Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

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चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

दूसरा बयान


दलीपशाह ने फिर इस तरह अपना किस्सा कहना शुरू किया– ‘‘गिरिजाकुमार ने अपनी बातचीत में दारोगा और बिहारीसिंह को ऐसा उल्लू बनाया कि उन दोनों को गिरिजाकुमार पर पूरा-पूरा भरोसा हो गया और वह खुशी के साथ जमानिया में रहकर बेगम का इन्तजार करने लगा, बल्कि दारोगा के साथ जाकर उसके खास बाग का रास्ता और मायारानी को भी देख लिया। इधर अर्जुनसिंह गिरिजाकुमार की खोज में जमानिया गये, और मैं बेगम को गिरफ्तार करने के फेर में पड़ा।

‘‘पहिले तो मैं अपने घर गया और वहाँ से कई आदमियों का इन्तजाम करके लौटा। ठीक समय पर गंगा के किनारे उस ठिकाने पर पहुँच गया, जहाँ बेगम की किश्ती किनारे लगाकर लूट लेने की बातचीत कही-बदी थी।

‘‘मैं इस घटना का हाल बहुत बढ़ाकर न कहूँगा कि बेगम की किश्ती क्योंकर आयी और क्या-क्या हुआ तथा मैंने किसको, किस तरह गिरफ्तार किया-संक्षेप में केवल इतना कहूँगा कि बेगम पर मैंने कब्जा कर लिया और जो चीजें उसके पास थीं, सब ले ली गयीं। उन्हीं चीजों में ये सब कागज और वह हीरे की अँगूठी भी थी, जो भूतनाथ बेगम के यहाँ से ले आया है, और जो इस समय दरबार में मौजूद है। आगे चलकर मैं इन चीजों का हाल बयान करूँगा और यह कहूँगा कि ये सब चीजें मेरे कब्जे में आकर फिर क्योंकर निकल गयीं। इस समय मैं पुनः गिरिजाकुमार का हाल बायन करूँगा, जो उसी की जुबानी मुझे मालूम हुआ था।

‘‘गिरिजाकुमार जमानिया में बैठा हुआ दारोगा के साथ बेगम का इन्तजार कर रहा था। जब बेगम को लुटवाकर दोनों सिपाही जिनके साथ बेगम के भी दो आदमी थे और जिन्हें मैंने जानबूझकर छोड़ दिया था, रोते कलपते जमानिया पहुँचे तो सीधे दारोगा के पास चले गये। उस समय वहाँ सूरत बदले हुए असली बिहारीसिंह और गिरिजाकुमार भी बिहारीसिंह बना हुआ बैठा था। दारोगा के सिपाहियों और बेगम के आदमियों ने अपनी बरबादी और बेगम के लुट जाने का हाल बयान किया, जिसे सुनते ही दारोगा को ताज्जुब और रंज हुआ। उसने गिरिजाकुमार की तरफ देखकर कहा, ‘‘यह कार्रवाई किसने की होगी?’’

गिरिजाकुमार : खुद बेगम ने या फिर भूतनाथ ने! (बेगम के आदमियों की तरफ देखके) क्यों जी, मैं समझता हूँ कि शायद महीने-भर के लगभग हुआ होगा, जब एक दिन भूतनाथ मेरे साथ बेगम के यहाँ गया था। उस समय तुम भी तो वहाँ थे, क्या तुमने मुझे पहिचाना था।

बेगम का आदमी : जी नहीं, मैंने आपको नहीं पहिचाना था।

गिरिजाकुमार : (दारोगा की तरफ देखके) आपही के कहे मुताबिक मैं दो-तीन दफे भूतनाथ के साथ बेगम के यहाँ गया था, पर वास्तव में भूतनाथ अच्छा आदमी है और ये लोग भी बड़ी मुस्तैदी के साथ वहाँ रहते हैं। (बेगम के आदमियों की तरफ देखके) क्यों जी, है न यही बात?

बेगम का आदमी : (हाथ जोड़ के) जी हाँ सरकार!

बेगम के आदमियों की जुबान से गिरिजाकुमार ने बड़ी खूबी के साथ ‘जी हाँ सरकार’ कहलवा लिया। इसमें कोई शक नहीं कि भूतनाथ के यहाँ जाया करता था और गिरिजाकुमार को यह हाल मालूम था, मगर ऐसे मौके पर उसके आदमियों की जुबान से ‘हाँ’ कहला लेना मामूली बात न थी। उन खुशामदी आदमियों ने यह सोचकर की जब खुद बिहारीसिंह भूतनाथ के साथ अपना जाना कबूल करते हैं तो ‘हाँ’ कहना ही अच्छा है–‘‘जी हाँ, सरकार’’ कह दिया और गिरिजाकुमार, दारोगा तथा बिहारीसिंह की निगाह में सच्चा बन बैठा। साथ ही इसके गिरिजाकुमार, दारोगा से पहिले ही कह चुका था कि बेगम आवेगी तो मैं बात-ही-बात में किसी तरह साबित कर दूँगा कि भूतनाथ उसके यहाँ आता-जाता है, वह बात भी दारोगा को खूब याद थी। अस्तु, दारोगा को गिरिजाकुमार पर और भी विश्वास हो गया। उसने गिरिजाकुमार का इशारा पाकर बेगम के दोनों आदमियों को बिना कुछ कहे थोड़ी देर के लिए बिदा किया और आपुस में इस तरह बातचीत करने लगा।

दारोगा : कुछ समझ में नहीं आता कि क्या मामला है!

गिरिजाकुमार : अजी यह उसी कमबख्त भूतनाथ की बदमाशी है और दोनों की मिली-जुली गठन है। बेगम जान-बूझकर यहाँ नहीं आयी। अगर वह आती तो उसके आदमियों की तरह खास उसकी जुबान से भी मैं इस बात को साबित करा देता कि उससे और भूतनाथ से ताल्लुक है और इसीलिए मैं अभी तक बिहारीसिंह बना हुआ था, मगर खैर कोई चिन्ता नहीं, मैं बहुत जल्द इन सब भेदों का पूरा-पूरा पता लगा लूँगा और भूतनाथ को भी गिरफ्तार कर लूँगा!

दारोगा : तो अब देर क्यों करते हो?

गिरिजाकुमार : कुछ नहीं, कल मेरे साथ चलने के लिए बिहारीसिंह तैयार हो जाँय।

बिहारी : अच्छी बात है, यह बताओ कि किस सूरत और शक्ल में सफर किया जायगा।

गिरिजाकुमार : मैं तो एक ज्योतिषी की सूरत बनूँगा और आप...

बिहारी : मैं वैद्य बनूँगा।

गिरिजाकुमार : बस बस, यही ठीक है, मगर एक बात मैं अभी से कहे देता हूँ कि दो घण्टे के लिए मैं गुरुजी से मिलने जरूर जाऊँगा।

बिहारी : क्या हर्ज है, अगर कहोगे तो मैं भी तुम्हारे साथ चला चलूँगा या कहीं अटक जाऊँगा।

‘‘मुख्तसर यह कि दूसरे दिन दोनों ऐयार ज्योतिषी और वैद्य बने हुए जमानिया के बाहर निकले।

‘‘मजा तो यह कि गिरिजाकुमार ने चालाकी से उस समय तक किसी को अपनी सूरत देखने नहीं दी। जब तक वहाँ रहा बिहारीसिंह ही बना रहा, जब बाहर निकला तो ज्योतिषी बनकर निकला। खैर, दारोगा का तो कहना ही क्या है, खुद बिहारीसिंह और हरनामसिंह व्यर्थ ही ऐयार कहलाये, असल में कोई अच्छा काम इन दोनों के हाथों से होता नहीं सुना गया।

‘‘अब हम थोड़ा-सा हाल अर्जुनसिंह का बयान करते हैं, जो गिरिजाकुमार का पता लगाने के लिए हमसे जुदा होकर जमानिया गये थे। जमानिया में रामसरन नामी एक महाजन अर्जुनसिंह का दोस्त था। अस्तु, ये सूरत बदले हुए सीधे उसी के मकान पर चले गये और मौका पाकर उससे मुलाकात करने के बाद, सब हाल बयान किया और उससे मदद चाही। पहिले तो वह दारोगा और मायारानी के खिलाफ कर्रवाई करने के नाम से बहुत डरा, मगर अर्जुनसिंह ने उसे बहुत भरोसा दिलाया और कहा कि जोकुछ हम करेंगे वह ऐसे ढंग से करेंगे कि तुम पर किसी को किसी तरह का शक न होगा, इसके अतिरिक्त हम तुमसे और किसी तरह की मदद नहीं चाहते केवल एक गुप्त कोठरी ऐसे ढंग की चाहते है, जिसमें अगर हम किसी को गिरफ्तार करके लावें तो दो-चार दिन के लिए कैद कर रक्खें और यह काम भी ऐसी खूबी के साथ किया जायगा कि कैदी को इस बात का गुमान भी न होगा कि वह कहाँ और किसके मकान में कैद किया गया था।

‘‘खैर, रामसरन ने किसी तरह अर्जुनसिंह की बात मंजूर कर ली और तब अर्जुनसिंह उसके मकान से बाहर निकलकर हरनामसिंह को फँसाने की फिक्र करने लगे, क्योंकि इन्होंने निश्चय कर लिया था कि बिना किसी को फँसाए हुए गिरिजाकुमार का पता लगाना कठिन ही नहीं, बल्कि असम्भव है।

‘‘मुख्तसर यह कि दो दिन की कोशिश में अर्जुनसिंह ने भुलावा दे हरनामसिंह को गिरफ्तार कर लिया, उसे रामसरन के मकान की एक अँधेरी कोठरी में ले जाकर कैद किया, तथा खाने-पीने का भी प्रबन्ध कर दिया हरनामसिंह को यह मालूम न हुआ कि उसे किसने कैद किया है और वह किस स्थान पर रक्खा गया है, तथा उसे खाने-पीने को कौन देता है। इस काम से छुट्टी पाकर हरनामसिंह की सूरत बन अर्जुनसिंह दारोगा के दरबार में जा घुसे और इस तरकीब से बहुत जल्द गिरिजाकुमार को पहिचान लिया और उसका पता लगा लिया। गिरिजाकुमार ने जिस चालाकी से अपने को बचा लिया था, उसे जानकर उसकी बुद्धिमानी पर अर्जुनसिंह को आश्चर्य हुआ, मगर भण्डा फूटने के डर से वे अपने को बहुत ही बचाये हुए थे और दारोगा और असली बिहारीसिंह से सिर दर्द का बहाना करके बातचीत कम करते थे।

‘‘जब बिहारीसिंह को साथ लेकर गिरिजाकुमार शहर के बाहर निकला तो अर्जुनसिंह ने भी सूरत बदलकर उनका पीछा किया। जब दोनों मुसाफिर एक मंजिल रास्ता तय कर चुके, तो दूसरे दिन सफर में एक जगह मौका पाकर और कुछ देर के लिए गिरिजाकुमार को अकेला देखकर अर्जुनसिंह उसके पास चले गये और उन्होंने अपने को उस पर प्रकट कर दिया। जल्दी-जल्दी बातचीत करके इन्होंने उसे यह बता दिया कि उसके जमानिया चले जाने के बाद क्या हुआ, तथा अब उसे क्या और किस ढंग पर कार्रवाई करना चाहिए और हमसे-तुमसे कहाँ-कहाँ किस-किस मौके पर या कैसी सूरत में मुलाकात होगी।

‘‘अर्जुनसिंह ने गिरिजाकुमार को जोकुछ समझाया, उसका हाल आगे चलकर मालूम होगा। इस जगह केवल इतना ही कहना काफी है कि गिरिजाकुमार को समझाकर अर्जुनसिंह फिर जमानिया चले गये और रात के समय हरनामसिंह को बेहोश करके कैदखाने से निकाला, शहर के बाहर बहुत दूर मैदान में ले जाकर छोड़ दिया और अपना रास्ता पकड़ा, जिसमें होश में आकर वह अपने घर चला जाय और उसे मालूम न हो कि उसके साथ किसने क्या सलूक किया, बल्कि यह बात उसे स्वप्न की तरह याद रहे।

‘‘इसके बाद अर्जुनसिंह बहुत जल्द मेरे पास पहुँचे और जोकुछ हो चुका था, उसे बयान किया। गिरिजाकुमार का हाल सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और मैंने बेगम के साथ जोकुछ सलूक किया था, उसका हाल अर्जुनसिंह से बयान किया, तथा जोकुछ चीजें उसकी मेरे हाथ लगी थीं, दिखाकर यह भी कहा कि बेगम अभी तक मेरे यहाँ कैद है। अस्तु, सोचना चाहिए कि अब उसके साथ क्या कार्रवाई की जाय?

‘‘उन दिनों असल में मुझे तीन बातों की फिक्र लगी थी। एक तो यह कि यद्यपि भूतनाथ और मुझसे रंज चला आता था और भूतनाथ ने अपना मरना मशहूर कर दिया था, मगर भूतनाथ की स्त्री मेरे यहाँ आयी हुई थी और उसकी अवस्था पर मुझे दुःख होता था, इसलिए मैं चाहता था कि किसी तरह भूतनाथ से मुलाकात हो और मैं उसे समझा-बुझाकर ठीक रास्ते पर लाऊँ, दूसरे यह कि राजा गोपालसिंह के मरने का असली सबब दरियाफ्त करूँ और तीसरे बलभद्रसिंह तथा लक्ष्मीदेवी को दारोगा की कैद से छुड़ाऊँ, जिनका कुछ-कुछ हाल मुझे मालूम हो चुका था। बस इन्हीं कामों के लिए हम लोगों ने इतनी मेहनत अपने सिर उठायी थी, नहीं तो जमानिया के बारे में हम लोगों के लिए अब किसी तरह की दिलचस्पी नहीं रह गयी थी।

‘‘बेगम की जो चीजें मेरे हाथ लगी थीं, उनमें से कई कागज और एक हीरे की अँगूठी ऐसी थी, जिस पर ध्यान देने से हम लोगों को मालूम हो गया कि बेगम भी कोई साधारण औरत नहीं थी। उन कागजों में से कई चीठियाँ ऐसी थीं, जिनके पढ़ने से मालूम होता था कि मायारानी के बाप को इसी जैपाल ने मायारानी और दारोगा की इच्छानुसार मारकर जहन्नुम में पहुँचा दिया है और बलभद्रसिंह अभी तक जीता है, मगर साथ ही इसके उन चीठियों से यह भी जाहिर होता था कि असली लक्ष्मीदेवी निकलकर भाग गयी, जिसका पता लगाने के लिये दारोगा बहुत उद्योग कर रहा है, मगर पता नहीं लगता। वह जो हीरे की अँगूठी थी, वह वास्तव में हेलासिंह (मायारानी के बाप) की थी, जो उसके मरने के बाद जैपाल के हाथ लगी थी। उस अँगूठी के साथ एक कागज का पुर्जा बँधा हुआ था, जिस पर बलभद्रसिंह को कैद में रखने और हेलासिंह को मार डालने की आज्ञा थी और उस पर मायारानी तथा दारोगा दोनों के हस्ताक्षर थे।

‘‘वे कागज पुर्जे और अँगूठी इस समय महाराज के दरबार में मौजूद है, जो भूतनाथ बेगम के यहाँ से उस समय ले आया था, जब वह असली बलभद्रसिंह को छुड़ाने के लिए गया था। आप लोगों को इस बात पर आश्चर्य होगा कि जब ये सब चीजें बेगम के गिरफ्तार करने पर मेरे कब्जे में आ चुकी थीं, तो पुनः बेगम के कब्जे में कैसे चली गयीं? इसके जवाब में केवल इतना ही कह देना काफी है कि जब बेगम मेरे कब्जे से निकल गयी तो वे चीजें भी उसी के साथ जाती रहीं और फिर मैं भी बेगम तथा दारोगा के कब्जे में चला गया और इन सब बातों का कर्ता-धर्ता भूतनाथ ही है, जिसने उस समय बहुत बड़ा धोखा खाया और जिसके सबब से कुछ दिन बाद उसे भी तकलीफ उठानी पड़ी। मैंने यह भी सुना था कि अपनी इस भूल से शर्मिन्दा होकर भूतनाथ ने बेगम और जैपाल को बड़ी तकलीफें दीं, मगर उसका नतीजा उस समय कुछ भी न निकला, खैर, अब मैं पुनः अपने किस्से की तरफ झुकता हूँ।’’

दलीपशाह की इस बात को सुनकर महाराज ने पुनः उस हीरे की अँगूठी और उन चीठियों को देखने की इच्छा प्रकट की, जो भूतनाथ बेगम के यहाँ से उठा लाया था। तेजसिंह ने पहिले महाराज को और फिर और लोगों को भी वे चीजें दिखायीं और इसके बाद फिर दलीपशाह ने इस तरह अपना हाल बयान करना शुरू किया– ‘‘अर्जुनसिंह ज्यादे देर तक मेरे पास नहीं ठहरे, उस समय जोकुछ हम लोगों को करना चाहिए था, बहुत जल्द निश्चय कर लिया गया और इसके बाद अर्जुनसिंह के साथ मैं घर से बाहर निकला और हम दोनों मित्र गिरिजाकुमार की तरफ रवाना हुए।

‘‘अब गिरिजाकुमार का हाल सुनिए कि अर्जुनसिंह से मिलने के बाद फिर क्या हुआ।

‘‘बिहारीसिंह और गिरिजाकुमार दोनों आदमी सफर करते हुए, एक ऐसे स्थान में पहुँचे, जहाँ से बेगम का मकान केवल पाँच कोस की दूरी पर था। यहाँ पर एक छोटा गाँव था, जहाँ मुसाफिरों के लिए खाने-पीने की मामूली चीजें मिल सकती थीं, और जिसमें हलवाई की एक छोटा-सी दूकान भी थी। गाँव के बाहरी प्रान्त में जमींदारों के देहाती ढंग के बगीचे थे और पास ही में पलाश का छोटा-सा जंगल भी था। सन्ध्या होने में घण्टे-भर की देर भी और बिहारीसिंह चाहता था कि हम लोग बराबर चले जाँय, दो-तीन घण्टे रात जाते बेगम के मकान तक पहुँच ही जायँगे, मगर गिरिजाकुमार को यह बात मंजूर न थी। उसने कहा कि मैं बहुत थक गया हूँ और अब एक कोस भी आगे नहीं चल सकता, इसलिए यही अच्छा होगा कि आज की रात इसी गाँव के बाहर किसी बगीचे अथवा जंगल में बिता दी जाय।

‘‘यद्यपि दोनों की राय दो तरह की थी, मगर बिहारीसिंह को लाचार हो गिरिजाकुमार की बात माननी पड़ी और यह निश्चय करना ही पड़ा कि आज की रात अमुक बगीचे में बितायी जायगी। अस्तु, सन्ध्या हो जाने पर दोनों आदमी गाँव में हलवाई की दूकान पर गये और वहाँ पूरी तरकारी बनवाकर पुनः गाँव के बाहर चले आये।

‘‘चाँदनी निकली हुई थी और चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। बिहारीसिंह और गिरिजाकुमार एक पेड़ के नीचे बैठे हुए धीरे-धीरे भोजन और निम्नलिखित बातें करते जाते थे–

गिरिजाकुमार : आज की भूख में ये पूरियाँ बड़ा ही मजा दे रही हैं।

बिहारी : यह भूख ही के कारण नहीं, बल्कि बनी भी अच्छी है, इसके अतिरिक्त तुमने आज बूटी (भांग) भी गहरी पिला दी है।

गिरिजाकुमार : अजी इस बूटी की बदौलत तो सफर की हरारत मिटेगी।

बिहारी : मगर नशा तो तेज हो रहा है और अभी तक बढ़ता ही जाता है।

गिरिजाकुमार : तो हम लोगों को करना ही क्या है?

बिहारी : और कुछ नहीं तो अपने कपड़े-लत्ते और बटुए का तो खयाल है ही।

गिरिजाकुमार : (हँसकर) मजा तो तब हो जो इस समय भूतनाथ का सामना हो जाय।

बिहारी : हर्ज ही क्या है? मैं इस समय भी लड़ने को तैयार हूँ, मगर वह बड़ा ताकतवर और काइयाँ ऐयार है।

गिरिजाकुमार : उसकी कदर तो राजा गोपालसिंह जानते थे।

बिहारी : मेरे खयाल से तो यह बात नहीं है।

गिरिजाकुमार : तुम्हें खबर नहीं है, अगर मौका मिला तो इस बात को साबित कर दूँगा।

बिहारी : किस ढंग से साबित करोगे?

गिरिजाकुमार : खुद राजा गोपालसिंह की जुबान से।

बिहारी : (हँसकर) क्या भंग के नशे में पागल हो गये हो? राजा गोपालसिंह अब कहाँ हैं?

गिरिजाकुमार : असल तो बात यह है कि मुझे राजा गोपालसिंह के मरने का विश्वास ही नहीं है।

बिहारी : (चौकन्ना होकर) सो क्या? तुम्हारे पास उनके जीते रहने का क्या सबूत है?

गिरिजाकुमार : बहुत कुछ सबूत है, मगर इस विषय पर मैं हुज्जत या बहस करना पसन्द नहीं करता, जोकुछ असल बात है, तुम स्वयं जानते हो, अपने दिल से पूछ लो!

बिहारी: मैं तो यही जानता हूँ कि राजा साहब मर गये।

गिरिजाकुमार : खैर, यह तो मैं कह चुका हूँ कि इस विषय पर बहस न करूँगा।

बिहारी : मगर बताओ तो सही कि तुमने क्या समझ के ऐसा कहा?

गिरिजाकुमार : मैं कुछ भी न बताऊँगा।

बिहारी : फिर हमारी-तुम्हारी दोस्ती ही क्या ठहरी, जो एक जरा-सी बात छिपा रहे हो और पूछने पर भी नहीं बताते।

गिरिजाकुमार (हँसकर) तुम्हें ऐसा कहने का हक नहीं है, जब तुम खुद दोस्ती का खयाल न करके ये बातें छिपा रहे हो, तो मैं क्यों बताऊँ!

बिहारी : (संकोच के साथ) मैं तो कुछ भी नहीं छिपाता।

गिरिजाकुमार : अच्छा मेरे सर पर हाथ रखकर कह तो दो कि वास्तव में राजा साहब मर गये। मैं अभी साबित कर देता हूँ कि तुम छिपाते हो या नहीं। अगर तुम सच कह दोगे तो मैं भी बता दूँगा कि इसमें कौन-सी नयी बात पैदा हो गयी और क्या रंग खिला चाहता है!

बिहारी : (कुछ सोचकर) पहिले तुम बताओ फिर मैं बताऊँगा।

गिरिजाकुमार : ऐसा नहीं हो सकता।

‘‘इस समय बिहारीसिंह नशे में मस्त था, एक तो गिरिजाकुमार ने उसे भंग पिला दी थी, दूसरे जो उसने पूरियाँ खायी थीं, उसमें भी एक प्रकार का बेढब नशा मिला हुआ था, क्योंकि वास्तव में उस हलवाई के यहाँ अर्जुनसिंह नें पहिले से ही प्रबन्ध कर लिया था और ये बातें गिरिजाकुमार से कही-बदी थीं जैसाकि ऊपर के बयान से आपको मालूम हो चुका है। अस्तु, गिरिजाकुमार ने पहिले ही से एक दवा खा ली थी, जिससे उन पूरियों का असर उस पर कुछ भी न हुआ, मगर बिहारीसिंह धीरे-धीरे अलमस्त हो गया और थोड़ी ही देर में बेहोश होनेवाला था। वह ऐसा मस्त और दिल खुश करनेवाला नशा था, जिसके बस में होकर बिहारीसिंह ने अपने दिल का भेद खोल दिया, मगर अफसोस भूतनाथ नें हमारी कुल मेहनत पर मिट्टी डाल दिया और हम लोगों को बरबाद कर दिया। उस भेद का पता लग जाने पर भी हम लोग कुछ न कर सके, जिसका सबब आगे चलकर आपको मालूम होगा। जब गिरिजाकुमार और बिहारीसिंह से बातें हो रही थीं, उस समय हम दोनों मित्र भी वहाँ से थोड़ी ही दूर पर छिपे हुए खड़े थे और इन्तजार कर रहे थे कि बिहारीसिंह बेहोश हो जाय और गिरिजाकुमार बुलाये तो हम दोनों भी वहाँ जा पहुँचें।

गिरिजाकुमार ने पुनः जोर देकर कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता, पहिले तुम्हीं को दिल का परदा खोलके और सच्चा-सच्चा हाल कहके दोस्ती का परिचय देना चाहिए और यह बात मुझसे छिपी नहीं रह सकती कि तुमने सच कहा या झूठ, क्योंकि जोकुछ भेद है, उसे मैं खूब जानता हूँ।’’

बिहारी : मुझे भी ऐसा ही मालूम होता है, खैर, अब मैं कोई बात तुमसे न छिपाऊँगा, सब भेद साफ कह दूँगा। मगर इस समय केवल इतना ही कहूँगा कि वास्तव में राजा साहब मरे नहीं, बल्कि अभी तक जीते हैं।

गिरिजाकुमार : इतना तो मैं खुद कह चुका हूँ, इससे कुछ ज्यादा कहो तो मुझे विश्वास हो।

‘‘गिरिजाकुमार की बात का बिहारीसिंह कुछ जवाब दिया ही चाहता था कि सामने से एक आदमी आता हुआ दिखायी पड़ा जो पास आते ही चाँदनी के सबब से बहुत जल्द पहिचान लिया गया कि भूतनाथ है। बिहारीसिंह ने, जो भूतनाथ को देखकर घबड़ा गया था गिरिजाकुमार से कहा, ‘‘लो सम्हल जाओ, भूतनाथ आ पहुँचा!’’ दोनों आदमी सम्हल कर खड़े हो गये और भूतनाथ भी वहाँ पहुँचकर दिलेराना ढंग पर उन दोनों के सामने अकड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘तुम दोनों को मैं खूब पहिचानता हूँ और यकीन है कि तुम लोगों ने भी मुझे पहिचान लिया होगा कि यह भूतनाथ है।

बिहारी : बेशक मैंने तुमको पहिचान लिया, मगर तुमको हम लोगों के बारे में धोखा हुआ है।

भूतनाथ : (हँसकर) मैं तो कभी धोखा खाता ही नहीं! मुझे खूब मालूम है कि तुम दोनों बिहारीसिंह और गिरिजाकुमार हो और साथ ही इसके मुझे यह भी मालूम है कि तुम लोग मुझे गिरफ्तार करने के लिए जमानिया से बाहर निकले हो! मुझे तुम अपने ऐसा बेवकूफ न समझो। (गिरिजाकुमार की तरफ बताकर) जिसे तुम लोगों ने आज तक नहीं पहिचाना और जिसे तुम अभी तक शिवशंकर समझते हो, उसे मैं खूब जानता हूँ कि यह दलीपशाह का शागिर्द गिरिजाकुमार है। जरा सोचो तो सही कि तुम्हारे ऐसा बेवकूफ आदमी मुझे क्या गिरफ्तार करेगा, जिसे एक लौंडे (गिरिजाकुमार) ने धोखे में डालकर उल्लू बना दिया और जो इतने दिनों तक साथ रहने पर भी गिरिजाकुमार को पहिचान न सका। खैर, इसे जाने दो पहिले अपनी हिम्मत और बहादुरी ही का अन्दाज कर लो, देखो मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, मुझे गिरफ्तार करो तो सही!

‘‘भूतनाथ की बातें सुनकर बिहारीसिंह हैरान बल्कि बदहवास हो गया,  क्योंकि वह भूतनाथ के जीवट और उसकी ताकत को खूब जानता था और उसे विश्वास था कि इस तरह खुले मैदान भूतनाथ को गिरफ्तार करना दो-चार आदमियों का काम नहीं है। साथ ही वह, यह सुनकर और भी घबड़ा गया कि हमारा साथी वास्तव में शिवशंकर या हमारा मददगार नहीं है, बल्कि हमें धोखे में डालकर उल्लू बनाने और भेद ले लेनेवाला एक चालाक ऐयार है। इससे मैंने जो गोपालसिंह के जीते रहने का भेद बता दिया, सो अच्छा नहीं किया।

इसी घबराहट में बिहारीसिंह का नशा पूरे दर्जे पर पहुँच गया और सिर नीचा करके सोचता-ही-सोचता वह बेहोश होकर जमीन पर लम्बा हो गया। उस समय गिरिजाकुमार की तरफ देखके भूतनाथ ने कहा, ‘‘तुम इस बात का खयाल छोड़ दो कि मेरे सामने से भाग जाओगे या चिल्लाकर लोगों को इकट्ठा कर लोगे।’’

गिरिजाकुमार : मगर मुझसे आपको किसी तरह की दुश्मनी न होनी चाहिए, क्योंकि मैंने अपका कुछ नुकसान नहीं किया है।

भूतनाथ : सिवाय इसके कि मुझे गिरफ्तार करने की फिक्र में थे।

गिरिजाकुमार : कदापि नहीं, यह तो एक तरकीब थी, जिससे कि मैंने अपने को कैद होने से बचा लिया, यही सबब था कि इस समय मैंने इसे (बिहारीसिंह को) धोखा देकर बेहोशी की दवा खिला दी और बाँधकर अपने घर ले जानेवाला था।

भूतनाथ : तुम्हारी बातें मान लेने के योग्य हैं, मगर मैं इस बात को भी खूब जानता हूँ कि तुम बड़े बातूनी हो और बातों के जाल में बड़े-बड़े चालाकों को फँसाकर उल्लू बना सकते हो।

‘‘इतना कहकर भूतनाथ ने अपनी जेब में से कपड़े का एक टुकड़ा निकालकर गिरिजाकुमार के मुँह पर रख दिया और फिर गिरिजाकुमार को दीन-दुनिया की कुछ भी खबर नहीं रही। इसके बाद क्या हुआ, सो उसे मालूम नहीं और न मैं ही जानता हूँ, क्योंकि इस विषय में मैं वही बयान करूँगा, जो गिरिजाकुमार ने मुझसे कहा था।

‘‘हम दोनों मित्र जो उस समय छिपे हुए थे, बैठे-बैठे घबड़ा गये और जब लाचार होकर उस बाग में गये तो न गिरिजाकुमार को देखा, न बिहारीसिंह को पाया। कुछ पता न लगा कि दोनों कहाँ गये, क्या हुए, या उन पर कैसी बीती। बहुत खोजा, पता लगाया, कई दिन तक उस इलाके में घूमते रहे, मगर नतीजा कुछ न निकला। लाचार अफसोस करते हुए घर की तरफ लौट आये।

‘‘अब बहुत विलम्ब हो गया, महाराज भी घबड़ा गये होंगे। (जीतसिंह की तरफ देखकर) यदि आज्ञा हो तो मैं अपनी राम-कहानी यहाँ पर रोक दूँ, और जोकुछ बाकी है, उसे कल के दरबार में बयान करूँ।’’

इतना कहकर दलीपशाह चुप हो गया और महाराज का इशारा पाकर जीतसिंह ने उसकी बात मंजूर कर ली। दरबार बर्खास्त हुआ और लोग अपने-अपने डेरे की तरफ रवाना हुए।

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