Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

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चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

ग्यारहवाँ बयान


दूसरे दिन पुनः उसी ढंग का दरबार लगा और सब कोई अपने-अपने ठिकाने पर बैठ गये।

इशारा पाकर दलीपशाह उठ खड़ा हुआ और उसने अपने चेहरे पर से नकाब हटाकर दारोगा जैपाल, बेगम और नागर वगैरह की तरफ देखकर कहा–

दलीप : आप लोगों की खुशकिस्मती का जमाना तो बीत गया अब वह जमाना आ गया है कि आप लोग अपने किये का फल भोगें और देखें कि आपने जिन लोगों को जहन्नुम में पहुँचाने का बीड़ा उठाया था, आज ईश्वर की कृपा से वे ही लोग आपको हँसते-खेलते दिखायी देते हैं। खैर, मुझे इन बातों से कोई मतलब नहीं, इसका निपटारा तो महाराज की आज्ञा से होगा, मुझे अपना किस्सा बयान करने का हुक्म हुआ है सो बयान करता हूँ। (और लोगों की तरफ देखकर) मेरे किस्से से भूतनाथ का भी बहुत बड़ा सम्बन्ध है, मगर इस खयाल से कि महारज ने भूतनाथ का कसूर माफ करके उसे अपना ऐयार बना लिया है, मैं अपने किस्से में उन बातों का जिक्र छोड़ता जाऊँगा, जिससे भूतनाथ की बदनामी होती है, इसके अतिरिक्त भूतनाथ प्रतिज्ञानुसार महाराज के आगे पेश करने के लिए स्वयं अपनी जीवनी लिख रहा है, जिससे महाराज को पूरा-पूरा हाल मालूम हो जायगा। अस्तु, मुझे कुछ कहने की जरूरत भी नहीं है।

मैं मिर्जापुर के रहनेवाले दीनदयालसिंह ऐयार का लड़का हूँ। मेरे पिता महाराज धौलपुर के यहाँ रहते थे और वहाँ उनकी बहुत इज्जत और कदर थी। उन्होंने मुझे ऐयारी सिखाने में किसी तरह की त्रुटि नहीं की, जहाँ तक हो सका दिल लगाकर मुझे ऐयारी सिखायी और मैं भी इस फन में खूब होशियार हो गया, परन्तु पिता के मरने के बाद मैंने किसी रियासत में नौकरी नहीं की। मुझे अपने पिता की जगह मिलता थी और महाराज मुझे बहुत चाहते थे, मगर मैंने पिता के मरने के साथ ही रियासत छोड़ दी और अपने जन्म-स्थान मिर्जापुर में चला आया क्योंकि मेरे पिता मेरे लिए बहुत दौलत छोड़ गये थे और मुझे खाने-पीने की कुछ परवाह न थी। पिता के देहान्त के साल-भर पहिले ही मेरी माँ मर चुकी थी अतएव केवल मैं और मेरी स्त्री दो ही आदमी अपने घर के मालिक थे।

जमानिया की रियासत से मुझे किसी तरह का सम्बन्ध नहीं था, परन्तु इसलिए कि मैं एक नामी ऐयार का लड़का और खुद भी ऐयार था, तथा बहुत से ऐयारों से गहरी जान-पहिचान रखता था, मुझे चारों तरफ की खबरें बराबर मिला करती थीं, इस तरह जमानिया में जो कुछ चालबाजियाँ हुआ करती थीं, वह भी मुझसे छिपी हुई न थीं। भूतनाथ की स्त्री और मेरी स्त्री आपुस में मौसेरी बहिनें होती हैं और भूतनाथ को जमानिया से बहुत घना सम्बन्ध हो गया था, इसलिए जमानिया का हाल जानने के लिए मैं उद्योग भी किया करता था, मगर उसमें किसी तरह का दखल नहीं देता था। (दारोगा की तरफ इशारा करके) इस हरामखोर दारोगा ने रियासत पर अपना दबाव डालने की नीयत से विचित्र ढोंग रच लिया था, शादी नहीं की थी और बाबाजी तथा ब्रह्मचारी के नाम से अपने को प्रसिद्ध कर रक्खा था, बल्कि मौके-मौके पर लोगों से कहा करता था कि मैं तो साधू आदमी हूँ, मुझे रुपये-पैसे की जरूरत ही क्या है, मैं तो रियासत की भलाई और परोपकार में अपना समय बिताना चाहता हूँ, इत्यादि। परन्तु वास्तव में यह परले सिरे का ऐयाश, बदमाश और लालची था, जिनके विषय में कुछ विशेष कहना मैं पसन्द नहीं करता।

मेरे पिता और इन्द्रदेव के पिता दोनों दिली दोस्त और ऐयारी में एक ही गुरु के शिष्य थे, अतएव मुझमें और इन्द्रदेव में भी उसी प्रकार की दोस्ती और मुहब्बत थी, इसीलिए मैं प्रायः इन्द्रदेव से मिलने के लिए उनके घर जाया करता, और कभी-कभी वे भी मेरे घर आया करते थे। जरूरत पड़ने पर इन्द्रदेव की इच्छानुसार मैं उनका कुछ काम भी कर दिया करता और उन्हीं के यहाँ कभी-कभी इस कमबख्त दारोगा से भी मुलाकात हो जाया करती थी, बल्कि यों कहना चाहिए इन्द्रदेव ही के सबब से दारोगा जैपाल, राजा गोपालसिंह और भरतसिंह तथा जमानिया के और भी कई नामी आदमियों से मेरी मुलाकात और साहब सलामत हो गयी थी।

जब भूतनाथ के हाथ से बेचारा दयाराम मारा गया, तबसे मुझमें और भूतनाथ में एक प्रकार की खिंचाखिंची हो गयी थी और वह खिंचाखिंची दिनों-दिन बढ़ती ही गयी, यहाँ तक कि कुछ दिनों बाद हम दोनों की साहब सलामत छूट गयी।

एक दिन मैं इन्द्रदेव के यहाँ बैठा हुआ भूतनाथ के विषय में बातचीत कर रहा था, क्योंकि उन दिनों यह खबर बड़ी तेजी के साथ मशहूर हो रही थी कि ‘गदाधरसिंह (भूतनाथ) मर गया’। परन्तु उस समय इन्द्रदेव इस बात पर जोर दे रहे थे कि भूतनाथ मरा नहीं, कहीं छिप कर बैठ गया है, कभी-न-कभी यकायक प्रकट हो जायगा। इसी समय दारोगा के आने की इत्तिला मिली, जो बड़े शान-शौकत के साथ इन्द्रदेव से मिलने के लिए आया था। इन्द्रदेव बाहर निकलकर बड़ी खातिर के साथ इसे घर के अन्दर ले गये और अपने आदमियों को हुक्म दे गये कि दारोगा के साथ जो आदमी आये हैं, उनके खाने-पीने और रहने का उचित प्रबन्ध किया जाय।

दारोगा को साथ लिये हुए इन्द्रदेव उसी कमरे में आये, जिसमें मैं पहिले ही से बैठा हुआ था, क्योंकि इन्द्रदेव की तरह मैं दारोगा को लेने के लिए मकान के बाहर नहीं गया था और न दारोगा के आ पहुँचने पर मैंने उठकर उसकी इज्जत ही बढ़ायी, हाँ, साहब सलामत जरूर हुई। यह बात दारोगा को बहुत ही बुरी मालूम हुई, मगर इन्द्रदेव को नहीं, क्योंकि इन्द्रदेव गुरुभाई का सिर्फ नाता निबाहते थे, दिल से दारोगा की खातिर नहीं करते थे।

इन्द्रदेव और दारोगा में देर तक तरह-तरह की बातें होती रहीं, जिसमें मौके-मौके पर दारोगा अपनी होशियारी और बुद्धिमानी की तस्वीर खैंचता रहा। जब ऐयारों की कहानी छिड़ी तो वह यकायक मेरी तरफ पलट पड़ा और बोला, ‘‘आप इतने बड़े ऐयार के लड़के होकर घर में बेकार क्यों बैठे हैं, और नहीं तो मेरी ही रियासत में काम कीजिए, यहाँ आप तो बहुत ज्यादे इज्जत के लायक हैं।’’

मैं : मैं बेकार तो बैठा रहता हूँ, मगर अभी तक अपने को महाराज धौलपुर का नौकर समझता हूँ, क्योंकि रियासत का काम छोड़ देने पर भी वहाँ से मुझे खाने को बराबर मिल रहा है।

दारोगा: (मुँह बनाकर) अजी मिलता भी होगा तो क्या, एक छोटी-सी रकम से आपका क्या काम चल सकता है? आखिर अपने पल्ले की जमा तो खर्च करते होंगे।

मैं : यह भी तो महाराज का दिया हुआ है!

दारोगा : नहीं, वह आपके बाप का दिया हुआ है। खैर, मेरा मतलब यह है कि वहाँ से अगर कुछ मिलता है, तो उसे भी आप रखिए और मेरी रियासत से भी फायदा उठाइए।

मैं : ऐसा करना बेईमानी और नमकहरामी कहा जायगा और यह मुझसे न हो सकेगा।

दारोगा : (हँसकर) वाह वाह! ऐयार लोग दिन-रात ईमानदारी की हाँड़िया ही तो चढ़ाये रहते हैं!!

मैं : (तेजी के साथ) बेशक! अगर ऐसा न हो तो वह ऐयार नहीं रियासत का कोई ओहदेदार कहा जायगा!

दारोगा : (तनकर) ठीक है, गदाधरसिंह आपही का नातेदार तो है, जरा उसकी तस्वीर तो खैंचिए!

मैं : गदाधरसिंह किसी रियासत का ऐयार नहीं है और न मैं उसे ऐयार समझता हूँ, इतना होने पर भी आप यह साबित नहीं कर सकते कि उसने अपने मालिक के साथ किसी तरह की बेईमानी की।

दारोगा:(और भी तनक के) बस बस बस, रहने दीजिए, हमारे यहाँ भी बिहारीसिंह और हरनामसिंह तो ऐयार ही हैं।

मैं : इसी से तो मैं आपकी रियासत में जाना बेइज्जती समझता हूँ।

दारोगा : (भौं सिकोड़कर) तो इसका यह मतलब है कि हमलोग बेईमान और नमकहराम हैं!!

मैं : (मुस्कुराकर) इस बात को तो आप ही सोचिए!

दारोगा : देखिए जुबान सम्हालकर बात कीजिए, नहीं तो समझ रखिए कि मैं मामूली आदमी नहीं हूँ!!

मैं : (क्रोध से) यह तो मैं खुद कहता हूँ कि आप मामूली आदमी नहीं हैं, क्योंकि मामूली आदमी में शर्म होती है और वह जानता है कि ईश्वर भी कोई चीज है!

दारोगा : (क्रोध-भरी आँख दिखाकर) फिर वही बात!!

मैं : हाँ, वही बात! गोपालसिंह के पितावाली बात! गुप्त कमेटी की बात! गदाधरसिंह की दोस्तीवाली बात! लक्ष्मीदेवी की शादीवाली बात! और जो बात कि आपके गुरुभाई साहब को नहीं मालूम है, वह बात!!

दारोगा : (दाँत पीसकर और कुछ देर तक मेरी तरफ देखकर) खैर, अब इस बहुत-सी बात का जवाब लात ही से दिया जायगा।

मैं : बेशक, और साथ ही इसके यह भी समझ रखिए कि जवाब देनेवाले भी एक-दो नहीं हैं, लातों की गिनती भी आप सम्हाल न सकेंगे। दारोगा साहब जरा होश में आइये और सोच-विचार कर बातें कीजिए। अपने को आप ईश्वर न समझिए, बल्कि यह समझकर बातें कीजिए कि आप आदमी हैं और रियासत धौलपुर के किसी ऐयार से बातें कर रहे हैं।

दारोगा : (इन्द्रदेव की तरफ गुरेर कर) क्या आप चुपचाप बैठे तमाशा देखेंगे और अपने मकान में मुझे बेइज्जत करावेंगे।

इन्द्रदेव : आप तो खुद ही अपनी अनोखी मिलनसारी से अपने को बेइज्जत करा रहे हैं, इनसे बात बढ़ाने की आप को जरूरत ही क्या थी? मैं आप दोनों के बीच में नहीं बोल सकता, क्योंकि दलीपशाह को भी अपना भाई समझता और इज्जत की निगाह से देखता हूँ।

दारोगा : तो फिर जैसे बनें हम इनसे निपट लें!

इन्द्रदेव : हाँ हाँ!

दारोगा : पीछे उलाहना न देना, क्योंकि आप इन्हें अपना भाई समझते हैं!

इन्द्रदेव : मैं कभी उलाहना न दूँगा।

दारोगा : अच्छा तो अब मैं जाता हूँ, फिर कभी मिलूँगा तो बातें करूँगा।

इन्द्रदेव ने इस बात का कुछ जवाब न दिया, हाँ, जब दारोगा साहब बिदा हुए तो उन्हें दरवाजे तक पहुँचा आये। जब लौटकर कमरे में मेरे पास आये तो मुस्कुराते हुए बोले, ‘‘आज तो तुमने इसकी खूब खबर ली। ‘जो बात तुम्हारे गुरुभाई साहब को नहीं मालूम है वह बात’ इन शब्दों ने तो उसका कलेजा छेद दिया होगा। मगर तुमसे बेतरह रंज होकर गया, इस बात का खूब खयाल रखना।’’

मैं : आप इस बात की चिन्ता न कीजिए, देखिए मैं इन्हें कैसा छकाता हूँ। मगर वाह रे आप का कलेजा! इतना कुछ हो जाने पर भी आपने अपनी जुबान से कुछ न कहा। बल्कि पुराने बर्ताव में बल तक न पड़ने दिया।

इन्द्रदेव : मैंने तो अपना मामला ईश्वर के हवाले कर दिया है।

मैं : खैर, ईश्वर भी इन्साफ करेगा। अच्छा तो अब मुझे भी बिदा दीजिए, क्योंकि अब इसके मुकाबले का बन्दोबस्त शीघ्र करना पड़ेगा।

इन्द्रदेव : यह तो मैं कहूँगा कि आप बेफिक्र न रहिए। थोड़ी देर तक और बातचीत करने के बाद मैं इन्द्रदेव से बिदा होकर अपने घर आया और उसी समय से दारोगा के मुकाबले का ध्यान मेरे दिमाग, में चक्कर लगाने लगा।

घर पहुँचकर मैंने सब हाल अपनी स्त्री से बयान किया और ताकीद की कि हरदम होशियार रहा करना। उन दिनों मेरे यहाँ कई शागिर्द भी रहा करते थे, जिन्हें मैं ऐयारी सिखाता था। उनसे भी यह सब हाल कहा और होशियार रहने की ताकीद की। उन शागिर्दों में गिरिजाकुमार नाम का एक लड़का बड़ा ही तेज और चंचल था, लोगों को धोखे में डाल देना तो उसके लिए एक मामूली बात थी। बातचीत के समय वह अपना चेहरा ऐसा बना लेता था कि अच्छे-अच्छे उसकी बातों में फँसकर बेवकूफ बन जाते थे। यह गुण उसे ईश्वर का दिया हुआ था, जो बहुत कम ऐयारों में पाया जाता है। अस्तु, गिरजाकुमार ने मुझसे कहा कि ‘गुरुजी यदि दारोगावाला मामला आप मेरे सुपुर्द कर दीजिए, तो मैं बहुत ही प्रसन्न होऊँ और उसे ऐसा छकाऊँ कि वह भी याद करे, जमानिया में मुझे कोई पहिचानता भी नहीं है, अतएव मैं अपना काम बड़े मजे से निकाल लूँगा’।

मैंने उसे समझाया और कहा कि ‘कुछ दिन सब्र करो जल्दी क्यों करते हो, फिर जैसा मौका होगा किया जायेगा’ मगर उसने एक न माना। हाथ जोड़के, खुशामद करके, गिड़गिड़ाके, जिस तरह हो सका, उसने आज्ञा ले ही ली और उसी दिन सब सामान दुरुस्त करके मेरे यहाँ से चला गया। अब मैं थोड़ा-सा हाल गिरिजाकुमार का बयान करूँगा कि इसने दारोगा के साथ क्या किया।

आप लोगों को यह बात सुनकर ताज्जुब होगा कि मनोरमा असल में दारोगा साहब की रण्डी है, इन्हीं की बदौलत मायारानी के दरबार में उसकी इज्जत बढ़ी और इन्हीं की बदौलत उसने मायारानी को अपने फन्दे में फँसाकर बेहिसाब दौलत पैदा की। पहिले-पहिल गिरिजाकुमार ने मनोरमा के मकान ही पर दारोगा साहब से मुलाकात भी की थी।

दारोगा साहब मनोरमा से प्रेम रखते थे सही, मगर इसमें कोई शक नहीं कि इस प्रेम और ऐयाशी को इन्होंने बहुत अच्छे ढंग से छिपाया और बहुत आदमियों को मालूम न होने दिया तथा लोगों की निगाहों में साधु और ब्रह्मचारी ही बने रहे। स्वयं तो जमानिया में रहते थे, मगर मनोरमा के लिए, इन्होंने काशी में एक मकान भी बनवा दिया था, दसवें-बारहवें अथवा जब कभी समय मिलता, तेज घोड़े या रथ पर सवार होकर काशी चले जाते और दस-बारह घण्टे मनोरमा के मेहमान रहकर लौट जाते।

एक दिन दारोगा साहब आधी रात के समय मनोरमा के खास कमरे में बैठे हुए उसके साथ शराब पी रहे थे और साथ-ही-साथ हँसी-दिल्लगी का आनन्द भी लूट रहे थे। उस समय इन दोनों में इस तरह की बातें हो रही थीं–

दारोगा : जोकुछ मेरे पास है सब तुम्हारा है, रुपये-पैसे के बारे में तुम्हें कभी तकलीफ न दूँगा! तुम बेशक अमीराना ठाठ के साथ रहो और खुशी से जिन्दगी बिताओ। गोपालसिंह अगर तिलिस्म का राजा है तो क्या हुआ, मैं भी तिलिस्म का दारोगा हूँ, उसमें दो-चार स्थान ऐसे हैं कि जिनकी खबर राजा साहब को भी नहीं है, मगर मैं वहाँ बखूबी जा सकता हूँ और वहाँ की दौलत को खास अपनी मल्कियत समझता हूँ। इसके अतिरिक्त मायारानी से भी मैंने तुम्हारी मुलाकात करा दी है और वह भी हर तरह से तुम्हारी खातिर करती ही है, फिर तुम्हें परवाह किस बात की है?

मनोरमा : बेशक, मुझे किसी बात की परवाह नहीं है और आपकी बदौलत मैं बहुत खुश रहती हूँ, मगर मैं यह चाहती हूँ कि मायारानी के पास खुल्लम-खुल्ला मेरी आमदरफ्त हो जाय, अभी गोपालसिंह के डर से बहुत लुक-छिपकर और नखरे-तिल्ले के साथ जाना पड़ता है!

दारोगा  : फिर यह तो जरा मुश्किल बात है।

मनोरमा : मुश्किल क्या है? लक्ष्मीदेवी की जगह दूसरी औरत को राजरानी बना देना क्या साधारण काम था? सो तो आपने सहज ही में कर दिखाया और इस एक सहज काम के लिए कहते हैं कि मुश्किल है!

दारोगा : (मुस्कुराकर) सो तो ठीक है, गोपालसिंह को मैं सहज में बैकुण्ठ पहुँचा सकता हूँ, मगर यह काम मेरे किये न हो सकेगा, उसके ऊपर मेरा हाथ न उठेगा।

मनोरमा : (तिनककर) अब इतनी रहमदिली से तो काम न चलेगा! उनके मौजूद रहने से बहुत बड़ा हर्ज हो रहा है, अगर वह न रहें तो बेशक आप खुद जमानिया और तिलिस्म का राज्य कर सकते हैं, मायारानी तो अपने को आपका ताबेदार समझती हैं।

दारोगा : बेशक, ऐसा ही है मगर...

मनोरमा : और इसमें आपको कुछ करना भी न पड़ेगा, सब काम मायारानी ठीक कर लेंगी।

दारोगा:(चौंककर) क्या मायारानी का भी ऐसा इरादा है?

मनोरमा : जी हाँ, वह इस काम के लिए तैयार हैं, मगर आपसे डरती हैं, आप आज्ञा दें तो सबकुछ ठीक हो जाय।

दारोगा : तो तुम उसी की तरफ से इस बात की कोशिश कर रही हो?

मनोरमा : बेशक, मगर साथ ही इसमें आपका और अपना भी फायदा समझती हूँ, तब ऐसा कहती हूँ। (दारोगा के गले में हाथ डालकर) बस आप आज्ञा दे दीजिए।

दारोगा : (मुस्कुराकर) खैर, तुम्हारी खातिर मुझे मंजूर है, मगर एक काम करना कि मायारानी से और मुझसे इस बारे में बातचीत न करना, जिससे मौका पड़े तो मैं यह कहने लायक रह जाऊँ कि मुझे इसकी कुछ भी खबर नहीं। तुम मायारानी की दिलजमई करा दो कि दारोगा साहब इस बारे में कुछ भी न बोलेंगे, तुम जोकुछ चाहो कर गुजरो, मगर साथ ही इसके इस बात का खयाल रक्खो कि सर्वसाधारण को किसी तरह का शक न होने पावे और लोग यही समझें कि गोपालसिंह अपनी मौत से मरा है। मैं भी जहाँ तक हो सकेगा छिपाने की कोशिश करूँगा।

मनोरमा : (खुश होकर) बस, अब मुझे विश्वास हो गया कि तुम मुझसे प्रेम रखते हो।

इसके बाद दोनों में बहुत ही धीरे-धीरे कुछ बातें होने लगीं, जिन्हें गिरिजाकुमार सुन न सका। गिरिजाकुमार चोरों की तरह उस मकान में घुस गया था और छिपकर ये बातें सुन रहा था। जब मनोरमा ने कमरे का दरवाजा बन्द कर लिया, तब वह कमन्द लगाकर मकान के पीछे की तरफ उतर गया और धीरे-धीरे मनोरमा के अस्तबल में जा पहुँचा। अबकी दफे दारोगा, यहाँ रथ पर सवार होकर आया था, वह रथ अस्तबल में था, घोड़े बँधे हुए थे और सारथी रथ के अन्दर सो रहा था। इससे कुछ दूर पर मनोरमा के और सब साईस तथा घसियारे वगैरह पड़े खुर्राटे ले रहे थे।

बहुत होशियारी से गिरिजाकुमार ने दारोगा के सारथी को बेहोशी की दवा सुँघाकर बेहोश किया और उठाके बाग के एक कोने में घनी झाड़ी के अन्दर छिपाकर रख आया, उसके कपड़े आप पहिर लिए और चुपचाप रथ के अन्दर घुसकर सो रहा।

जब रात घण्टा-भर के लगभग बाकी रह गयी, तब दारोगा साहब जमानिया जाने के लिए बिदा हुए और एक लौंडी ने अस्तबल में आकर रथ जोतने की आज्ञा सुनायी, नये सारथी अर्थात् गिरिजाकुमार ने रथ जोतकर तैयार किया और फाटक पर लाकर दारोगा साहब का इन्तजार करने लगा। शराब के नशे में चूर झूमते और एक लौंडी का हाथ थामे हुए दारोगा साहब भी आ पहुँचे। उनके रथ पर सवार होने के साथ ही रथ तेजी के साथ रवाना हुआ। सुबह की ठण्डी हवा ने दारोगा साहब के दिमाग में खुनकी पैदा कर दी और वे रथ के अन्दर लेटकर बेखबर सो गये। गिरिजाकुमार ने जिधर चाहा घोड़ों का मुँह फेर दिया और दारोगा साहब को लेकर रवाना हो गया। इस तौर पर उसे सूरत बदलने की भी जरूरत न पड़ी।

नहीं कह सकते कि मनोरमा के बाग में दारोगा का असली सारथी जब होश में आया होगा तो वहाँ कैसी खलबली मची होगी, मगर गिरिजाकुमार को इस बात की कुछ भी परवाह न थी, उसने रथ को रोहतासगढ़ की सड़क पर रवाना किया और चलते-चलते अपने बटुए में से मसाला निकालकर अपनी सूरत साधारण ढंग पर बदल ली, जिसमें होश आने पर दारोगा उसकी सूरत से जानकार न हो सके, इसके बाद उसने दवा सुँघाकर दारोगा को और भी बेहोश कर दिया।

जब रथ एक घने जंगल में पहुँचा और सुबह की सुफेदी भी निकल आयी, तब गिरिजाकुमार रथ को सड़क पर से हटाकर जंगल में ले आया, जहाँ सड़क पर चलनेवाले मुसाफिरों की निगाह न पड़े। घोड़ों को खोल लम्बी बागडोर के सहारे एक पेड़ के साथ बाँध दिया और दारोगा को पीठ पर लाद वहाँ से थोड़ी दूर पर एक घनी झाड़ी के अन्दर ले गया, जिसके पास ही एक पानी का झरना बह रहा था। घोड़े की रास से दारोगा साहब को एक पेड़ के साथ बाँध दिया और बेहोशी दूर करने की दवा सुँघाने के बाद थोड़ा पानी भी चेहरे पर डाला, जिसमें शराब का नशा ठण्डा हो जाय और तब हाथ में कोड़ा लेकर सामने खड़ा हो गया।

दारोगा साहब जब होश में आये तो बड़ी परेशानी के साथ चारों तरफ निगाह दौड़ाने लगे। अपने को मजबूर और एक अनजान आदमी को हाथ में कोड़ा लिये सामने खड़ा देख काँप उठे और बोले, ‘‘भाई तुम कौन हो और मुझे इस तरह क्यों सता रक्खा है? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?’’

गिरिजाकुमार : क्या करूँ लाचार हूँ, मालिक का हुक्म ही ऐसा है!

दारोगा : तुम्हारा मालिक कौन है और उसने तुम्हें ऐसी आज्ञा क्यों दी?

गिरिजाकुमार : मैं मनोरमाजी का नौकर हूँ और उन्होंने अपना काम ठीक करने के लिए मुझे ऐसी आज्ञा दी है।

दारोगा : (ताज्जुब से) तुम मनोरमा के नौकर हो! नहीं नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, मैं उसके सब नौकरों को अच्छी तरह पहिचानता हूँ।

गिरिजाकुमार : मगर आप मुझे नहीं पहिचानते, क्योंकि मैं गुप्त रीति पर उनका काम किया करता हूँ और उनके मकान पर बराबर नहीं रहता!

दारोगा : शायद ऐसा हो मगर विश्वास नहीं होता, खैर, यह बताओ कि उन्होंने किस काम के लिए ऐसा करने को कहा है?

गिरिजाकुमार : आपको विश्वास हो चाहे न हो इसके लिए मैं लाचार हूँ, हाँ उनके हुक्म की तामील किये बिना नहीं रह सकता। उन्होंने मुझे यह कहा है कि ‘दारोगा साहब मायारानी के लिए इस बात की इज्जत दे गये कि वह जिस तरह हो सके राजा गोपालसिंह को मार डाले हम इस मामले में कुछ दखल न देंगे, मगर यह बात वह नशे में कह गये हैं, कहीं ऐसा न हो कि भूल जायँ, अस्तु, जिस तरह हो सके तुम इस बात की एक चीठी उनसे लिखाकर मेरे पास ले आओ, जिसमें उन्हें अपना वादा अच्छी तरह याद रहे’। अब आप कृपाकर इस मजमून की एक चीठी लिख दीजिए कि मैं गोपालसिंह को मार डालने के लिए मायारानी को इजाजत देता हूँ।

दारोगा : (ताज्जुब का चेहरा बनाकर) न मालूम तुम क्या कह रहे हो! मैंने मनोरमा से ऐसा कोई वादा नहीं किया!’

गिरिराजकुमार : तो शायद मनोरमाजी ने मुझसे झूठ कहा होगा, मैं इस बात को नहीं जानता, हाँ, उन्होंने जो आज्ञा दी है सो आप से कह रहा हूँ।

इतना सुनकर दारोगा कुछ सोच में पड़ गया। मालूम होता था कि उसे गिरिजाकुमार की बातों पर विश्वास हो रहा है, मगर फिर भी बात को टाला चाहता है।

दारोगा : मगर ताज्जुब है कि मनोरमा ने मेरे साथ ऐसा बुरा बर्ताव क्यों किया और उसे जो कुछ कहना था, वह स्वयं मुझसे क्यों नहीं कहा?

गिरिजाकुमार मैं इस बात का जवाब क्योंकर दे सकता हूँ?

दारोगा : अगर मैं तुम्हारे कहे मुताबिक चीठी लिखकर न दूँ तो?

गिरिजाकुमार : तब इस कोड़े से आप की खबर ली जायगी और जिस तरह हो सकेगा, आप से चीठी लिखायी जायगी। आप खुद समझ सकते हैं कि यहाँ आपका कोई मददगार नहीं पहुँच सकता।

दारोगा : क्या तुमको या मनोरमा को इस बात का कुछ भी खयाल नहीं है कि चीठी लिखकर भी छूट जाने के बाद मैं क्या कर सकता हूँ!!

गिरिजाकुमार : अब ये सब बातें तो आप उन्हीं से पूछियेगा, मुझे जवाब देने की कोई जरूरत नहीं, मैं सिर्फ उनके हुक्म की तामील करना जानता हूँ। बताइए जल्दी चीठी लिख देते हैं या नहीं, मैं ज्यादे देर तक इन्तजार नहीं कर सकता!

दारोगा : (झुँझलाकर और यह समझकर कि यह मुझ पर हाथ न उठावेगा केवल धमकाता है) अबे, मैं चीठी किस बात की लिख दूँ! व्यर्थ की बक-बक लगा रक्खी है!!

इतना सुनते ही गिरिजाकुमार ने कोड़े जमाने शुरू किये, पाँच-ही-सात कोड़े खाकर दारोगा बिलबिला उठा और हाथ जोड़कर बोला, ‘‘बस-बस, माफ करो, जो कुछ कहो मैं लिख देने को तैयार हूँ!’’

गिरिजाकुमार ने झट कलम-दावात और कागज अपने बटुए में से निकाल कर दारोगा के सामने रख दिया और उसके हाथ की रस्सी ढीली कर दी। दारोगा ने उसकी इच्छानुसार चीठी लिख दी। चीठी अपने कब्जे में कर लेने के बाद उसने दारोगा की तलाशी ली, कमर में खंजर और कुछ अशर्फियाँ निकालीं, वह भी ले लेने के बाद दारोगा के हाथ-पैर खोल दिये और बता दिया कि फलानी जगह आपके रथ और घोड़े हैं, जाइए कस-कसाकर अपने घर का रास्ता लीजिए।

इतना कह गिरिजाकुमार चला गया और फिर दारोगा को मालूम न हुआ कि वह कहाँ गया और क्या हुआ।’’

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