Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

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चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

चौथा बयान


मैं नहीं कह सकता कि भूतनाथ ने ऐसा क्यों किया। भूतनाथ का कौल तो यही है कि मैंने उनको पहिचाना नहीं, और धोखा हुआ। खैर, जो हो, दयाराम के गिरते ही मेरे मुँह से ‘हाय’ की आवाज निकली और मैंने भूतनाथ से कहा, ‘‘ऐ कमबख्त! तैने बेचारे दयाराम को क्यों मार डाला, जिन्हें बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने खोज निकाला था!!’’

मेरी बात सुनते ही भूतनाथ सन्नाटे में आ गया। इसके बाद उसके दोनों साथी तो न मालूम क्या सोचकर एकदम भाग खड़े हुए, मगर भूतनाथ बड़ी बेचैनी से दयाराम के पास बैठकर उनका मुँह देखने लगा। उस समय भूतनाथ के देखते-देखते उन्होंने आखिरी हिचकी ली और दम तोड़ दिया। भूतनाथ उनकी लाश के साथ चिमटकर रोने लगा और बड़ी देर तक रोता रहा। तब तक हम तीनों आदमी पुनः मुकाबिला करने लायक हो गये और इस बात से हम लोगों का साहस और भी बढ़ गया कि भूतनाथ के दोनों साथी उसे अकेला छोड़कर भाग गये थे। मैंने मुश्किल से भूतनाथ को अलग किया और कहा, ‘‘अब रोने और नखरा करने से फायदा ही क्या होगा, उनके साथ ऐसी ही मुहब्बत थी तो उन पर वार न करना था, अब उन्हें मार कर औरतों की तरह नखरा करने बैठे हो?’’

इतना सुनकर भूतनाथ ने अपनी आँखें पोंछीं और मेरी तरफ देखके कहा, ‘‘क्या मैंने जान-बूझकर इन्हें मार डाला है?’’

मैं : बेशक! क्या यहाँ आने के साथ ही तुमने उन्हें चारपाई पर पड़े हुए नहीं देखा था?

भूतनाथ : देखा था, मगर मैं नहीं जानता था कि ये दयाराम हैं। इतने मोटे ताजे आदमी को यकायक ऐसा दुबला-पतला देखकर मैं कैसे पहिचान सकता था?

मैं : क्या खूब, ऐसे ही तो तुम अन्धे थे? खैर, इसका इन्साफ तो रणधीरसिंह के सामने ही होगा, इस समय तुम हमसे फैसला कर लो, क्योंकि अभी तक तुम्हारे दिल में लड़ाई का हौसला जरूर बना होगा।

भूतनाथ : (अपने को सँभालकर और मुँह पोंछकर) नहीं नहीं, मुझे अब लड़ने का हौंसला नहीं, जिसके वास्ते मैं लड़ता था, जब वही नहीं रहा तो अब क्या? मुझे ठीक पता लग चुका था कि दयाराम तुम्हारे फेर में पड़े हुए हैं, और सो अपनी आँखों से देख भी लिया, मगर अफसोस है कि मैंने पहिचाना नहीं और ये इस तरह धोखे में मारे गये, लेकिन इसका कसूर भी तुम्हारे ही सिर लग सकता है।

मैं : खैर, अगर तुम्हारे किये हो सके तो तुम बिल्कुल ही कसूर मेरे ही सिर थोप देना, मैं अपनी सफाई आपही कर लूँगा, मगर इतना समझ रक्खो कि लाख कोशिश करने पर भी तुम अपने को बचा नहीं सकते, क्योंकि मैंने इन्हें जो कुछ मेहनत खोज निकालने में की थी, वह इन्द्रदेव के कहने से की थी, न तो मैं अपनी प्रशंसा कराना चाहता था और न इनाम ही लेना चाहता था। जरूरत पड़ने पर मैं इन्द्रदेव की गवाही दिला सकता हूँ, और तुम अपने को बेकसूर साबित करने के लिए नागर को पेश कर देना, जिसके कहने और सिखाने में तुमने मेरे साथ दुश्मनी पैदा कर ली।

इतना सुनकर भूतनाथ सन्नाटे में आ गया। सिर झुकाकर देर तक सोचता रहा और इसके बाद लम्बी साँस लेकर उसने मेरी तरफ देखा और कहा, ‘‘बेशक मुझे नागर कमबख्त ने धोखा दिया! अब मुझे भी इन्हीं के साथ मर मिटना चाहिए!’’ इतना कहकर भूतनाथ ने खंजर हाथ में ले लिया मगर कर कुछ न सका अर्थात अपनी जान न दे सका। महाराज, जवाँमर्दों का कहना बहुत ठीक है कि बहादुरों को अपनी जान प्यारी नहीं होती। वास्तव में जिसे अपनी जान प्यारी होती है, वह कोई हौसले का काम नहीं कर सकता, और जो अपनी जान हथेली पर लिये रहता है और समझता है कि दुनिया में मरना एक बार ही है, कोई बार-बार नहीं मरता, वही सब कुछ कर सकता है। भूतनाथ के बहादुर होने में सन्देह नहीं, परन्तु इसे अपनी जान प्यारी जरूर थी, और इस उल्टी बात का सबब यही था कि वह ऐयाशी के नशे में चूर था। जो अदमी ऐयाश होता है, उसमें ऐयाशी के सबब कई तरह की बुराइयाँ आ जाती हैं, और बुराइयों की बुनियाद जम जाने के कारण ही उसे अपनी जान प्यारी हो जाती है, तथा वह कोई काम नहीं कर सकता। यही सबब था कि उस समय भूतनाथ जान न दे सका, बल्कि उसकी हिफाजत करने का ढंग जमाने लगा, नहीं तो उस समय मौका ऐसा ही था, इससे जैसी भूल हो गयी थी, उसका बदला तभी पूरा होता, जब यह भी उसी जगह अपनी जान दे देता और उस मकान से तीनों लाशें एक सात ही निकाली जातीं।

भूतनाथ ने कुछ देर तक सोचने के बाद मुझसे कहा–‘‘मुझे इस समय अपनी जान भारी हो रही है और मैं मर जाने के लिए तैयार हूँ, मगर मैं देखता हूँ कि ऐसा करने से भी किसी को फायदा नहीं पहुँचेगा। मैं जिसका नमक खा चुका हूँ और खाता हूँ उसका और भी नुकसान होगा, क्योंकि इस समय वह दुश्मनों से घिरा हुआ है। अगर मैं जीता रहूँगा तो उनके दुश्मनों का नामोनिशान मिटाकर, उन्हें बेफिक्र कर सकूँगा, अतएव मैं माफी माँगता हूँ कि तुम मेहरबानी कर मुझे सिर्फ दो साल के लिए जीता छोड़ दो।’’

मैं : दो वर्ष के लिए क्या जिन्दगी-भर के लिए तुम्हें छोड़ देता हूँ, जब तुम मुझसे लड़ना नहीं चाहते तो मैं तुम्हें क्यों मारने लगा? बाकी रही यह बात कि तुमने खामखाह मुझसे दुश्मनी पैदा कर ली, सो उसका नतीजा तुम्हें आप-से-आप मिल जायगा, जब लोगों को यह मालूम होगा कि भूतनाथ के हाथ से बेचारा दयाराम मारा गया।

भूतनाथ : नहीं नहीं, मेरा मतलब तुम्हारी पहिली बात से नहीं है, बल्कि दूसरी बात से है अर्थात अगर तुम चाहोगे तो लोगों को इस बात का पता ही नहीं लगेगा कि दयाराम भूतनाथ के हाथ से मारा गया।

मैं : यह क्योंकर छिप सकता है?

भूतनाथ: अगर तुम छिपाओ तो सबकुछ छिप जायगा।

मुख्तसर यह कि धीरे-धीरे बातों को बढ़ाता हुआ भूतनाथ मेरे पैरों पर गिर पड़ा और बड़ी खुशामद के साथ कहने लगा कि तुम इस मामले को छिपाकर मेरी जान बचा लो। केवल इतना ही नहीं, इसने मुझे हर तरह के सब्जबाग दिखाये और कसमें दे-देकर मेरी नाक में दम कर दिया। लालच में तो मैं नहीं पड़ा, मगर पिछली मुरौवत के फेर में जरूर पड़ गया और भेद को छिपाये रखने की कसम खाकर अपने साथियों को साथ लिए हुए मैं उस घर के बाहर निकल गया। भूतनाथ तथा दोनों लाशों को उसी तरह छोड़ दिया, फिर मुझे मालूम नहीं कि भूतनाथ ने उन लाशों के साथ क्या बर्ताव किया।

यहाँ तक भूतनाथ का हाल कहकर कुछ देर के लिए दलीपशाह चुप हो गया, और उसने इस नीयत से भूतनाथ की तरफ देखा कि देखें यह कुछ बोलता है, या नहीं। इस समय भूतनाथ की आँखों से आँसू की नदी बह रही थी, और वह हिचकियाँ ले-लेकर रो रहा था। बड़ी मुश्किल से भूतनाथ ने अपने दिल को सम्हाला और दुपट्टे से मुँह पोंछकर कहा, ‘‘ठीक है, ठीक है, जोकुछ दलीपशाह ने कहा सब सच है, मगर यह बात मैं कसम खाकर कह सकता हूँ कि मैंने जान-बूझकर दयाराम को नहीं मारा। वहाँ राजसिंह को खुले हुए देखकर मेरा शक यकीन के साथ बदल गया, और चारपाई पर पड़े हुए देखकर भी मैंने दयाराम को नहीं पहिचाना, मैंने समझा कि यह भी कोई दलीपशाह का साथी होगा। बेशक दलीपशाह पर मेरा शक मजबूत हो गया था कि दयाराम के मारे जाने पर भी दलीपशाह की तरफ से मेरा दिल साफ न हुआ, बल्कि मैंने समझा कि इसी (दलीपशाह) ने दयाराम को वहाँ लाकर कैद किया था। जिस नागर पर मुझे शक हुआ था, उसी कमबखत की जादू-भरी बातों में मैं फँस गया और उसी ने मुझे विश्वास दिला दिया कि इसका कर्ता-धर्ता दलीपशाह है। यही सबब है कि इतना हो जाने पर भी मैं दलीपशाह का दुश्मन बना ही रहा। हाँ, दलीपशाह ने एक बात नहीं कही, वह यह है कि इस भेद को छिपाये रखने की कसम खाकर भी दलीपशाह ने मुझे सूखा नहीं छोड़ा। इन्होंने कहा कि तुम कागज पर लिखकर माफी माँगो, तब मैं तुम्हें माफ करके यह भेद छिपाये रखने की कसम खा सकता हूँ। लाचार होकर मुझे ऐसा करना पड़ा और मैं माफी के लिए चीठी लिख हमेशा के लिए इनके हाथ में फँस गया।

दलीप : बेशक, यही बात है, और मैं अगर ऐसा न करता तो थोड़े ही दिन बाद भूतनाथ मुझे दोषी ठहराकर आप सच्चा बन जाता। खैर, अब मैं इसके आगे का हाल बयान करता हूँ, जिसमें थोड़-सा हाल तो ऐसा होगा, जो मुझे खास भूतनाथ से मालूम हुआ था।

इतना कहकर दलीपशाह ने फिर अपना बयान शुरू किया–‘‘जैसाकि भूतनाथ कह चुका है, बहुत मिन्नत और खुशामद से लाचार होकर मैंने कसूरवार होने और माफी माँगने की चीठी लिखाकर इसे छोड़ दिया और इसका ऐब छिपा रखने का वादा करके अपने साथियों को साथ लिये हुए, उस घर से बाहर निकल गया और भूतनाथ की इच्छानुसार दयाराम की लाश को और भूतनाथ को उसी मकान में छोड़ दिया। फिर मुझे नहीं मालूम कि क्या हुआ और इसने दयाराम की लाश के साथ कैसा बर्ताव किया।

वहाँ से बाहर होकर मैं इन्द्रदेव की तरफ रवाना हुआ, मगर रास्ते-भर सोचता जाता था कि अब मुझे क्या करना चाहिए, दयाराम का सच्चा-सच्चा हाल इन्द्रदेव से बयान करना चहिए या नहीं। आखिर हम लोगों ने निश्चय कर लिया कि जब भूतनाथ से वादा कर ही चुके हैं, तो इस भेद को इन्द्रदेव से भी छिपा ही रखना चाहिए।

जब हम लोग इन्द्रदेव के मकान में पहुँचे तो उन्होंने कुशल-मंगल पूछने के बाद दयाराम का हाल दरियाफ्त किया, जिसके जवाब में मैंने असल मामले को तो छिपा रक्खा और बात बनाकर यों कह दिया कि जो कुछ मैंने या आपने सुना था, वह ठीक ही निकला अर्थात् राजसिंह ही ने दयाराम के साथ वह सलूक किया और दयाराम राजसिंह के घर में मौजूद भी थे, मगर अफसोस, बेचारे दयाराम को हम लोग छुड़ा न सके और वे जान से मारे गये!

इन्द्रदेव : (चौंककर) हैं! जान से मारे गये!!

मैं : जी हाँ, और इस बात की खबर भूतनाथ को भी लग चुकी थी। मेरे पहिले ही भूतनाथ राजसिंह के उस मकान में, जिसमें दयाराम को कैद कर रक्खा था, पहुँच गया और उसने अपने सामने दयाराम की लाश देखी, जिसे कुछ ही देर पहिले राजसिंह ने मार डाला था। अस्तु, भूतनाथ ने उसी समय राजसिंह का सिर काट डाला, सिवाय इसके वह और कर ही क्या सकता था! इसके थोड़ी देर बाद हम लोग भी उस घर में जा पहुँचे और दयाराम तथा राजसिंह की लाश और भूतनाथ को वहाँ मौजूद पाया। दरियाफ्त करने पर भूतनाथ ने सब हाल बयान किया और अफसोस करते हुए हम लोग वहाँ से रवाना हुए।

इन्द्रदेव : अफसोस! बहुत बुरा हुआ! खैर, ईश्वर की मर्जी!

मैंने भूतनाथ के ऐब को छिपाकर जो कुछ इन्द्रदेव से कहा भूतनाथ की इच्छानुसार ही कहा था। भूतनाथ ने भी यही बात मशहूर की और इस तरह अपने ऐब को छिपा रक्खा।

यहाँ तक भूतनाथ का किस्सा कहकर जब दलीपशाह कुछ देर के लिए चुप हो गया, तब तेजसिंह ने उससे पूछा, ‘‘तुमने तो भला भूतनाथ की बात मानकर उस मामले को छिपा रक्खा, मगर शम्भू वगैरह इन्द्रदेव के शागिर्दों ने अपने मालिक से उस भेद को क्यों छिपाया?’’

दलीप:(एक लम्बी साँस लेकर) खुशामद और रुपया बड़ी चीज है, बस इसीसे समझ जाइए और मैं क्या कहूँ!

तेज : ठीक है, अच्छा तब क्या हुआ? भूतनाथ की कथा इतनी ही है, या और भी कुछ?

दलीप : जी, अभी भूतनाथ की कथा समाप्त नहीं हुई, अभी मुझे बहुत कुछ कहना बाकी है। और बातों के सिवाय भूतनाथ से एक कसूर ऐसा हुआ है, जिसका रंज भूतनाथ को इससे भी ज्यादा होगा।

तेज : सो क्या?

दलीप : सो भी मैं अर्ज करता हूँ।

इतना कहकर दलीपशाह ने फिर कहना शुरू किया–

इस मामले को वर्षों बीत गये। मैं भूतनाथ की तरफ से कुछ दिनों तक बेफिक्र रहा, मगर जब यह मालूम हुआ कि भूतनाथ मेरी तरफ से निश्चिन्त नहीं है, बल्कि मुझे इस दुनिया से उठा बेफिक्र हुआ चाहता है तो मैं भी होशियार हो गया और दिन-रात अपने बचाव की फिक्र में डूबा रहने लगा। (भूतनाथ की तरफ देखकर) भूतनाथ, अब मैं वह हाल बयान करूँगा, जिसकी तरफ मैंने उस दिन इशारा किया था, जब तुम हमें गिरफ्तार करके एक विचित्र पहाड़ी स्थान* में ले गये थे और जिसके विषय में तुमने कहा था कि–‘यद्यपि मैंने दलीपशाह की सूरत नहीं देखी है, इत्यादि। मगर क्या तुम इस समय भी... (* देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति-5, बीसवाँ भाग, बारहवाँ बयान।)

भूतनाथ : (बात काटकर) भला मैं कैसे कह सकता हूँ कि मैंने दलीपशाह की सूरत नहीं देखी है, जिसके साथ ऐसे-ऐसे मामले हो चुके हैं, मगर उस दिन मैंने तुम्हें धोखा देने के लिए वे शब्द कहे थे, क्योंकि मैंने तुम्हें पहिचाना नहीं था। इस कहने से मेरा यही मतलब था कि अगर तुम दलीपशाह न होगे तो कुछ-न-कुछ जरूर बात बनाओगे। खैर, जोकुछ हुआ सो हुआ, मगर क्या तुम वास्तव में अब उस किस्से को बयान करने वाले हो?

दलीप : हाँ, मैं उसे जरूर बयान करूँगा।

भूतनाथ : मगर उसके सुनने से किसी को कुछ फायदा नहीं पहुँच सकता है, और न किसी तरह की नसीहत ही हो सकती है। वह तो महज मेरी नादानी और पागलपने की बात थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, उसे छोड़ देने से कोई हर्ज नहीं होगा।

दलीप : नहीं, उसका बयान जरूरी जान पड़ता है, क्या तुम नहीं जानते या भूल गये कि उसी किस्से को सुनाने के लिए कमला की माँ अर्थात तुम्हारी स्त्री यहाँ आयी हुई है?

भूतनाथ : ठीक है, मगर हाय। मैं सच्चा बदनसीब हूँ, जो इतना होने पर भी उन्हीं बातों को…

इन्द्रदेव : अच्छा अच्छा, जाने दो भूतनाथ! अगर तुम्हें इस बात का शक है कि दलीपशाह बातें बनाकर कहेगा या उसके कहने का ढंग लोगों पर बुरा असर डालेगा तो मैं दलीपशाह को वह हाल कहने से रोक दूँगा और तुम्हारे ही हाथ की लिखी हुई तुम्हारी अपनी जीवनी पढ़ने के लिए किसी को दूँगा, जो इस सन्दूकड़ी में बन्द है।

इतना कहकर इन्द्रदेव ने वही सन्दूकड़ी निकाली, जिसकी सूरत देखने ही से भूतनाथ का कलेजा काँपता था।

उस सन्दूकड़ी को देखते ही एक दफे तो भूतनाथ घबड़ाना-सा होकर काँपा, मगर तुरत ही उसने अपने को सम्हाल लिया और इन्द्रदेव की तरफ देख के बोला, ‘‘हाँ हाँ, आप कृपा कर इस सन्दूकड़ी को मेरी तरफ बढ़ाइये क्योंकि यह मेरी चीज है और मैं इसे लेने का हक रखता हूँ। यद्यपि कई ऐसे कारण हो गये हैं, जिनसे आप कहेंगे कि यह सन्दूकड़ी तुम्हें नहीं दी जायगी मगर फिर भी मैं इसी समय इस पर कब्जा कर सकता हूँ, क्योंकि देवीसिंह जी मुझसे प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि सन्दूकड़ी बन्द-की-बन्द तुम्हें दिला दूँगा। अस्तु, देवीसिंहजी की प्रतिज्ञा झूठी नहीं हो सकती।’’ इतना कहकर भूतनाथ ने देवीसिंह की तरफ देखा।

देवी : (महाराज) निःसन्देह मैं ऐसी प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।

महाराज : अगर ऐसा है तो तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी नहीं हो सकती, मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो।

इतना सुनते ही देवीसिंह उठ खड़े हुए। उन्होंने इन्द्रदेव के सामने से वह सन्दूकड़ी उठा ली और यह कहते हुए भूतनाथ के हाथ में दे दी, ‘‘लो मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करता हूँ, तुम महाराज को सलाम करो, जिन्होंने मेरी और तुम्हारी इज्जत रख ली।’’

भूतनाथ : (महाराज को सलाम करके) महाराज की कृपा से अब मैं जी उठा।

तेज : भूतनाथ, तुम यह निश्चय जानो कि यह सन्दूकड़ी अभी तक खोली नहीं गयी है, अगर सहज में खुलने लायक होती तो शायद खुल गयी होती।

भूतनाथ : (सन्दूकड़ी अच्छी तरह देखभालकर) बेशक, यह अभी तक खुली नहीं है! मेरे सिवाय कोई दूसरा आदमी इसे बिना तोड़े खोल भी नहीं सकता। यह सन्दूकड़ी मेरी बुराइयों से भरी हुई है, या यों कहिए कि यह मेरे भेदों का खजाना है, यद्यपि इसमें के कई भेद खुल चुके हैं, खुल रहे हैं और खुलते जायेंगे, तथापि इस समय इसे ज्यों-का-त्यों बन्द पाकर मैं बराबर महाराज को दुआ देता हुआ यही कहूँगा कि मैं जी उठा, जी उठा, जी उठा। अब मैं खुशी से अपनी जीवनी कहने और सुनने के लिए तैयार हूँ और साथ ही इसके यह भी कह देता हूँ कि अपनी जीवनी के सम्बन्ध में जो कुछ कहूँगा सच कहूँगा!

इतना कहकर भूतनाथ ने वह सन्दूकड़ी अपने बटुए में रख ली और पुनः हाथ जोड़कर महाराज से बोला, ‘‘महाराज से मैं वादा कर चुका हूँ कि अपना हाल सच-सच बयान करूँगा, परन्तु मेरा हाल बहुत बड़ा और शोक, दुःख तथा भयंकर घटनाओं से भरा हुआ है मेरे प्यारे मित्र इन्द्रदेवजी, जिन्होंने मेरे अपराधों को क्षमा कर दिया है, कहते हैं कि तेरी जीवनी से लोगों का उपकार होगा और वास्तव में बात भी ठीक ही है, अतएव कई कठिनाइयों पर ध्यान देकर मैं विनयपूर्वक महाराज से एक महीने की मोहलत माँगता हूँ। इस बीच मैं अपना पूरा-पूरा हाल लिखकर पुस्तक के रूप में पेश करूँगा और सम्भव है कि महाराज उसे सुन-सुनाकर यादगार की तौर पर अपने खजाने में रखने की आज्ञा देंगे! इस एक महीने के बीच में मुझे भी सब बातें याद करके लिख लेने का मौका मिलेगा, और मैं अपनी निर्दोष स्त्री तथा उन लोगों से, जिन्हें देखने की भी आशा नहीं थी, परन्तु जो बहुत कुछ दुःख भोगकर भी दोनों कुमारों की बदौलत इस समय यहाँ आ गये हैं, और जिन्हें मैं अपना दुश्मन समझता था, मगर अब महाराज की कृपा से जिन्होंने मेरे कसूरों को माफ कर दिया है, मिल-जुल कर कई बातों का पता भी लगा लूँगा, जिससे मेरा किस्सा सिलसिलेवार और ठीक कायदे से हो जायगा।’’

इतना कहकर भूतनाथ ने इन्द्रदेव, राजा गोपालसिंह, दोनों कुमारों और दलीपशाह वगैरह की तरफ देखा और तुरन्त ही मालूम कर लिया कि उसकी अर्जी कबूल कर ली जायगी।

महाराज ने कहा, ‘‘कोई चिन्ता नहीं, तब तक हम लोग कई जरूरी कामों से छुट्टी पा लेंगे।’’ राजा गोपालसिंह और इन्द्रदेव ने भी इस बात को पसन्द किया और इसके बाद इन्द्रदेव ने दलीपशाह की तरफ देखकर पूछा, ‘‘क्यों दलीपशाह, इसमें तुम लोगों को तो कोई उज्र नहीं है?’’

दलीप : (हाथ जोड़कर) कुछ भी नहीं, क्योंकि अब महाराज की आज्ञानुसार हम लोगों को भूतनाथ से किसी तरह की दुश्मनी भी नहीं रही, और न यही उम्मीद है कि भूतनाथ हमारे साथ किसी तरह की खुटाई करेगा, परन्तु मैं इतना जरूर कहूँगा कि हम लोगों का किस्सा भी महाराज के सुनने लायक है और हम लोग भूतनाथ के बाद अपना किस्सा भी सुनाना चाहते हैं।

महाराज : निःसन्देह तुम लोगों का किस्सा भी सुनने योग्य होगा और हम लोग उसके सुनने की अभिलाषा रखते हैं। यदि सम्भव हुआ तो पहिले तुम्हीं लोगों का किस्सा सुनने में आवेगा मगर सुनो दलीपशाह, यद्यपि भूतनाथ से बड़ी-बड़ी बुराइयाँ हो चुकी हैं और भूतनाथ तुम लोगों का भी कसूरवार है परन्तु इधर हम लोगों के साथ भूतनाथ ने जोकुछ किया है, उसके लिए हम लोग इसके अहसानमन्द हैं और इसे अपना हितू समझते हैं।

इन्द्रदेव : बेशक बेशक!

गोपाल : जरूर हम लोग इसके अहसान के बोझ से दबे हुए हैं!

दलीप : मैं भी ऐसा ही समझता हूँ क्योंकि भूतनाथ ने इधर जो-जो अनूठे काम किये हैं, उनका हाल कुँअर साहब की जुबानी हम लोग सुन चुके हैं। इसी ख्याल से तथा कुँअर साहब की आज्ञा से हम लोगों ने सच्चे दिल से भूतनाथ का अपराध क्षमा ही नहीं कर दिया है, बल्कि कुँअर साहब के सामने इस बात की प्रतिज्ञा भी कर चुके हैं कि भूतनाथ को दुश्मनी की निगाह से कभी न देखेंगे।

महाराज : बेशक, ऐसा ही होना चाहिए, अस्तु, बहुत-सी बातों को सोचकर और इसकी कारगुजारी पर ध्यान देकर हमने इसका कसूर माफ करके, इसे अपना ऐयार बना लिया है, आशा है कि तुम लोग भी इसे अपनायत की निगाह से देखोगे और पिछली बातों को बल्कुल भूल जाओगे।

दलीप : महाराज अपनी आज्ञा के विरुद्ध चलते हुए, हम लोगों को कदापि न देखेंगे, यह हमारी प्रतिज्ञा है।

महाराज : (अर्जुनसिंह तथा दलीपशाह के दूसरे साथी की तरफ देखकर) तुम लोगों की जुबान से भी हम ऐसा ही सुनना चाहते हैं।

दलीप का साथी : मेरी भी यही प्रतिज्ञा है और ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरे दिल में दुश्मनी के बदले दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की करनेवाली भूतनाथ की मुहब्बत पैदा करे।

महाराज : शाबाश! शाबाश!!

अर्जुन : कुँअर साहब के सामने मैं जोकुछ प्रतिज्ञा कर चुका हूँ, उसे महाराज सुन चुके होंगे, इस समय महाराज के सामने भी शपथ खाकर कहता हूँ कि स्वप्न मं  भी भूतनाथ के साथ दुश्मनी का ध्यान आने पर मैं अपने को दोषी समझूँगा।

इतना कहकर अर्जुनसिंह ने वह तस्वीर जो उसके हाथ में थी, फाड़ डाली और टकड़े-टुकड़े करके भूतनाथ के आगे फेंक दी और पुनः महाराज की तरफ देखकर कहा, ‘‘यदि आज्ञा हो और बेअदबी न समझी जाय तो हम लोग इसी समय भूतनाथ से गले मिलकर अपने उदास दिल को प्रसन्न कर लें।’’

महाराज : यह तो हम स्वयं कहनेवाले थे।

इतना सुनते ही दोनों दलीप, अर्जुन और भूतनाथ आपुस में गले मिले और इसके बाद महाराज का इशारा पाकर एक साथ बैठ गये।

भूतनाथ : (दूसरे दलीप और अर्जुनसिंह की तरफ देखकर) अब कृपा करके मेरे दिल का खुटका मिटाओ और साफ-साफ बता दो कि तुम दोनों में से असल में अर्जुनसिंह कौन है? जब मैं दलीपशाह को बेहोश करके उस घाटी में ले गया था तब तुम दोनों में से कौन महाशय वहाँ पहुँचकर दूसरे दलीपशाह बनने को तैयार हुए थे। (१. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति-5, बीसवाँ भाग, तेरहवाँ बयान।)

दूसरा दलीप : (हँसकर) उस दिन मैं ही तुम्हारे पास पहुँचा था। इत्तिफाक से उस दिन मैं अर्जुनसिंह की सूरत बनकर बाहर घूम रहा था, और जब तुम दलीपशाह को धोखा देकर ले चले, तब मैंने छिपकर पीछा किया था। आज केवल धोखा देने के लिए ही अर्जुनसिंह के रहते मैं अर्जुनसिंह बनकर दलीपशाह के साथ यहाँ आया हूँ।

इतना कहकर दूसरे दलीप ने पास से गीला गमछा उठाया और अपने चेहरे का रंग पोंछ डाला, जो उसने थोड़ी देर के लिए बनाया या लगाया था।

चेहरा साफ होते ही उसकी सूरत ने राजा गोपालसिंह को चौंका दिया और वह यह कहते हुए उसके पास चले गये कि ‘क्या आप भरथसिंहजी हैं, जिनके विषय में इन्द्रजीतसिंह ने हमें नकाबपोश बनकर इत्तिला दी थी’? और इसके जवाब में ‘‘जी हाँ’’ सुनकर वे भरथसिंह के गले से चिमट गये। इसके बाद उनका हाथ थामे हुए गोपालसिंह अपनी जगह पर चले आये और भरथसिंह को अपने पास बैठाकर महाराज से बोले, ‘‘इनके मिलने की मुझे हद्द से ज्यादे खुशी हुई, बहुत देर से मैं चाहता था कि इनके विषय में कुछ पूछूँ!’’ (२. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति -5, बीसवें भाग के आठवें बयान में कुमार की चीठी।)

महाराज : मालूम होता है, इन्हें भी दारोगा ही ने अपना शिकार बनाया था।

भरथ : जी हाँ, आज्ञा होने पर मैं अपना हाल बयान करूँगा।

इन्द्रजीत : (महाराज से) तिलिस्म के अन्दर मुझे पाँच कैदी मिले थे, जिनमें से तीन तो यही अर्जुनसिंह, भरथसिंह और दलीपशाह हैं, इसके अतिरिक्त दो और हैं, जो यहाँ बुलाये नहीं गये। दारोगा, मायारानी तथा उसके पक्षवालों के सम्बन्ध में इन पाँचों ही का किस्सा सुनने योग्य है। जब कैदियों का मुकदमा होगा, तब आप देखियेगा कि इन लोगों की सूरत देखकर कैदियों की क्या हालत होती है।

महाराज : वे दोनों कहाँ हैं।

इन्द्रजीत : इस समय यहाँ मौजूद नहीं हैं, छुट्टी लेकर अपने घर की अवस्था देखने गये हैं, दो-चार दिन में आ जायेंगे।

भूतनाथ (इन्द्रदेव से) यदि आज्ञा हो तो मैं भी कुछ पूछूँ?

इन्द्रदेव : आप जोकुछ पूछेंगे उसे मैं खूब जानता हूँ, मगर खैर पूछिए।

भूतनाथ : कमला की माँ आप लोगों को कहाँ से और क्योंकर मिली।

इन्द्रदेव : यह तो उसी की जबानी सुनने में ठीक होगा। जब वह अपना किस्सा बयान करेगी, कोई बात छिपी न रह जायेगी।

भूतनाथ : और नानक की माँ तथा देवीसिंहजी की स्त्री के विषय में कब मालूम होगा?

इन्द्रदेव : वह भी उसी समय मालूम हो जायगा। मगर भूतनाथ (मुस्कुराकर) तुमने और देवीसिंह ने नकाबपोशों का पीछा करके व्यर्थ यह खुटका और तरद्दुद खरीद लिया। यदि उनका पीछा न करते और पीछे से तुम दोनों को मालूम होता कि तुम्हारी स्त्रियाँ भी इस काम में शरीक हुई थीं, तो तुम दोनों को एक प्रकार की प्रसन्नता होती। प्रसन्नता तो अब भी होगी, मगर खुटके और तरद्दुद से कुछ खून सुखा लेने के बाद!

इतना कहकर इन्द्रदेव हँस पड़े और इसके बाद सभी के चेहरों पर मुस्कुराहट दिखायी देने लगी।

तेज : (मुस्कुराते हुए देवीसिंह से) अब तो आपको भी मालूम हो ही गया होगा कि आपका लड़का तारासिंह कई विचित्र भेदों को आपसे क्यों छिपाता था?

देवी : जी हाँ, सबकुछ मालूम हो गया। जब अपने को प्रकट करने के पहिले ही दोनों कुमारों ने भैरो और तारा को अपना साथी बना लिया तो हम लोग जहाँ तक आश्चर्य में डाले जाते, थोड़ा था!

देवीसिंह की बात सुनकर पुनः सभी ने मुस्कुरा दिया और अब दरबार का रंग-ढंग ही कुछ दूसरा हो गया, अर्थात तरद्दुद के बदले सभों के चेहरे पर हँसी और मुस्कुराहट दिखायी देने लगी।

तेज : (भूतनाथ से) भूतनाथ, आज तुम्हारे लिए बड़ी खुशी का दिन है, क्योंकि और बातों के अतिरिक्त तुम्हारी नेक और सती स्त्री भी तुम्हें मिल गयी, जिसे तुम मरी समझते थे और हरनामसिंह तुम्हारा लड़का भी तुम्हारे पास बैठा हुआ दिखायी देता है, जो बहुत दिनों से गायब था और जिसके लिए बेचारी कमला बहुत परेशान थी, जब वह हरनामसिंह का हाल सुनेगी तो बहुत ही प्रसन्न होगी।

भूतनाथ : निःसन्देह ऐसा ही है, परन्तु मैं हरनामसिंह के सामने भी एक सन्दूकड़ी देखकर डर रहा हूँ कि कहीं यह भी मेरे लिए कोई दुखदायी सामान न लेकर आया हो!

इन्द्रदेव : (हँसकर) भूतनाथ, अब तुम अपने दिल को व्यर्थ के खुटकों में न डालो, जोकुछ होना था, सो हो गया, अब तुम पूरे तौर पर महाराज के ऐयार हो गये, किसी की मजाल नहीं कि तुम्हें किसी तरह की तकलीफ दे सके और महाराज भी तुम्हारे बारे में किसी तरह की शिकायत नहीं सुना चाहते! हरनामसिंह तो तुम्हारा लड़का ही है, वह तुम्हारे साथ बुराई क्यों करने लगा।

इसी समय महाराज सुरेन्द्रसिंह ने जीतसिंह की तरफ देखकर कुछ इशारा किया और जीतसिंह ने इन्द्रदेव से कहा, ‘‘भूतनाथ का मामला तो अब तै हो गया इसके बारे में महाराज किसी तरह की शिकायत सुना नहीं चाहते, इसके अतिरिक्त भूतनाथ ने वादा किया है कि अपनी जीवनी लिखकर महाराज के सामने पेश करेगा। अस्तु, अब रह गये दलीपशाह, अर्जुनसिंह और भरथसिंह तथा कमला की माँ। इन सभों पर जोकुछ मुसीबतें गुजरी हैं, उसे महाराज सुना चाहते हैं, परन्तु अभी नहीं, क्योंकि विलम्ब बहुत हो गया है, अब महाराज आराम करेंगे। अस्तु, अब दरबार बर्खास्त करना चाहिए, जिसमें ये लोग भी आपुस में मिल-जुलकर अपने दिल की कुलफत निकाल लें, क्योंकि अब यहाँ तो किसी से मिलने में अथवा आपुस का बरताव करने में परहेज न होना चाहिए।’’

इन्द्रदेव : (हाथ जोड़कर) जो आज्ञा!

दरबार बर्खास्त हुआ। इन्द्रदेव की इच्छानुसार महाराज आराम करने के लिए जीतसिंह को साथ लिये एक-दूसरे कमरे में चले गये। इसके बाद और सबकोई उठे और अपने-अपने ठिकाने पर जैसाकि इन्द्रदेव ने इन्तजाम कर दिया था, चले गये, मगर कई आदमी जो आराम नहीं किया चाहते थे, बँगले के बाहर निकलकर बगीचे की तरफ रवाना हुए।


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