Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

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चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

छठवाँ बयान


सुबह की सुफेदी आसमान पर फैला ही चाहती है और इस समय की दक्षिणी हवा जंगली पेड़ों और पौधों, लताओं और पत्तों से हाथापाई करती हुई मैदान की तरफ दौड़ी जाती है। ऐसे समय में भूतनाथ और देवीसिंह हाथ में हाथ दिये जंगल के किनारे-किनारे मैदान में टहल रहे हैं और धीरे-धीरे हँसी और दिल्लगी की बातें करते जाते हैं।

देवी : भूतनाथ, इस समय एक नयी और मजेदार बात तुम्हें सुनाते हैं।

भूतनाथ : वह क्या?

देवी : फायदे की बात है, अगर तुम कोशिश करोगे तो लाख-दो-लाख रुपया मिल जायगा।

भूतनाथ : ऐसा कौन-सा उद्योग है, जिसके करने से सहज ही इतनी बड़ी रकम हाथ लग जायगी? और अगर इस बात को तुम जानते ही हो तो खुद क्यों नहीं उद्योग करते?

देवी : मैं भी उद्योग करूँगा, मगर यह कोई जरूरी बात नहीं कि जिसका जी चाहे उद्योग करके लाख-दो-लाख पा जाय। हाँ, जिसका जेहन लड़ जायगा और जिसकी अक्ल काम कर जायगी, वह बेशक अमीर हो जायगा। मैं जानता हूँ कि हम लोगों में तुम्हारी तबीयत बड़ी तेज है और तुम्हें बहुत दूर की सूझा करती है, इसलिए कहता हूँ कि अगर तुम उद्योग करोगे तो लाख-दो-लाख रुपया पा जाओगो। यद्यपि हम लोग सदा ही अमीर बने रहते हैं और रुपये पैसे की कुछ परवाह नहीं करते मगर फिर भी यह रकम थोड़ी नहीं है और तिस पर बाजी के ढंग पर नतीजा ठहरा, इसलिए ऐसी रकम पाने की खुशी होती है।

भूतनाथ : आखिर बात क्या है, कुछ कहो भी तो सही?

 देवी : बात यह है कि वह जो तिलिस्मी मकान बनाया गया है, जिसके अन्दर लोग हँसते-हँसते कूद पड़ते हैं, उसके विषय में महाराज ने रात को हुक्म दिया है कि तिलिस्मी मकान के ऊपर सर्वसाधारण लोग तो चढ़ चुके और किसी को कामयाबी नहीं हुई, अब कल हमारे ऐयार लोग उस पर चढ़कर अपनी अक्ल का नमूना दिखावें और इनके लिए इनाम भी दूना कर दिया जाय, मगर इस काम में चार आदमी शरीक न किये जाँय-एक जीतसिंह, दूसरे तेजसिंह, तीसरे भैरो, चौथे तारा।

भूतनाथ : बात तो बहुत अच्छी हुई, कई दिनों से मेरे दिल में गुदगुदी हो रही थी कि इस मकान के ऊपर चढ़ना चाहिए, मगर महाराज की आज्ञा बिना ऐसा कब कर सकता था। मगर यह तो कहो कि उन चारों के लिए मनाही क्यों कर दी गयी?

देवी : इसलिए कि उन्हें इसका भेद मालूम है।

भूतनाथ : यों तो तुमको भी कुछ-न-कुछ भेद मालूम ही होगा, क्योंकि एक दफे तुम भी ऐसे ही मकान के अन्दर जा चुके हो, जब शेरसिंह भी तुम्हारे साथ थे।

देवी : ठीक है, मगर इससे क्या असल भेद का पता लग सकता है? अगर ऐसा ही हो तो इस जलसे में हजारों आदमी उस मकान के अन्दर गये होंगे, किसी को दोहरा कर जाने की तो मनाही थी नहीं, कोई पुन : जाकर जरूर बाजी जीत लेता!

भूतनाथ : आखिर उसमें है क्या?

देवी : सो मुझे नहीं मालूम। हाँ, दो दिन के बाद वह भी मालूम हो जायगा।

भूतनाथ : पहिले दफे जब तुम ऐसे ही मकान के अन्दर कूदे थे तो उसमें क्या देखा था और हँसने की क्या जरूरत पड़ी थी?

देवी : अच्छा, उस समय जोकुछ हुआ था, सो मैं तुमसे बयान करता हूँ, क्योंकि अब उसका हाल कहने में कोई हर्ज नहीं है। जब मैं कमन्द लगाकर दीवार के ऊपर चढ़ गया तो ऊपर से दीवार बहुत चौड़ी मालूम हुई और इस सबब से बिना दीवार पर गये, भीतर की कोई चीज दिखायी नहीं देती थी। अस्तु मैं लाचार होकर दीवार पर चढ़ गया और अन्दर झाँकने लगा। अन्दर की जमीन पाँच या चार हाथ नीची थी जो कि मकान की छत मालूम होती थी, मगर इस समय मैं अन्दाज से कह सकता हूँ कि वह वास्तव में छत न थी बल्कि कपड़े का चँदवा तना हुआ या किसी शामियाने की छत थी, मगर उसमें से एक प्रकार की ऐसी भाप (वाष्प) निकल रही थी कि जिससे दिमाग में नशे की-सी हालत पैदा होती थी और खूब हँसने को जी चाहता था, मगर पैरों में कमजोरी मालूम होती थी और वह बढ़ती जाती थी...

भूतनाथ : (बात काटकर) अच्छा यह तो बताओ कि अन्दर झाँकने से पहिले ही कुछ नशा-सा चढ़ आया था, या नहीं?

देवी : कब? दीवार पर चढ़ने के बाद!

भूतनाथ : हाँ, दीवार पर चढ़ने के बाद और अन्दर झाँकने के पहिले।

देवी : (कुछ सोचकर) नशा तो नहीं, मगर कुछ शिथिलता जरूर मालूम हुई थी।

भूतनाथ : खैर, अच्छा तब?

देवी : अन्दर की तरफ जो छत थी, उस पर मैंने देखा कि किशोरी हाथ में एक चाबुक लिए खड़ी है और उसके सामने की तरफ कुछ दूर हटकर कई मोटे-ताजे आदमी खड़े हैं, जो किशोरी को पकड़कर बाँधना चाहते हैं, मगर वह किसी के काबू में नहीं आती। ताल ठोंक-ठोंककर लोग उसकी तरफ बढ़ते हैं, मगर वह कोड़ा मार-मारकर हटा देती है ऐसी अवस्था में उन आदमियों की मुद्रा (जो किशोरी को पकड़ना चाहते थे, ऐसी खराब होती थी कि हँसी रोके नहीं रुकती थी, तथा उस भाप की बदौलत आया हुआ नशा हँसी को और भी बढ़ा देता था। पैरों में पीछे हटने की ताकत न थी, मगर भीतर की तरफ कूद पड़ने में किसी तरह का हर्ज भी नहीं मालूम पड़ता था, क्योंकि जमीन ज्यादा नीची न थी और इसके अतिरिक्त किशोरी को बचाना भी बहुत ही जरूरी था। अस्तु, मैं अन्दर की तरफ कूद पड़ा बल्कि यों कहो ढुलक पड़ा और उसके बाद तनोबदन की सुध न रही। मैं नहीं जानता कि उसके बाद क्या हुआ और क्योंकर हुआ। हाँ, जब मैं होश में आया तो अपने को कैदखाने में पाया।

भूतनाथ: अच्छा तो इससे तुमने क्या नतीजा निकाला?

देवी : कुछ भी नहीं, मैंने केवल इतना ही खयाल किया कि किसी दवा के नशे से दिमाग खराब हो जाता है।

भूतनाथ : केवल इतना ही नहीं है, मैंने इससे कुछ ज्यादे खयाल किया है। खैर, कोई चिन्ता नहीं कल देखा जायगा, सौ में नब्बे दर्जे तो मैं जरूर बाहरी रास्ते ही से लौट आऊँगा। यहाँ उस तिलिस्मी मकान के अन्दर लोगों ने जोकुछ देखा है, वह भी करीब-करीब वैसा ही है, जैसा तुमने देखा था, तुमने किशोरी को देखा और इन लोगों ने किसी दूसरी औरत को देखा बात एक ही है।

इसी तरह की बातें करते हुए दोनों ऐयार कुछ देर तक सुबह की हवा खाते रहे और इसके बाद मकान की तरफ लौटे। जब महाराज के पास गये तो पुनः सुनने में आया कि ऐयारों को तिलिस्मी मकान पर चढ़ने की आज्ञा हुई है।

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