Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
लोगों की राय

मूल्य रहित पुस्तकें >> चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

Download Book
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

192 पाठक हैं

चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

छठवाँ बयान


इन्द्रदेव के इस स्वर्ग-तुल्य स्थान में बँगले से कुछ दूर हटकर बगीचे के दक्खिन की तरफ एक घना जामुन का पेड़ है, जिसे सुन्दर लताओं ने घेरकर देखने योग्य बना रक्खा है और जहाँ एक कुंज की-सी छटा दिखायी पड़ती है। उसी के नीचे साफ पानी का एक चश्मा भी बह रहा है। अपनी सुरीली बोली से लोगों के दिल लुभा लेनेवाली चिड़ियाएँ, सन्ध्या का समय निकट जान अपने घोंसलों के चारों तरफ फुदक-फुदककर अपने औपौरुष बच्चों को चैतन्य करती हुई कह रही हैं कि लो मैं बहुत दूर से तुम लोगों के लिए दाना-पानी अपने पेट में भर लायी हूँ, जिससे तुम्हारी सन्तुष्टि की जायगी।

यह रमणीक स्थान ऐसा है कि यहाँ दो-चार आदमी छिपकर इस तरह बैठ सकते हैं कि वे चारों तरफ के आदमियों को बखूबी देख लें पर उन्हें कोई भी न देखे। इस स्थान पर हम इस समय भूतनाथ और उनकी पहिली स्त्री, कमला की माँ को, पत्थर की चट्टानों पर बैठे बातें करते हुए देख रहे हैं। ये दोनों मुद्दत से बिछुड़े हुए हैं और दोनों के दिल में नहीं तो कमला की माँ के दिल में जरूर शिकायतों का खजाना भरा हुआ है, जिसे वह इस समय बेतरह उगलने के लिए तैयार है। प्यारे पाठक, आइए हम आप मिलकर जरा इन दोनों की बातें तो सुन लें

भूतनाथ : शान्ता,* आज तुमसे मिलकर मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ। (*शान्ता कमला की माँ का नाम था।)

शान्ता : क्यों? जो चीज किसी कारणवश खो जाती है, उसे यकायक पाने से प्रसन्नता हो सकती है, मगर जो चीज जान-बूझकर फेंक दी जाती है, उसके पाने की प्रसन्नता कैसी?

भूतनाथ : किसी को कहीं से एक पत्थर का टुकड़ा मिल जाय और वह उसे बेकार या बदसूरत समझकर फेंक दे, तथा कुछ समय के बाद जब उसे यह मालूम हो कि वास्तव में वह हीरा था पत्थर नहीं, तो क्या उसके फेंक देने का उसको दुःख न होगा? या उसे पुनः पाकर प्रसन्नता न होगी?

शान्ता : अगर वह आदमी जिसने हीरे को पत्थर समझकर फेंक दिया है, यह जानकर कि वह वास्तव में हीरा था, उसकी खोज करे, या इस विचार से कि उसे मैंने फलानी जगह छोड़ा या फेंका है, वहाँ जाने से जरूर मिल जायेगा, उसकी तरफ दौड़ जाय, तो बेशक समझा जायगा कि उसे उसके फेंक देने का रंज हुआ था और उसके मिल जाने से प्रसन्नता होगी, लेकिन यदि ऐसा नहीं है तो नहीं।

भूतनाथ : ठीक है, मगर वह आदमी उस जगह जहाँ उसने हीरे को पत्थर समझकर फेंका था, पुनः उसे पाने की आशा में तभी जायगा, जब अपना जाना सार्थक समझेगा। परन्तु जब उसे यह निश्चय हो जायगा कि वहाँ जाने में उस हीरे के साथ तू भी बर्बाद हो जायगा, अर्थात वह हीरा भी काम का न रहेगा और तेरी भी जान जाती रहेगी, तब वह उसकी खोज में क्योंकर जायगा?

शान्ता : ऐसी अवस्था में वह अपने को इस योग्य बनावेहीगा नहीं कि वह उस हीरे की खोज में जाने लायक न रहे, यदि यह बात उसके हाथ में होगी और वह उस हीरे को वास्तव में हीरा समझता होगा।

भूतनाथ : बेशक, मगर शिकायत की जगह तो ऐसी अवस्था में हो सकती थी, वह अपने बिगड़े हुए कँटीले रास्ते को जिसके सबब से वह उस हीरे तक नहीं पहुँच सकता था, पुनः सुधारने और साफ करने के लिए परले सिरे का उद्योग करता हुआ दिखायी न देता।

शान्ता : ठीक है, लेकिन जब वह हीरा यह देख रहा है कि उसका अधिकारी या मालिक बिगड़ी हुई अवस्था में भी एक मानिक के टुकड़े को कलेजे से लगाये हुए घूम रहा है और यदि वह चाहता तो उस हीरे को भी उसी तरह रख सकता था, मगर अफसोस उस हीरे की तरफ जो वास्तव में पत्थर ही समझा गया है कोई भी ध्यान नहीं देता, जो बेहाथ-पैर का होकर भी उसी मालिक की खोज में जगह-जगह की मिट्टी छानता फिर रहा है, जिसने जान-बूझकर उसे पैर में गड़नेवाले कंकड़ की तरह अपने आगे से उठाकर फेंक दिया है और जानता है कि उस पत्थर के साथ, जिसे वह व्यर्थ ही में हीरा कह रहा है, वास्तव में छोटी-छोटी हीरे की कनियाँ भी चिपकी हुई हैं, जो छोटी होने के कारण सहज ही मिट्टी में मिल जा सकती हैं, तब क्या शिकायत की जगह नहीं है!!

भूतनाथ : परन्तु अदृष्ट भी कोई वस्तु है, प्रारब्ध भी कुछ कहा जाता है और होनहार भी किसी चीज का नाम है?

शान्ता : यह दूसरी बात है, इन सभों का नाम लेना वास्तव में निरुत्तर (लाजवाब) होना और चलती बहस को जान-बूझकर बन्द कर देना ही नहीं है, बल्कि उद्योग ऐसे अनमोल पदार्थ की तरफ से मुँह फेर लेना भी है। अस्तु, जाने दीजिए मेरी यह इच्छा भी नहीं है कि आपको परास्त करने की अभिलाषा से मैं विवाद करती ही जाऊँ, यह तो बात-ही-बात में कुछ कहने का मौका मिल गया और छाती पर पत्थर रखकर जी का उबाल निकाल लिया, नहीं तो जरूरत ही क्या थी।

भूतनाथ : मैं कसूरवार हूँ और बेशक कसूरवार हूँ, मगर यह उम्मीद भी तो न थी कि ईश्वर की कृपा से तुम्हें इस तरह जीती, इस दुनिया में देखूँगा।

शान्ता : अगर यही आशा या अभिलाषा होती तो अपने परलोकगामी होने की खबर मुझ अभागी के कानों तक पहुँचाने की कोशिश क्यों करते और...

भूतनाथ : बस बस, अब मुझ पर दया करो और इस ढंग की बातें छोड़ दो, क्योंकि आज बड़े भाग्य से मेरे लिए यह खुशी का दिन नसीब हुआ है। इसे जली-कटी बातें सुनाकर पुनः कड़वा न करो और यह सुनाओ कि तुम इतने दिनों तक कहाँ छिपी हुई थीं और अपनी लड़की कमला को किस तरह धोखा देकर चली गयीं कि आज तक वह तुमको मरी हुई ही समझती है?

इस समय शान्ता का खूबसूरत चेहरा नकाब से ढँका हुआ नहीं है। यद्यपि वह जमाने के हाथों सतायी हुई, दुबली पतली और उदास है, और उसका तमाम बदन पीला पड़ गया है, मगर फिर भी आज की खुशी उसके सुन्दर बादामी चेहरे पर रौनक पैदा कर रही है और इस बात की इजाजत नहीं देती कि कोई उसे ज्यादे उम्रवाली कहकर खूबसूरतों की पंक्ति में बैठने से रोके। हजार गयी-गुजरी होने पर भी वह रामदेई (भूतनाथ की दूसरी स्त्री) से बहुत अच्छी मालूम पड़ती है और इस बात को भूतनाथ भी बड़े गौर से देख रहा है। भूतनाथ की आखिरी बात सुनकर शान्ता ने अपनी डबडबायी हुई, बड़ी-बड़ी आँखों को आँचल से साफ किया और एक लम्बी साँस लेकर कहा–

शान्ताः मैं रणधीरसिंहजी के यहाँ से कभी न भागती, अगर अपना मुँह किसी को दिखाने लायक समझती। मगर अफसोस आपके भाई ने इस बात को अच्छी तरह मशहूर किया कि आपके दुश्मन (अर्थात आप) इस दुनिया से उठ गये हैं। इसके सबूत में उन्होंने बहुत-सी बातें पेश कीं, मगर मुझे विश्वास न हुआ तथापि इस गम में मैं बीमार हो गयी और दिन-दिन मेरी बीमारी बढ़ती ही गयी। उसी जमाने में मेरी मौसेरी बहिन अर्थात दलीपशाह की स्त्री मुझे देखने के लिए मेरे घर आयी। मैंने अपने दिल का हाल और बीमारी का सबब उससे बयान किया और यह भी कहा कि जिस तरह मेरे पति ने सही-सलामत रहकर भी अपने को मरा हुआ मशहूर किया, उसी तरह मुझे तुम कहीं छिपाकर मरा हुआ मशहूर कर दो। अगर ऐसा हो जायगा तो मैं अपने पति को ढूँढ़ निकालने का उद्योग करूँगी। उन्होंने मेरी बात पसन्द कर ली और लोगों को यह कहकर कि मेरे यहाँ की आबो-हवा अच्छी है, वहाँ शान्ता को बहुत जल्द आराम हो जायगा, मुझे अपने यहाँ उठा ले जाने का बन्दोबस्त किया और रणधीरसिंहजी से इजाजत भी ले ली। मैं दो दिन तक अपनी लड़की कमला को नसीहत करती रही और इसके बाद उसे किशोरी के हवाले करके और अपने छोटे दूध-पीते बच्चे को गोद में लेकर दलीपशाह के घर चली आयी और धीरे-धीरे आराम होने लगी। थोड़े ही दिन बाद दलीपशाह के घर में उस भयानक आधी रात के समय आपका आना हुआ, मगर हाय उस समय आपकी अवस्था पागलों की-सी हो रही थी और आपने धोखे में पड़कर अपने प्यारे लड़के का जिसे मैं अपने साथ ले गयी थी, खून कर डाला*। (*दलीपशाह ने  चन्द्रकान्ता सन्तति -5, बीसवें भाग के तेरहवें बयान में इस घटना की तरफ भूतनाथ से इशारा किया।)

इतना कहते-कहते शान्ता का जी भर आया और वह हिचकियाँ ले-लेकर रोने लगी। भूतनाथ की बुरी अवस्था हो रही थी और इससे ज्यादे वह उस घटना का हाल नहीं सुनना चाहता था। वह यह कहता हुआ कि ‘बस माफ करो, अब इसका जिक्र न करो’ अपनी स्त्री शान्ता के पैरों पर गिरा ही चाहता था की उसने पैर खैंचकर भूतनाथ का सिर थाम लिया और कहा–‘‘हाँ हाँ, क्या करते हो? क्यों मेरे सिर पर पाप चढ़ाते हो? मैं खूब जानती हूँ कि आपने उसे नहीं पहिचाना, मगर इतना जरूर समझते थे कि वह दलीपशाह का लड़का है। अस्तु, फिर भी आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था, खैर, अब मैं इस जिक्र को छोड़ देती हूँ।’’

इतना कहकर शान्ता ने अपने आँसू पोंछे और फिर इस तरह बयान करना शुरू किया–

‘‘शोक और दुःख से मैं पुनः बीमार पड़ गयी, मगर आशा, लता ने धीरे-धीरे कुछ दिन में अपनी तरह मुझे भी (आराम) कर दिया। यह आशा केवल इसी बात की थी कि एक दफे आपसे जरूर मिलूँगी। मुश्किल तो यह थी कि उस घटना ने दलीपशाह को भी अपना दुश्मन बना दिया था, केवल उस घटना ने ही नहीं इसके अतिरिक्त भी दलीपशाह को बर्बाद करने में आपने कुछ उठा न रक्खा था, यहाँ तक कि आखिर वह दारोगा के हाथ फँस ही गये।’’

भूतनाथ : (बेचैनी के साथ साँस लेकर) ओफ! मैं कह चुका हूँ कि इन बातों को मत छेड़ो, केवल अपना हाल बयान करो। मगर तुम नहीं मानतीं!

शान्ता : नहीं नहीं, मैं तो अपना हाल ही बयान कर रही हूँ, खैर मुख्तसर ही में कहती हूँ।

उस घटना के बाद ही मेरी इच्छानुसार दलीपशाह ने मेरा और बच्चे का मर जाना मशहूर किया, जिसे सुनकर हरनामसिंह और कमला भी मेरी तरफ से निश्चिन्त हो गये। जब खुद दलीपशाह भी दारोगा के हाथ में फँस गये, तब मैं बहुत ही परेशान हुई और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। उस समय दलीपशाह के घर में उनकी स्त्री, एक छोटा-सा बच्चा और मैं, केवल ये तीन ही आदमी रह गये थे। दलीपशाह की स्त्री को मैंने धीरज धराया और कहा कि अभी अपनी जान मत बर्बाद कर, मैं बराबर तेरा साथ दूँगी और दलीपशाह को खोज निकालने में उद्योग करूँगी मगर अब हम लोगों को यह घर एकदम छोड़ देना चाहिए और ऐसी जगह छिपकर रहना चाहिए, जहाँ दुश्मनों को हम लोगों का पता न लगे। आखिर ऐसा ही हुआ, अर्थात हम लोगों की जो कुछ पूँजी थी, उसे लेकर हमने उस घर को एकदम छोड़ दिया और काशीजी में जाकर एक अँधेरी गली में पुराने और गन्दे मकान में डेरा डाला, मगर इस बात की टोह लेते रहे कि दलीपशाह कहाँ है, अथवा छूटने के बाद अपने घर की तरफ जाकर हम लोगों को ढूँढ़ते हैं या नहीं। इस फिक्र में मैं कई दफे सूरत बदलकर बाहर निकली और इधर-उधर घूमती रही।

 इत्तिफाक से दिल में यह बात पैदा हुई कि किसी तरह अपने लड़के हरनामसिंह से छिपकर मिलना और उसे अपना साथी बना लेना चाहिए। ईश्वर ने मेरी यह मुराद पूरी की। जब माधवी, कुँअर इन्द्रजीतसिंह को फँसा ले गयी और उसके बाद उसने किशोरी पर भी कब्जा कर लिया, तब कमला और हरनामसिंह दोनों आदमी किशोरी की खोज में निकले और एक-दूसरे से जुदा हो गये। किशोरी की खोज में हरनामसिंह काशी की गलियों में घूम रहा था, जब उस पर मेरी निगाह पड़ी और मैंने इशारे से अलग बुलाकर अपना परिचय दिया। उसको मुझसे मिलकर जितनी खुशी हुई, उसे मैं बयान नहीं कर सकती। मैं उसे अपने घर में ले गयी और सब हाल उससे कह अपने दिल का इरादा जाहिर किया, जिसे उसने खुशी से मंजूर कर लिया। उस समय मैं चाहती तो कमला को भी अपने पास बुला लेती मगर नहीं, उसे किशोरी की मदद के लिए छोड़ दिया, क्योंकि किशोरी के नमक को मैं किसी तरह भूल नहीं सकती थी। अस्तु, मैंने केवल हरनामसिंह को अपने पास रख लिया और खुद चुपचाप अपने घर में बैठी रहकर आपका और दलीपशाह का पता लगाने का काम लड़के को सुपुर्द किया। बहुत दिनों तक बेचारा लड़का चारों तरफ मारा फिरा और तरह-तरह की खबरें लाकर मुझे सुनाता रहा। जब आप प्रकट होकर कमलिनी के साथी बन गये और उसके काम के लिए चारों तरफ घूमने लगे, तब हरनामसिंह ने भी आपको देखा और पहिचान कर मुझे इत्तिला दी। थोड़े दिन बाद यह भी उसी की जुबानी मालूम हुआ कि अब आप नेकनाम होकर दुनिया में अपने को प्रकट किया चाहते हैं। उस समय मैं बहुत प्रसन्न हुई और मैंने हरनाम को राय दी कि तू किसी तरह राजा बीरेन्द्रसिंह के किसी ऐयार की सागिर्दी कर ले। आखिर वह तारासिंह से मिला और उसके साथ रहकर थोड़े ही दिनों में उसका प्यारा शागिर्द बल्कि दोस्त बन गया, तब उसने अपना हाल तारासिंह को कह सुनाया और तारासिंह ने भी उसके साथ बहुत अच्छा बरताव करके, उसकी इच्छानुसार उसके भेदों को छिपाया। तब से हरनामसिंह सूरत बदले हुए तारासिंह का काम करता रहा और मुझे भी आपकी पूरी-पूरी खबर मिलती रही। आपको शायद इस बात की खबर न हो कि तारासिंह की माँ चम्पा से और मुझसे बहिन का रिश्ता है, वह मेरे मामा की लड़की है, अस्तु, चम्पा ने अपने लड़के की जुबानी हरनामसिंह का हाल सुना और जब यह मालूम हुआ कि वह रिश्ते में उसका भतीजा होता है, तब उसने भी उस पर दया प्रकट की और तब से उसे बराबर अपने लड़के की तरह मानती रही।

जमानिया के तिलिस्म को खोलते और कैदियों को साथ लिये हुए जब दोनों कुमार उस खोहवाले तिलिस्मी बँगले में पहुँचे तो उन्होंने भैरोसिंह और तारा सिंह को अपने पास बुला लिया और तिलिस्म का पूरा हाल उनसे कहके उन दोनों को अपने पास रक्खा। दलीपशाह को यह हाल भी तारासिंह ही से मालूम हुआ कि उनके बाल-बच्चे ईश्वर की कृपा से अभी तक राजी-खुशी हैं, साथ ही इसके मेरा हाल भी दलीपशाह को मालूम हुआ। उस समय तारासिंह दोनों कुमारों से आज्ञा लेकर हरनामसिंह को उस बँगले में ले आया और दलीपशाह से उसकी मुलाकात करायी। हरनामसिंह को साथ लेकर दलीपशाह काशी गये और वहाँ से मुझको तथा अपनी स्त्री और लड़के को साथ लेकर कुमार के पास चले आये। जब तारासिंह की जुबानी चम्पा ने यह हाल सुना, तब वह मुझसे मिलने के लिए तारासिंह के साथ यहाँ अर्थात् उस बँगले में आयी।

भूतनाथ : जब दोनों कुमार नकाबपोश बनकर भैरोसिंह और तारासिंह को यहाँ ले आये, उसके पहिले तो तारासिंह यहाँ नहीं आये थे?

शान्ता : जी, उसके पहिले ही से वे दोनों यहाँ आते-जाते रहे, उस दिन तो प्रकट रूप से यहाँ लाये गये थे। क्या इतना हो जाने पर भी आपको अन्दाज से मालूम न हुआ?

भूतनाथ : ठीक है, इस बात का शक तो मुझे और देवीसिंह को भी होता रहा।

शान्ता का किस्सा भूतनाथ ने बड़े गौर के साथ ध्यान देकर सुना और तब देर तक आरजू-मिन्नत के साथ शान्ता से माफी माँगता रहा। इसके बाद पुनः दोनों में बातचीत होने लगी।

शान्ता : अब तो आपको मालूम हुआ कि चम्पा यहाँ क्योंकर और किस लिए आयी।

भूतनाथ : हाँ, यह भेद तो खुल गया मगर इसका पता न लगा कि नानक और उसकी माँ का यहाँ आना कैसे हुआ।

शान्ता : सो मैं न कहूँगी, यह उसी से पूँछ लेना।

भूतनाथ : (ताज्जुब से) सो क्यों?

शान्ता : मैं उसके बारे में कुछ कहा ही नहीं चाहती!

भूतनाथ : आखिर इसका कोई सबब भी है?

शान्ता : सबब यही है कि उसकी यहाँ कोई इज्जत नहीं है, बल्कि वह बेकदरी की निगाह से देखी जाती है।

भूतनाथ : वह है भी इसी योग्य! पहिले तो मैं उसे प्यार करता था, मगर जब से यह सुना कि उसी की बदौलत मैं जैपाल (नकली बलभद्र) का शिकार बन गया, और एक भारी आफत में फँस गया, तब से मेरी तबीयत उससे खट्टी हो गयी।

शान्ता : सो क्यों?

भूतनाथ : इसीलिए कि वह बेगम की गुप्त सहेली नन्हों से गहरी मुहब्बत रखती है और इसी सबब से वह कागज का मुट्ठा जो मैंने अपने फायदे के लिए तैयार किया था, गायब हो के जैपाल के हाथ लग गया और उससे मुझे नुकसान पहुँचा। इस बात का सबूत भी मैंने अपनी आँखों से देख लिया। (१. चन्द्रकान्ता सन्तति -5, उन्नीसवाँ भाग, बारहवाँ बयान, देखिए नकाबपोश की बातचीत।)

शान्ता : सो ठीक है, मैं भी दलीपशाह से यह बात सुन चुकी हूँ।

भूतनाथ : इसी से अब मैं उसे अपनी स्त्री नहीं, बल्कि दुश्मन समझता हूँ। केवल नन्हों ही से नहीं बल्कि कमबख्त गौहर से भी वह दोस्ती रखती थी और वह दोस्ती पाक न थी। (लम्बी साँस लेकर) अफसोस! इसी में उस खोटी का लड़का भी खोटा ही निकला।

शान्ता : (मुस्कुराकर) तब आप उसके लिए इतना परेशान क्यों थे? क्योंकि यह बात सुनने के बाद ही तो आपने उसे नकाबपोशों के स्थान में देखा था!

भूतनाथ : वह परेशानी मेरी उसकी मुहब्बत के सबब से न थी, बल्कि इस खयाल से थी कि कहीं वह मुझ पर कोई नयी आफत लाने के लिए तो नकाबपोशों से नहीं आ मिली।

शान्ता : ठीक है, यह खयाल भी हो सकता था।

भूतनाथ : फिर इसी बीच में जब उसने मुझे जंगल में गाना सुनाके धोखा दिया और गिरफ्तार करके अपने स्थान पर ले गयी , जिसका हाल शायद तुम्हें मालूम होगा, तब मेरा रंज और भी बढ़ गया। (२. देखिए बीसवें भाग का अन्त।)

शान्ता : यह हाल मुझे मालूम है, मगर यह कार्रवाई उसकी न थी, बल्कि इन्द्रदेव की थी। उन्होंने ही आपके साथ यह ऐयारी की थी और उस दिन जंगल में घोड़े पर सवार जो औरत आपको मिली थी और जिसे आपने अपनी स्त्री समझा था, वह भी इन्द्रदेव का एक ऐयार ही था। यह बात मैं उन्हीं (इन्द्रदेव) की जुबानी सुन चुकी हूँ, शायद आपसे भी वे कहें। हाँ, उस दिन बँगले में जिस औरत को आपने देखा था, वह बेशक नानक की माँ थी। वह तो खुद कैदियों की तरह यहाँ रक्खी गयी है, मैदान की हवा क्योंकर खा सकती है! दोनों कुमार नहीं चाहते थे कि प्रकट होने के पहिले ही कोई उन लोगों का पता लगा ले, इसीलिए ये सब खेल खेले गये। (कुछ सोचकर) आखिर आपने धीरे-धीरे नानक की माँ का हाल पूँछ ही लिया, मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं कहा चाहती थी। अस्तु, अब इससे आगे और कुछ भी न कहूँगी, आप उसके बारे में मुझसे कुछ न पूछें।

भूतनाथ : नहीं नहीं, जब इतना बता चुकी हो तो कुछ और भी बताओ क्योंकि मैं उससे मिलकर कुछ भी नहीं पूँछना चाहता, बल्कि अब उसका मुँह देखना भी मुझे पसन्द नहीं है। अच्छा यह तो बताओ कि वह कमबख्त यहाँ क्यों लायी गयी?

शान्ता : लायी नहीं गयी बल्कि उसी नन्हों के यहाँ गिरफ्तार की गयी, उस समय नानक भी उसके साथ था।

भूतनाथ : (आश्चर्य और क्रोध से) फिर भी उसी नन्हों के यहाँ गयी थी?

शान्ता : जी हाँ।

भूतनाथ : (लम्बी साँस लेकर) लोग सच कहते हैं कि ऐयाशी का नतीजा बहुत बुरा निकलता है।

शान्ता : अस्तु, अब उसके बारे में मुझसे कुछ न पूछिए, इन्द्रदेवजी आपको सबकुछ बता देंगे।

भूतनाथ : हाँ, ठीक है, खैर अब उसके बारे में कुछ न पूछूँगा, जोकुछ पूछूँगा वह तुम्हारे और हरनाम ही के बारे में होगा। अच्छा एक बात और बताओ, आज के दरबार में मैंने हरनाम को एक सन्दूकड़ी लिये देखा था, वह सन्दूकड़ी कैसी थी और उसमें क्या था?

शान्ता : उसमें दारोगा के हाथ की लिखी हुई बहुत-सी चिट्ठियाँ हैं, जिनके देखने से आपको निश्चय हो जायेगा कि आपने दलीपशाह को व्यर्थ ही अपना दुश्मन समझ लिया था। पहिले जब दारोगा ने दालीपशाह को लालच दिखाकर लिखा था कि वह आपको गिरफ्तार करा दें, तब दो-चार चिट्ठियों में तो दलीपशाह ने इस नीयत से कि दारोगा की शैतानियों का सबूत उससे मिलकर बटोर लें, दारोगा के मतलब ही का जवाब दिया था, जिससे खुश होकर उसने कई चीठियों में दलीपशाह को तरह-तरह के सब्जबाग दिखलाये, मगर जब दारोगा की कई चीठियाँ दलीपशाह ने बटोर लीं, तब साफ जवाब दे दिया। उस समय दारोगा साहब बहुत घबड़ाया और सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि दलीपशाह मुझसे दुश्मनी करके मेरा भेद खोल दे। अस्तु, किसी तरह उसे गिरफ्तार कर लेना चाहिए। उस समय कमबख्त दारोगा आप से मिला और उसने दलीपशाह की पहिली चीठियाँ आपको दिखाकर, खुद आप ही को दलीपशाह का दुश्मन बना दिया, बल्कि आप ही के जरिये से दलीपशाह को गिरफ्तार भी करा लिया।

भूतनाथ : ठीक है, इस विषय में मैंने बहुत बड़ा धोखा खाया।

शान्ता : मगर दलीपशाह को गिरफ्तार कर लेने पर भी वे चीठियाँ दारोगा के हाथ न लगीं, क्योंकि वे दलीपशाह की स्त्री के कब्जे में थीं, अब हम लोग उन्हें अपने साथ लाये हैं, जिससे दारोगा के मुकदमे में पेश करें।

भूतनाथ : अस्तु, अब मेरे दिल का खुटका निकल गया और मुझे निश्चय हो गया कि हरनाम की कोई कार्रवाई मेरे खिलाफ न होगी।

शान्ता : भला वह कोई काम ऐसा क्यों करेगा, जिससे आपको तकलीफ हो? ऐसा खयाल भी आपको न रखना चाहिए।

इन दोनों में इस तरह की बातें हो रही थीं कि किसी के आने की आहट मालूम हुई। भूतनाथ ने घूमकर देखा तो नानक पर निगाह पड़ी। जब वह पास आया, तब भूतनाथ ने उससे पूछा, ‘‘क्या चाहते हो?’’

नानक : मेरी माँ आपसे मिलना चाहती है।

भूतनाथ : तो यहाँ पर क्यों न चली आयी? यहाँ कोई गैर तो था नहीं!

नानक : सो तो वही जानें।

भूतनाथ : अच्छा जाओ, उसे इसी जगह मेरे पास भेज दो।

नानक : बहुत अच्छा।

इतना कहकर नानक चला गया और इसके बाद शान्ता ने भूतनाथ से कहा, ‘‘शायद उसे मेरे सामने आपसे बातचीत करना मंजूर न हो, शर्म आती हो या किसी तरह का और कुछ खयाल हो। अस्तु, आज्ञा दीजिए तो मैं चली जाऊँ, फिर...

भूतनाथ : नहीं, उसे जोकुछ कहना है होगा तुम्हारे सामने ही कहेगी, तुम चुपचाप बैठी रहो।

शान्ता : सम्भव है कि वह मेरे रहते यहाँ न आवे या उसे इस बात का खयाल हो कि तुम मेरे सामने उसकी बेइज्जती करोगे।

भूतनाथ : हो सकता है, मगर...(कुछ सोचके) अच्छा तुम जाओ।

इतना सुनकर शान्ता वहाँ से उठी और बँगले की तरफ रवाना हुई। इस समय सूर्य अस्त हो चुका था और चारों तरफ से अँधेरी झुकी आती थी।

...पीछे | आगे....

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book