Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

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चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

पाँचवाँ बयान


महाराज की आज्ञानुसार कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के विवाह की तैयारी बड़ी धूमधाम से हो रही है। यहाँ से चुनार तक की सड़कें दोनों तरफ जाफरीवाली टट्टियों से सजायी गयी हैं, जिन पर रोशनी की जायगी और जिनके बीच में थोड़ी-थोड़ी दूर पर बड़े फाटक बने हुए हैं और उन पर नौबतखाने का इन्तजाम किया गया है। टट्टियों के दोनों तरफ बाजार बसाया जायेगा, जिसकी तैयारी कारिन्दे लोग बड़ी खूबी और मुस्तैदी के साथ कर रहे हैं। इसी तरह और भी तरह-तरह के तमाशों का इन्तजाम बीच-बीच में हो रहा है जिसके सबब से बहुत ज्यादे भीड़-भाड़ होने की उम्मीद है और अभी से तमाशबीनों का जमावड़ा हो रहा है। रोशनी के साथ-साथ आतिशबाजी के इन्तजाम में भी बड़ी सरगर्मी दिखायी जा रही है, कोशिश हो रही है कि उम्दा-से-उम्दा तथा अनूठी आतिशबाजी का तमाशा लोगों को दिखाया जाय। इसी तरह और भी कई तरह के खेल-तमाशे और नाच इत्यादि का बन्दोबस्त हो रहा है, मगर इस समय हमें इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है, क्योंकि हम अपने पाठकों को उस तिलिस्मी मकान की तरफ ले चलना चाहते हैं, जहाँ भूतनाथ और देवीसिंह ने नकाबपोशों के फेर में पड़कर शर्मिन्दगी उठायी थी और जहाँ इस समय दोनों कुमार अपने दादा, पिता तथा सब आपुसवालों को तिलिस्मी तमाशा दिखाने के लिए ले जा रहे हैं।

सुबह का सुहावना समय है और ठण्डी हवा चल रही है। जंगली फूलों की खुशबू से मस्त भई सुन्दर-सुन्दर रंग-बिरंगी खूबसूरत चिड़ियाएँ हमारे सर्वगुण-सम्पन्न मुसाफिरों को मुबारकबाद दे रही हैं, जो तिलिस्म की सैर करने की नीयत से मीठी-मीठी बातें करते हुए जा रहे हैं।

घोड़े पर सवार महाराज सुरेन्द्रसिंह, राजा बीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, गोपालसिंह, इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तथा पैदल तेजसिंह, देवीसिंह, भूतनाथ, पण्डित बद्रीनाथ, रामनारायण, पन्नालाल वगैरह अपने ऐयार लोग जा रहे थे। तिलिस्म के अन्दर मिले हुए कैदी अर्थात् नकाबपोश लोग तथा भैरोसिंह और तारासिंह इस समय साथ न थे। इस समय देवीसिंह से ज्यादे भूतनाथ का कलेजा उछल रहा था और वह अपनी स्त्री का असली भेद जानने के लिए बेताब हो रहा था। जब से उसे इस बात का पता लगा कि वे दोनों सरदार नकाबपोश यही दोनों कुमार हैं, तथा इस विचित्र मकान के मालिक भी यही हैं, तब से उनके दिल का खुटका कुछ कम तो हो गया, मगर खुलासा हाल जानने और पूछने का मौका न मिलने के सबब से उसकी बेचैनी दूर नहीं हुई थी। वह यह भी जानना चाहता था कि अब उसकी स्त्री तथा लड़का हरनामसिंह किस फिक्र में हैं। इस समय जब वह फिर उसी ठिकाने पर जा रहा था, जहाँ अपनी अपनी स्त्री की बदौलत गिरफ्तार होकर अपने लड़के का विचित्र हाल देखा था, तब से उसका दिल और बेचैन हो उठा था, मगर साथ ही इसके उसे इस बात की भी उम्मीद हो रही थी कि अब उसे उसकी स्त्री का हाल मालूम हो जायगा, या कुछ पूछने का मौका ही मिलेगा।

ये लोग धीरे-धीरे बातचीत करते हुए उसी खोह या सुरंग की तरफ जा रहे थे। पहर-भर दिन से ज्यादे न चढ़ा होगा, जब ये लोग उस ठिकाने पहुँच गये। महाराज सुरेन्द्रसिंह और बीरेन्द्रसिंह वगैरह घोड़े पर से नीचे उतर पड़े, साईसों ने घोड़े थाम लिये और इसके बाद उन सभों ने सुरंग के अन्दर पैर रक्खा। इस सुरंग वाले रास्ते का कुछ खुलासा हाल हम इस सन्तति के उन्नीसवें भाग में लिख आये हैं, जब भूतनाथ यहाँ आया था, अब पुनः दोहराने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती। हाँ, इतना लिख देना जरूरी जान पड़ता है कि दोनों कुमारों ने सभों को यह बात समझा दी कि यह रास्ता बन्द क्योंकर हो सकता है। बन्द होने का स्थान वही चबूतरा था, जो सुरंग के बीच में पड़ता था।

जिस समय ये लोग सुरंग तै करके मैदान में पहुँचे, सामने वही छोटा बँगला दिखायी दिया, जिसका हाल हम पहिले लिख चुके हैं। इस समय उस बँगले के आगे वाले दालान में दो नकाबपोश औरतें हाथ में तीर-कमान लिये टहलती पहरा दे रही थीं, जिन्हें देखते ही खासकरके भूतनाथ और देवीसिंह को बड़ा ताज्जुब हुआ और उनके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं! भूतनाथ का इशारा पाकर देवीसिंह ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से पूछा ‘‘ये दोनों नकाबपोश औरतें कौन हैं, जो पहरा दे रही हैं?’’ इसके जवाब में कुमार तो चुप रह गये मगर, सुरे्न्द्र सिंह ने कहा, ‘‘इसके जानने की तुम लोगों को क्या जल्दी पड़ी हुई है? जो कोई होंगी सब मालूम ही हो जायगा!’’

इस जवाब ने देवीसिंह और भूतनाथ को देर तक के लिए चुप कर दिया और विश्वास दिला दिया कि महाराज को इनका हाल जरूर मालूम है।

जब उन औरतों ने इन सभों को पहिचाना और अपनी तरफ आते देखा तो बँगले के अन्दर घुसकर गायब हो गयीं। तब तक ये लोग भी उस दालान में जा पहुँचे। इस समय भी यह बँगला उसी हालत में था, जैसा कि भूतनाथ और देवीसिंह ने देखा था।

हम पहिले लिख चुके हैं कि और अब भी लिखते हैं कि यह बँगला जैसा बाहर से सादा और साधारण मालूम होता था, वैसा अन्दर से न था और यह बात दालान में पहुँचने के साथ ही सभों को मालूम हो गयी। दालान की दीवारों में निहायत खूबसूरत और आला दर्जे की कारीगरी का नमूना दिखाने वाली तस्वीरों को देखकर सब कोई दंग रह गये और मुसौवर के हाथों की तारीफ करने लगे। ये तस्वीरें एक निहायत आलीशान इमारत की थीं और उसके ऊपर बड़े-बड़े हरफों में यह लिखा हुआ थाः–

‘‘यह तिलिस्म चुनारगढ़ के पास ही एक निहायत खूबसूरत जंगल में कायम किया गया है, जिसे महाराज सुरेन्द्रसिंह के लड़के बीरेन्द्रसिंह तोड़ेंगे।’’

इस तस्वीर को देखते ही सभों को विश्वास हो गया कि वह तिलिस्मी खँडहर जिसमें तिलिस्मी बगुला था और जिस पर इस समय निहायत आलीशान इमारत बनी हुई है, पहिले इसी सूरत-शक्ल में था, जिसे जमाने के हेर-फेर ने अच्छी तरह बर्बाद करके उजाड़ और भयानक बना दिया। इमारत की उस बड़ी और पूरी तस्वीर के नीचे उसके भीतरवाले छोटे-छोटे टुकड़े भी बनाकर दिखलाये गये थे और उस बगुले की तस्वीर भी बनी हुई थी, जिसे राजा बीरेन्द्रसिंह ने बखूबी पहिचान लिया और कहा, ‘‘बेशक अपने जमाने में यह बहुत अच्छी इमारत थी।’’

सुरेन्द्र : यद्यपि आजकल जो इमारत तिलिस्मी खँडहर पर बनी है, और जिसके बनवाने में जीतसिंह ने अपनी तबीयतदारी और कारीगरी का अच्छा नमूना दिखाया है, बुरी नहीं है, मगर हमें इस पहिली इमारत का ढंग कुछ अनूठा और सुंदर मालूम पड़ता है।

जीत : बेशक, ऐसा ही है। यदि इस तस्वीर को मैं पहिले देखे हुए होता तो जरूर इसी ढंग की इमारत बनवाता।

बीरेन्द्र : और ऐसा होने से वह तिलिस्म एक दफे नया मालूम पड़ता।

इन्द्रजीत : यह चुनारगढ़वाला तिलिस्म साधारण नहीं बल्कि बहुत-बड़ा है। चुनारगढ़, नौगढ़, विजयगढ़ और जमानिया तक इसकी शाखा फैली हुई है। इस बँगले को इस बहुत बड़े और फैले हुए तिलिस्म का ‘केन्द्र’ समझना चाहिए बल्कि ऐसा भी कह सकते हैं कि यह बँगला तिलिस्म का नमूना है।

थोड़ी देर तक दालान में खड़े इसी किस्म की बातें होती रहीं और इसके बाद सभों को एक साथ लिये हुए, दोनों कुमार बँगले के अन्दर रवाना हुए।

सदर दरवाजे का पर्दा उठाकर अन्दर जाते ही ये लोग एक गोल कमरे में पहुँचे, जो भूतनाथ और देवीसिंह का देखा हुआ था। इस गोल और गुम्बजदार खूबसूरत कमरे की दीवारों पर जंगल, पहाड़ और रोहतासगढ़ की तस्वीरें बनी हुई थीं। घड़ी-घड़ी तारीफ न करके एक ही दफे लिख देना ठीक होगा कि इस बँगले में जितनी तस्वीरें देखने में आयीं सभी आला दर्जे की कारीगरी का नमूना थीं और यही मालूम होता था कि आज ही बनकर तैयार हुई हैं। इस रोहतासगढ़ की तस्वीर देखकर सबकोई बड़े प्रसन्न हुए और राजा बीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखकर कहा, ‘‘रोहतासगढ़ किले और पहाड़ी की बहुत ठीक और साफ तस्वीर बनी हुई है।’’

तेज : जंगल भी उसी ढंग का बना हुआ है, कहीं-कहीं से फर्क मालूम पड़ता है, नहीं तो बाज जगहें तो ऐसी बनी हुई हैं, जैसी मैंने अपनी आँखों से देखी हैं। (उँगली का इशारा करके) देखिए यह वही कब्रिस्तान है, जिस राह से हम लोग रोहतासगढ़ तहखाने में घुसे थे। हाँ, यह देखिए कि बारीक हर्फों में लिखा हुआ भी है–‘‘तहखाने में जाने का बाहरी फाटक।’’

इन्द्रजीत : इस तस्वीर को अगर गौर से देखेंगे तो वहाँ का बहुत ज्यादे हाल मालूम होगा। जिस जमाने में यह इमारत तैयार हुई थी, उस जमाने में वहाँ की और उसके चारों तरफ की जैसी अवस्था थी, वैसी ही इस तस्वीर में दिखायी है, आज चाहे कुछ फर्क पड़ गया हो!

तेज : बेशक ऐसा ही है।

इन्द्रजीत : इसके अतिरिक्त एक और ताज्जुब की बात अर्ज करूँगा।

बीरेन्द्र : वह क्या?

इन्द्रजीत : इस दीवार में से वहाँ (रोहतासगढ़) जाने का रास्ता भी है!

सुरेन्द : वाह वाह! क्या तुम इस रास्ते को खोल भी सकते हो?

इन्द्रजीत : जी हाँ, हम लोग इसमें बहुत दूर तक जाकर घूम आये हैं।

सुरेन्द्र : यह भेद तुम्हें क्यों कर मालूम हुआ?

इन्द्रजीत : उसी ‘रिक्तगन्थ’ की बदौलत हम दोनों भाइयों को इन सब जगहों का हाल और भेद पूरा-पूरा मालूम हो चुका है। यदि आज्ञा हो तो दरवाजा खोलकर मैं आपको रोहतासगढ़ के तहखाने में ले जा सकता हूँ। वहाँ के तहखाने में भी एक छोटा-सा तिलिस्म है जो इसी बड़े तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है और हम लोग उसे खोल या तोड़ भी सकते हैं, परन्तु अभी तक ऐसा करने का इरादा नहीं किया।

सुरेन्द्र : उस रोहतासगढ़वाले तिलिस्म के अन्दर क्या चीज है?

इन्द्रजीत : उसमें केवल अनूठे, अद्भुत, आश्चर्य-गुणवाले हर्बे रक्खे हुए हैं, उन्हीं हर्बों पर वह तिलिस्म बँधा है। जैसा तिलिस्मी खंजर हम लोगों के पास है या जैसे तिल्सिमी जिरःबख्तर और हर्बों की बदौलत राजा गोपालसिंह ने कृष्णाजिन्न का रूप धरा था वैसे हर्बों और असबाबों का तो वहाँ ढेर लगा हुआ है, हाँ, खजाना वहाँ कुछ भी नहीं है।

सुरेन्द्र : ऐसे अनूठे हर्बे खजाने से क्या कम हैं?

जीत : बेशक! (इन्द्रजीतसिंह से) जिस हिस्से को तुम दोनों भाइयों ने तोड़ा है, उसमें भी तो ऐसे अनूठे हर्बे होंगे?

इन्द्रजीत : जी हाँ, मगर बहुत कम हैं?

बीरेन्द्र : अच्छा यदि ईश्वर की कृपा हुई तो फिर किसी मौके पर इस रास्ते से रोहतासगढ़ जाने का इरादा करेंगे। (मकान की सजावट और परदों की तरफ देखकर) क्या यह सब सामान कन्दील, पर्दे और बिछावन वगैरह तुम लोग इसी तिलिस्म के अन्दर से लाये थे?

इन्द्रजीत : जी नहीं, जब हम लोग यहाँ आये तो इस बँगले को इसी तरह सजा-सजाया पाया और तीन-चार आदमियों को भी देखा, जो इस बँगले की हिफाजत और मेरे आने का इन्तजार कर रहे थे।

सुरेन्द्र : (ताज्जुब से) वे लोग कौन थे और अब कहाँ हैं?

इन्द्रजीत : दरियाफ्त करने से मालूम हुआ कि वे लोग इन्द्रदेव के मुलाजिम थे, जो इस समय अपने मालिक के पास चले गये हैं। इस तिलिस्म का दारोगा असल में इन्द्रदेव है और आज के पहिले भी इसी के बुजुर्ग लोग दारोगा होते आये हैं।

सुरेन्द्र : तुमने यह बड़ी खुशी की बात सुनायी, मगर अफसोस यह है कि इन्द्रदेव ने हमें इन बातों की कुछ भी खबर न की।

आनन्द : अगर इन्द्रदेव ने इन सब बातों को आपसे छिपाया तो यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है, तिलिस्मी कायदे के मुताबिक ऐसा होना ही चाहिए था।

सुरेन्द्र : ठीक है, तो मालूम होता है कि यह सब सामान तुम्हारी खातिरदारी के लिए इन्द्रदेव की आज्ञानुसार किया गया है।

आनन्द : जी हाँ, उसके आदमियों की जुबानी मैंने भी यही सुना है।

इसके बाद बड़ी देर तक ये लोग इन तस्वीरों को देखते और ताज्जुब भरी बातें करते रहे और फिर आगे की तरफ बढ़े। जब पहिले भूतनाथ और देवीसिंह यहाँ आये थे, तब हम लिख चुके हैं कि इस कमरे में सदर दरवाजे के अतिरिक्त और भी तीन दरवाजे थे-इत्यादि। अस्तु, उन दोनों ऐयारों की तरह इस समय भी सभों को साथ लिये हुए, दोनों कुमार दाहिने तरफ वाले दरवाजे के अन्दर गये और घूमते हुए उसी बहुत बड़े और आलीशान कमरे में पहुँचे, जिसमें पहिले भूतनाथ और देवीसिंह ने पहुँचकर आश्चर्य-भरा तमाशा देखा था।

इस आलीशान कमरे की तस्वीरें खूबी और खूबसूरती में सब तस्वीरों से बढ़ी-चढ़ी थीं तथा दीवारों पर जंगल, मैदान, पहाड़, खोह, दर्रे, झरने, शिकारगाह तथा शहरपनाह, किले, मोर्चे और लड़ाई इत्यादि की तस्वीरें बनी हुई थीं, जिन्हें सब कोई गौर और ताज्जुब के साथ देखने लगे।

सुरेन्द : (एक किले की तरफ इशारा करके) यह तो चुनारगढ़ की तस्वीर है।

इन्द्रजीत : जी हाँ, (उँगली का इशारा करके) और यह जमानिया के किले तथा खास बाग की तस्वीर है। इस दीवार में से वहाँ जाने का भी रास्ता है। महाराज सूर्यकान्त के जमाने में उनके शिकारगाह और जंगल की यह सूरत थी।

बीरेन्द्र : और यह लड़ाई की तस्वीर कैसी है? इसका क्या मतलब है?

इन्द्रजीत : इन तस्वीरों में बड़ी कारीगरी खर्च की गयी है। महाराज सूर्यकान्त ने अपनी फौज को जिस तरह की कवायद और व्यूह रचना इत्यादि का ढंग सिखाया था, वे सब बातें इन तस्वीरों में भरी हुई हैं। तरकीब करने से ये सब तस्वीरें चलती-फिरती और काम करती नजर आयेंगी और साथ ही इसके फौजी बाजा भी बजता हुआ सुनायी देगा, अर्थात् इन तस्वीरों में जितने बाजेवाले हैं, वे सब भी अपना-अपना काम करते हुए मालूम पड़ेगें। परन्तु इस तमाशे का आनन्द रात को मालूम पड़ेगा, दिन को नहीं। इन्हीं तस्वीरों के कारण इस कमरे का नाम ‘व्यूह-मण्डल’ रक्खा गया है, वह देखिए ऊपर की तरफ बड़े हर्फों में लिखा हुआ है।

सुरेन्द्र : यह बहुत अच्छी कारीगरी है। इस तमाशे को हम जरूर देखेंगे बल्कि और भी कई आदमियों को दिखायेंगे।

इन्द्रजीत : बहुत अच्छा, रात हो जाने पर मैं इसका बन्दोबस्त करूँगा, तब तक आप और चीजों को देखें।

ये लोग जिस दरवाजे से इस कमरे में आये थे, उसके अतिरिक्त एक दरवाजा और भी था, जिस राह से सभों को लिए हुए दोनों कुमार दूसरे कमरे में पहुँचे। इस कमरे की दीवार बिल्कुल साफ थी अर्थात् उस पर किसी तरह की तस्वीर बनी हुई न थी। कमरे के बीचोबीच दो चबूतरे संगमर्मर के बने हुए थे, जिसमें एक खाली था और दूसरे चबूतरे के ऊपर सुफेद पत्थर की एक खूबसूरत पुतली बैठी हुई थी। इस जगह पर ठहरकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने अपने दादा और पिता की तरफ देखा और कहा, ‘‘नकाबपोशों की जुबानी हम लोगों का तिलिस्मी हाल जो कुछ आपने सुना है, वह तो याद ही होगा। अस्तु, हम लोग पहिली दफे तिलिस्म से बाहर निकलकर जिस सुहावनी घाटी में पहुँचे थे, वह यही स्थान है*। इसी चबूतरे के अन्दर से हम लोग बाहर हुए थे। (*देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति -5, बीसवाँ भाग, नौवाँ बयान।)

उस ‘रिक्तगन्थ’ की बदौलत हम दोनों भाई यहाँ तक तो पहुँच गये, मगर उसके बाद इस चबूतरे वाले तिलिस्म को खोल न सके, हाँ, इतना जरूर है कि उस ‘रिक्तगन्थ’ की बदौलत उस चबूतरे में से (जिस पर एक पुतली बैठी हुई थी, उसकी तरफ इशारा करके) एक दूसरी किताब हाथ लगी, जिसकी बदौलत हम लोगों ने उस चबूतरेवाले ‌तिलिस्म को खोला और उसी राह से आपकी सेवा में जा पहुँचे।

‘‘आप सुन चुके हैं कि जब हम दोनों भाई राजा गोपालसिंह को मायारानी की कैद से छुड़ाकर जमानिया के खास बाग वाले देवमन्दिर में गये थे, तब वहाँ पहिले आनन्दसिंह तिलिस्म के फन्दे में फँस गये थे, उन्हें छुड़ाने के लिए जब मैं भी उसी गड़हे या कूएँ में कूद पड़ा तो चलता-चलता एक दूसरे बाग में पहुँचा, जिसके बीचोबीच में एक मन्दिर था। उस मन्दिर वाले तिलिस्म को जब मैंने तोड़ तो वहाँ एक पुतली के अन्दर कोई चमकती हुई चीज मुझे मिली*।’’ (* देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति -3, दसवाँ भाग, पहिला बयान।)

बीरेन्द्रः हाँ, हमें याद है, उस मूरत को तुमने उखाड़कर किसी कोठरी के अन्दर फेंक दिया था और वह फूटकर चूने की कली की तरह हो गयी थी। उसी के पेट में से...

इन्द्रजीत : जी हाँ।

सुरेन्द्र : तो वह चमकती हुई चीज क्या थी और वह कहाँ है?

इन्द्रजीत वह हीरे की बनी हुई एक चाभी थी, जो अभी तक मेरे पास मौजूद है, (जेब में से निकालकर और महाराज को दिखाकर) देखिए यही ताली उस पुतली के पेट में लगती है।

सभों ने उस चाभी को बड़े गौर से देखा और इन्द्रजीतसिंह ने सभों को देखते-देखते उस चबूतरे पर बैठी हुई पुतली की नाभि में वह ताली लगायी। उसका पेट छोटी आलमारी के पल्ले की तरह खुल गया।

इन्द्रजीत : बस इसी में से वह किताब मेरे हाथ लगी, जिसकी बदौलत वह चबूतरे का तिलिस्म खोला।

सुरेन्द्र : अब वह किताब कहाँ है?

इन्द्रजीत : आनन्दसिंह के पास मौजूद है।

इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह की तरफ देखा और उन्होंने एक छोटी-सी किताब जिसके अक्षर बहुत बारीक थे, महाराज के हाथ दे दी। यह किताब भोजपत्र की थी, जिसे महाराज ने बड़े गौर से देखा और दो-तीन जगहों से कुछ पढ़कर आनन्दसिंह के हाथ में देते हुए कहा, ‘‘इसे निश्चिन्ती में एक दफे पढ़ेंगे।’’

इन्द्रजीत : यह पुतलीवाला चबूतरा उस तिलिस्म में घुसने का दरवाजा है।

इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने उस पुतली के पेट में (जो खुल गया था) हाथ डालके कोई पेंच घुमाया, जिससे चबूतरे के दाहिनी तरफवाली दीवार किवाड़ के पल्ले की तरह धीरे-धीरे खुलकर जमीन के साथ सट गयी और नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ दिखायी देने लगीं। इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर हाथ में लिया और उसका कब्जा दबाकर रोशनी करते हुए चबूतरे के अन्दर घुसे तथा सभों को अपने पीछे आने के लिए कहा। सभी के पीछे आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर की रोशनी करते हुए चबूतरे के अन्दर घुसे। लगभग पन्द्रह-बीस चक्करदार सीढ़ियों के नीचे उतरने के बाद ये लोग एक बहुत बड़े कमरे में पहुँचे, जिसमें सोने-चाँदी के सैकड़ों बड़े-बड़े हण्डे अशर्फियों और जवाहिरात से भरे पड़े हुए थे, जिसे सभों ने बड़े गौर और ताज्जुब के साथ देखा और महाराज ने कहा, ‘‘इस खजाने का अन्दाज करना भी मुश्किल है।’’

इन्द्रजीत : जो कुछ खजाना इस तिलिस्म के अन्दर मैंने देखा और पाया है उसका यह पासंग भी नहीं है। उसे बहुत जल्द ऐयार लोग आपके पास पहुँचावेंगे। उन्हीं के साथ-साथ कई चीजें दिल्लगी की भी हैं, जिसमें एक चीज वह भी है, जिसकी बदौलत हम लोग एक दफे हँसते-हँसते दीवार के अन्दर कूद पड़े थे और मायारानी के हाथ में गिरफ्तार हो गये थे।

जीत : (ताज्जुब से) हाँ! अगर वह चीज शीघ्र बाहर निकाल ली जाय तो (सुरेन्द्रसिंह से) कुमारों की शादी में सर्वसाधारण को उसका तमाशा दिखाया जा सकता है।

सुरेन्द्र : बहुत अच्छी बात है, ऐसा ही होगा।

इन्द्रजीत : इस तिलिस्म में घुसने के पहिले ही मैंने सभों का साथ छोड़ दिया अर्थात् नकाबपोशों को (कैदियों को) बाहर ही छोड़कर केवल हम दोनों भाई उसके अन्दर घुसे और काम करते हुए धीरे-धीरे आपकी सेवा में जा पहुँचे।

सुरेन्द्र : तो शायद उसी तरह हम लोग भी सब तमाशा देखते हुए उसी चबूतरे की राह बाहर निकलेंगे।

जीत : मगर क्या उन चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा न देखियेगा?

सुरेन्द्र : हाँ, ठीक है, उस तमाशे को तो जरूर देखेंगे।

इन्द्रजीत : तो अब यहाँ से लौट चलना चाहिए, क्योंकि इस कमरे के आगे बढ़कर फिर आज ही लौट आना कठिन है, इसके अतिरिक्त अब दिन भी थोड़ा रह गया है, सन्ध्यावन्दन और भोजन इत्यादि के लिए भी समय चाहिए और फिर उन तस्वीरों का तमाशा भी कम-से-कम चार-पाँच घण्टे में पूरा होगा।

सुरेन्द्र : क्या हर्ज है, लौट चलो।

महाराज की आज्ञानुसार सबकोई वहाँ से लौटे और घूमते हुए बँगले के बाहर निकल आये, देखा तो वास्तव में दिन बहुत कम रह गया था।

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