Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

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चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

आठवाँ बयान


नानक इस बात को सोच रहा था कि मैं पहिले किस पर वार करूँ? अगर पहिले शान्ता पर वार करूँ तो आहट पाकर भूतनाथ जाग जायगा और मुझे गिरफ्तार कर लेगा, क्योंकि मैं अकेला किसी तरह उसका मुकाबिला नहीं कर सकता, अतएव पहिले भूतनाथ ही का काम तमाम करना चाहिए। अगर इसकी आहट पाकर शान्ता जाग भी जायगी तो कोई चिन्ता नहीं, मैं उसे साँस लेने की भी मोहलत न दूँगा, वह औरत की जात मेरे मुकाबिले में क्या कर सकती है। मगर ऐसा करने के लिए यह जानने की जरूरत है कि इन दोनों में शान्ता कौन है और भूतनाथ कौन है!

थोड़ी ही देर के अन्दर ऐसी बहुत-सी बातें नानक के दिमाग में दौड़ गयीं, और उन दोनों में भूतनाथ कौन है, इसका पता न लग सकने के करण लाचार होकर उसने यह निश्चय किया कि इन दोनों ही को बेहोश करके यहाँ से ले चलना चाहिए। ऐसा करने से मेरी माँ बहुत ही प्रसन्न होगी।

नानक ने अपने बटुए में से बहुत ही तेज बेहोशी की दवा निकाली और उन दोनों के मुँह पर चादर के ऊपर ही छिड़ककर उनके बेहोश होने का इन्तजार करने लगा। थोड़ी ही देर में उन दोनों ने हाथ-पैर हिलाये, जिससे नानक समझ गया कि अब इन पर बेहोशी का असर हो गया। अस्तु, उसने दोनों के ऊपर से चादर हटा दी और तभी देखा कि इन दोनों में भूतनाथ नहीं है, बल्कि ये दोनों औरतें ही हैं, जिनमें एक भूतनाथ की स्त्री शान्ता है। उस दूसरी औरत को नानक पहिचानता न था।

नानक ने फिर एक दफे बेहोशी की दवा सुँघाकर शान्ता को अच्छी तरह बेहोश किया और चारपाई से उठाकर बहुत हिफाजत और होशियारी के साथ खेमे के बाहर निकाल लाया, जहाँ उसने अपने एक साथी को मौजूद पाया। दोनों ने मिलकर उसकी गठरी बाँधी और फुर्ती से लश्कर के बाहर निकाल ले गये।

शान्ता को पा जाने से नानक बहुत ही खुश था और सोचता जाता था कि इसे पाकर मेरी माँ बहुत प्रसन्न होगी और हद्द से ज्यादे मेरी तारीफ करेगी, सो इसे सीधे अपने घर ले जाऊँगा और जब दूसरी दफा लौटूँगा तो भूतनाथ पर कब्जा करूँगा। इसी तरह धीरे-धीरे अपने सब दुश्मनों को जहन्नुम में मिला डालूँगा।

कोस-भर निकल जाने के बाद नानक एक संकेत पर पहुँचा तो उसके और साथियों से भी मुलाकात हुई जो कसे-कसाये कई घोड़ों के साथ उसका इन्तजार कर रहे थे।

एक घोड़े पर सवार होने के बाद नानक ने शान्ता को अपने आगे रख लिया, उसके साथी लोग भी घोड़ों पर सवार हुए, और सभों ने पूरब का रास्ता लिया।

दूसरे दिन सन्ध्या के समय नानक अपने घर पहुँचा। रास्ते में उसने और उसके साथियों ने कई दफे भोजन किया, मगर शान्ता की कुछ खबर न ली, बल्कि जब इस बात का खयाल हुआ कि अब उसकी बेहोशी उतरा चाहती है, तब पुनः दवा सुँघाकर उसकी बेहोशी मजबूत कर दी गयी।

नानक को देखकर उसकी माँ बहुत प्रसन्न हुई और उसे जब यह मालूम हुआ कि उसका सपूत शान्ता को गिरफ्तार कर लाया है, तब तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना ही न रहा। उसने नानक की बहुत ही आवभगत की और बहुत तारीफ करने के बाद बोली, ‘‘इससे बदला लेने में अब क्षण-भर की भी देर न करनी चाहिए, इसे तुरन्त खम्भे के साथ बाँधकर होश में ले आओ और पहिले जूतियों से खूब अच्छी तरह खबर लो फिर जो कुछ होगा देखा जायगा। मगर इसके मुँह में खूब अच्छी तरह कपड़ा ठूँस दो, जिससे कुछ बोल न सके और हम लोगों को गालियाँ न दे।

नानक को भी यह बात पसन्द आयी और उसने ऐसा ही किया। शान्ता के मुँह में कपड़ा ठूँस दिया गया और वह दालान में एक खम्भे के साथ बाँधकर होश में लायी गयी। होश आते ही अपने को ऐसी अवस्था में देखकर वह बहुत ही घबरायी और जब उद्योग करने पर भी कुछ बोल न सकी, तो आँखों में आँसू की धारा बहाने लगी?

नानक ने उसकी दशा पर कुछ भी ध्यान न दिया। अपनी माँ की आज्ञा पाकर उसने शान्ता को जूते से मारना शुरू किया और यहाँ तक मारा कि अन्त में वह बेहोश होकर झुक गयी। उस समय नानक की माँ कागज का एक लपेटा हुआ पुर्जा नानक के आगे फेंककर यह कहती हुई घर के बाहर निकल गयी कि ‘इसे अच्छी तरह पढ़, तब तक मैं लौटकर आती हूँ।’

उसकी कार्रवाई ने नानक को ताज्जुब में डाल दिया। उसने जमीन पर से पुर्जा उठा लिया और चिराग के सामने ले जाकर पढ़ा, यह लिखा हुआ था–

‘‘भूतनाथ के साथ ऐयारी करना या उसका मुकाबला करना, नानक ऐसे नौसिखे लौंडों का काम नहीं है। तै समझता होगा कि मैंने शान्ता को गिरफ्तार कर लिया, मगर खूब समझ रख कि वह कभी तेरे पंजे में नहीं आ सकती। जिस औरत को तू जूतियों से मार रहा है, वह शान्ता नहीं है, पानी से इसका चेहरा धो डाल और भूतनाथ की कारीगरी का तमाशा देख! अब अगर अपनी जान तुझे प्यारी है तो खबरदार भूतनाथ का पीछा कभी न कीजियो।’’

पुर्जा पढ़ते ही नानक के होश उड़ गये। झटपट पानी का लोटा उठा लिया और मुँह में ठूँसा हुआ लत्ता निकालकर शान्ता का चेहरा धोने लगा, तब तक वह भी होश में आ गयी। चेहरा साफ होने पर नानक ने देखा कि यह तो उसकी असली माँ ‘रामदेई’ है। उसने होश में आते ही नानक से कहा, ‘‘क्यों बेटा, तुमने मेरे साथ ही ऐसा सलूक किया!’’

नानक के ताज्जुब का कोई हद्द न रहा। वह घबराहट के साथ अपनी माँ का मुँह देखने लगा और ऐसा परेशान हुआ कि आधी घड़ी तक उसमें कुछ बोलने की शक्ति न रही। इस बीच में रामदेई ने उसे तरह-तरह की बेतुकी बातें सुनायीं, जिन्हें वह सिर नीचा किये हुए चुपचाप सुनता रहा। जब उसकी तबीयत कुछ ठिकाने हुई, तब उसने सोचा कि पहिले उस रामदेई को पकड़ना चाहिए, जो मेरे सामने चीठी फेंककर मकान के बाहर निकल गयी है, परन्तु यह उसकी सामर्थ्य के बाहर था, क्योंकि उसे घर से बाहर गये हुए देर हो चुकी थी। अस्तु, उसने सोचा कि अब वह किसी तरह नहीं पकड़ी जा सकती।

नानक ने अपनी माँ के हाथ-पैर खोल डाले और कहा, ‘‘मेरी समझ में कुछ नहीं आता कि यह क्या हुआ, तुम वहां कैसे जा पहुँची और तुम्हारी शक्ल में यहाँ रहनेवाली कौन थी, या क्योंकर आयी!!’’

रामदेई : मैं इसका जवाब कुछ भी नहीं दे सकती और न मुझे कुछ मालूम ही है। मैं तुम्हारे चले जाने के बाद इसी घर में थी, इसी घर में बेहोश हुई और होश आने पर अपने को इसी घर में देखती हूँ! अब तुम्हीं बयान करो कि क्या हुआ और तुमने मेरे साथ ऐसा सलूक क्यों किया?

नानक ने ताज्जुब के साथ अपना किस्सा पूरा-पूरा बयान किया और अन्त में कहा, ‘‘अब तुम्हीं बताओ कि मैंने इसमें क्या भूल की?’’

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