Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

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चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

चौथा बयान


रात आधी से कुछ ज्यादे जा चुकी है। महाराज सुरेन्द्रसिंह के कमरे में राजा बीरेन्द्रसिंह, राजा गोपालसिंह, कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, तारासिंह, भैरोसिंह, भूतनाथ और इन्द्रदेव बैठे आपुस में धीरे-धीरे बातें कर रहे हैं। वृद्ध महाराज सुरेन्द्रसिंह मसहरी पर लेटे हुए हैं।

सुरेन्द्र : दलीपशाह की जीवनी ने दारोगा की शैतानी और भी अच्छी तरह झलका दी।

जीत : बेशक ऐसा ही है, सच तो यों है कि ईश्वर ही ने इन पाँचों कैदियों की रक्षा की, नहीं तो दारोगा ने कोई बात उठा नहीं रक्खी थी।

भूतनाथ : साथ ही इसके यह भी है कि सबसे ज्यादे दलीपशाह के किस्से ने दरबार में मुझे शर्मिन्दा किया, मगर क्या करूँ लाचार था कि चालबाज दारोगा ने दलीपशाह की चीठियों का मुझे ऐसा मतलब समझाया कि मैं अपने आपे से बाहर हो गया, बल्कि यों कहना चाहिए कि अन्धा हो गया!

तेज : वह जमाना ही चालबाजियों का था और चारों तरफ ऐसी ही बातें हो रही थीं। भूतनाथ, तुम अब उन बातों को एकदम से भूल जाओ और जिस नेक रास्ते पर चल रहे हो, उसी का ध्यान रक्खो।

जीत : अच्छा तो अब कैदियों के बारे में जोकुछ हो फैसला कर ही देना चाहिए, जिसमें अगले दरबार में उन्हें फैसला सुना दिया जाय।

सुरेन्द्र : (गोपालसिंह से) कहो साहब तुम्हारी क्या राय है, किस-किस कैदी को क्या-क्या सजा देनी चाहिए?

गोपाल : जो दादाजी (महाराज) की इच्छा हो हुक्म दें, मेरी प्रार्थना केवल इतनी ही है कि कमबख्त दारोगा मेरे हवाले किया जाय और मुझे हुक्म हो जाय कि जो मैं चाहूँ उसे सजा दूँ।

सुरेन्द्र : केवल दारोगा ही नहीं, बल्कि तुम्हारे और कैदी भी तुम्हारे हवाले किये जायेंगे।

गोपाल : और दलीपशाह, अर्जुनसिंह, भरतसिंह, हरदीन और गिरिजाकुमार भी मुझे दिये जायें, क्योंकि ये लोग मेरे सहायक हैं और इनके साथ रहकर मेरा दिन बड़ी खुशी के साथ बीतेगा!

सुरेन्द्र : (जीतसिंह से) ऐसा ही किया जाय।

जीत : बहुत अच्छा, मैं नम्बरवार कैदियों के बारे में जो कुछ हुक्म होता है, लिखता जाता हूँ।

इतना कहकर जीतसिंह ने कलम-दवात और कागज ले लिया और महाराज की आज्ञानुसार इस तरह लिखने लगे–

(१)  कमबख्त दारोगा सजा पाने के लिए राजा गोपालसिंह के हवाले किया जाय, राजा साहब जो मुनासिब समझें, उसे सजा दें।

(२) शिखण्डी (दारोगा का चचेरा भाई) मायाप्रसाद, जैपाल, हरनामसिंह, बिहारीसिंह, हरनामसिंह की लड़की, लीला, मनोरमा, नागर, बेगम, नौरतन, और जमालो वगैरह भी, जिन्हें जमानिया से घना सम्बन्ध है, राजा गोपालसिंह के हवाले कर दिये जाँय।

(३) बेगम के घर से निकली हुई दौलत जो काशीराज ने यहाँ भेजवा दी है, बलभद्रसिंह को दे दी जाय।

(४) गौहर और गिल्लन, शेरअलीखाँ के पास भेज दी जाँय।

(५) किशोरी से पूछकर भीमसेन छोड़ दिया जाय और उसे पुनः शिवदत्तगढ़ की गद्दी पर बैठा दिया जाय।

(६) कुबेरसिंह, बाकरअली, अजायबसिंह, खुदाबक्श, यारअली, धरमसिंह, गोविन्दसिंह, भगवनिया, ललिता और धन्नूसिंह, तथा वे कैदी जो कमलिनी के तालाबवाले मकान से आये थे, सब जन्म-भर के लिए कैदखाने में भेज दिये जाँय।

(७) दलीपशाह, अर्जुनसिंह, हरदीन, भरतसिंह और गिरिजाकुमार को राजा गोपालसिंह ले जाँय और इन सभों को बड़ी खातिर और आराम के साथ रक्खें।

कैदियों के विषय में इस तरह का हुक्म देकर महाराज चुप हो गये और फिर आपुस में दूसरे ढंग की बातें होने लगीं। थोड़ी देर बाद दरबार बरखास्त हुआ और सब कोई अपने-अपने ठिकाने चले गये।


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