ही था, जितना लम्पट लोग काल से डरते हैं। जिस समय वह लौटकर घर आया उसकी अनोखी स्त्री थकावट और सुस्ती के कारण चारपाई का सहारा ले चुकी थी। उसने नानक से पूछा, ‘‘कहो क्या मामला है? तुम कहाँ गये थे?’’

नानक : (धीरे से) अपने नापाक बाप के आफत में फँसने की खबर सुनने गया था। अच्छा होता जो उसके मौत की खबर सुनने में आती और मैं सदैव के लिए निश्चिन्त हो जाता!

स्त्री : (आश्चर्य से) अपने प्यारे ससुर के बारे में ऐसी बात तो आज तक तुम्हारी जुबान से कभी सुनने में न आयी थी!!

नानक : क्योंकर सुनने में आती जबकि अपने इस सच्चे भाव को मैं आज तक मन्त्र की तरह छिपाये हुए था? आज यकायक मेरे मुँह से ऐसी बात तुम्हारे सामने निकल गयी, इसके बाद फिर कभी कोई शब्द ऐसा मेरे मुँह से न निकलेगा, जिससे कोई समझ जाय कि मैं अपने बाप को नहीं चाहता। तुम्हें मैं अपनी जान समझता हूँ और आशा है कि इस बात को जो यकायक मेरे मुँह से निकल गयी है तुम भी जान की तरह हिफाजत करोगी, जिसमें कोई सुनने न पावे। अगर कोई सुन लेगा तो मेरी बड़ी खराबी होगी, क्योंकि मैं अपने बाप को यद्यपि मानता तो कुछ नहीं हूँ, उससे डरता बहुत हूँ, क्योंकि वह बड़ा ही शौतान और भयानक आदमी है। यदि वह जान जायेगा कि मैं उसके साथ खुदगर्जी का बर्ताव करता हूँ तो वह मुझे जान ही से मार डालेगा

स्त्री : नहीं नहीं, मैं ऐसी बात कभी किसी के सामने नहीं कह सकती, जिससे तुम पर मुसीबत आये, (हँसकर) हाँ, अगर तुम मुझे कभी रंज करोगे तो जरूर प्रकट कर दूँगी।

नानक : उस समय मैं भी लोगों से कह दूँगा कि मेरी स्त्री व्यभिचारिणी हो गयी है, मुझ पर तूफान जोड़ती है। भला दुनिया में कोई भी ऐसा आदमी है, जो अपने बाप को न चाहता हो? यदि ऐसा होता तो क्या मैं चुपचाप बैठा रह जाता! मगर नहीं मैं अपने बाप को छुड़ाने के लिए, इसी वक्त जाऊँगा और इस उद्योग में अपनी जान तक लड़ा दूँगा।

स्त्री : (मन में) ईश्वर करे तुम किसी तरह इस शहर से बाहर निकलो या किसी दूसरी दुनिया में चले जाओ। (प्रकट) जब वह फँस ही चुका है तो चुपचाप बैठे रहो, समय पड़ने पर कह देना कि मुझे खबर ही नहीं थी।

नानक : नहीं, मैं ऐसा कदापि नहीं कह सकता, क्योंकि गोपीकृष्ण (नकाबपोश) जिससे इस बात की मुझे खबर पहुँची है, बड़ा दुष्ट आदमी है, समय पड़ने पर वह अवश्य कह देगा कि मैंने इस बात की इत्तिला नानक को दे दी थी!

स्त्री : अच्छा तुम खुलासा कह तो जाओ कि क्या-क्या खबर सुनने में आयी!

नानक ने नकाबपोश की जुबानी जो कुछ सुना था, अपनी प्यारी स्त्री से कहा। इसके बाद उसे बहुत कुछ समझा-बुझाकर सफर की पूरी तैयारी करके अपने बाप को छुड़ाने की फिक्र में वहाँ से रवाना हो गया।

भूतनाथ के संगी-साथी लोग मामूली न थे, बल्कि बड़े ही बदमाश, लड़ाके शैतान और फसादी लोग थे, तथा चारों तरफ ऐसे ढंग से घूमा करते थे कि समय पड़ने पर जब भूतनाथ उन लोगों की खोज करता तो विशेष परिश्रम किये बिना ही उनमें से कोई-न-कोई मिल ही जाता था, इसके अतिरिक्त भूतनाथ ने अपने लिए कई अड्डे भी मुकर्रर कर लिये थे, जहाँ उसके संगी-साथियों में से कोई-न-कोई अवश्य रहा करता था और उन अड्डों में कई अड्डे ऐसे थे, जिनका ठिकाना नानक को मालूम था। ऐसा ही एक अड्डा गया जी से थोड़ी दूर पर बराबर की पहाड़ी के ऊपर था, जहाँ अपने बाप का पता लगाता हुआ नानक जा पहुँचा। उस समय भूतनाथ के साथियों में से तीन आदमी मौजूद थे।

नानक ने उन लोगों से अपने बाप का हाल पूछा और जोकुछ उन लोगों को मालूम था, उन्होंने कहा। इत्तिफाक से उसी समय मनोरमा को लिये हुए भूतनाथ भी वहाँ आ पहुँचा, और अपने सपूत लड़के को देखकर बहुत खुश हुआ भूतनाथ ने मनोरमा को तो अपने आदमियों के हवाले किया और नानक का हाथ पकड़के एक किनारे ले जाने के बाद जो कुछ उस पर बीता था, सब ब्योरेवार कह सुनाया।

नानक : (अफसोस के साथ मुँह बनाकर) अफसोस! आपने इन बातों की मुझे कुछ भी खबर न दी! अगर गोपीकृष्ण आपकी परेशानी का कुछ हाल मुझसे न कहते तो मुझे गुमान भी न होता।

भूतनाथ : खैर, जो कुछ होना था, वह हो गया, अब तुम मनोरमा को लेकर वहाँ जाओ, जहाँ तुम्हारी माँ रहती है और जिस तरह हो सके मनोरमा से पूछकर बलभद्रसिंह का पता लगाओ, मगर एक आदमी को साथ जरूर लिये जाओ क्योंकि आजकल तुम्हारी माँ, जिस ठिकाने रहती है, यद्यपि वहाँ का हाल तुमसे हमने कह दिया, मगर रास्ता इतना खराब है कि बिना आदमी साथ ले गये तुम्हें कुछ भी पता न लगेगा।

नानक : जो आज्ञा, तो क्या इस समय आप सीधे रोहतासगढ़ जायेंगे?

भूतनाथ : हाँ, जरूर जायेंगे, क्योंकि ऐसे समय में शेरअलीखाँ से मिलना आवश्यक है, मगर जब तक हम न आवें तुम अपनी माँ के पास रहना और जिस तरह हो सके बलभद्रसिंह का पता लगाना।

इसके बाद नानक को लिए हुए भूतनाथ फिर अपने आदमियों के पास चला आया और एक आदमी को धन्नूसिंह का पता बताकर (जिसे कैद करके कहीं रख लिया था) कहा कि तुम धन्नूसिंह को वहाँ सेलाकर हमारे घर पहुँचा दो और फिर इसी ठिकाने आकर रहो।

इन कामों से छुट्टी पाने बाद भूतनाथ रोहतासगढ़ शेरअलीखाँ के पास गया और जहाँ जो कुछ हुआ सो हमारे प्रेमी पाठक पढ़ चुके हैं।

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