कलम, तलवार और त्याग-1 (कहानी-संग्रह) - प्रेमचन्द Kalam, Talwar Aur Tyag-1 - Hindi book by - Premchand
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कलम, तलवार और त्याग-1 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :145
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8500
आईएसबीएन :978-1-61301-190

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स्वतंत्रता-प्राप्ति के पूर्व तत्कालीन-युग-चेतना के सन्दर्भ में उन्होंने कुछ महापुरुषों के जो प्रेरणादायक और उद्बोधक शब्दचित्र अंकित किए थे, उन्हें ‘‘कलम, तलवार और त्याग’’ में इस विश्वास के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है

हिन्दी के अमर कथाकार प्रेमचन्द का योगदान केवल कहानियों अथवा उपन्यासों तक ही सीमित नहीं है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पूर्व तत्कालीन-युग-चेतना के सन्दर्भ में उन्होंने कुछ महापुरुषों के जो प्रेरणादायक और उद्बोधक शब्दचित्र अंकित किए थे, उन्हें ‘‘कलम, तलवार और त्याग’’ में इस विश्वास के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है कि किशोर-किशोरियों के लिए ये न केवल ज्ञानवर्द्धक, प्रत्युत मनोरंजक भी सिद्ध होंगे।

इन्हें पढ़ते समय पाठकों को इतना ध्यान अवश्य रखना होगा कि कुछ सन्दर्भित तथ्य आज सर्वथा परिवर्तित हो चुके हैं। लेखक की युगानुभूति को परिवर्तित करना एक अनाधिकार चेष्टा ही मानी जाती, अतः ‘जस की तस धर दीनी चदरिया’ ही हमारा लक्ष्य रहा है।

कथाक्रम

1. राणा प्रताप
2. रणजीत सिंह
3. राणा जंगबहादुर
4. अकबर महान
5. स्वामी विवेकानंद
6. राजा मानसिंह

राणा प्रताप

राजस्थान के इतिहास का एक-एक पृष्ठ साहस, मर्दानगी और वीरोचित प्राणोत्सर्ग के कारनामों से जगमगा रहा है। बापा रावल, राणा साँगा और राणा प्रताप ऐसे-ऐसे उज्ज्वल नाम हैं कि यद्यपि काल के प्रखर प्रवाह ने उन्हें धो बहाने में कोई कसर नहीं उठा रखी, फिर भी अभी तक जीवित हैं, और सदा जीते तथा चमकते रहेंगे। इनमें से किसी ने भी राज्यों की नींव नहीं डाली, बड़ी-बड़ी विजयें नहीं प्राप्त कीं; नए राष्ट्र नहीं निर्माण किए; पर इन पूज्य पुरुषों के हृदय में वह ज्वाला जल रही थी, जिसे स्वदेश-प्रेम कहते हैं।

वह यह नहीं देख सकते थे कि कोई बाहरी आये और हमारे बराबर का होकर रहे। उन्होंने मुसीबतें उठायीं, जाने गँवायीं, पर अपने देश पर कब्जा करने वालों के कदम उखाड़ने की चिन्ता में सदा जलते-जुड़ते रहे। वह इस विचार या मध्यम वृत्ति के समर्थक न थे कि ‘मैं भी रहूँ और तू भी रह’। उनके दावे ज्यादा मर्दानगी और बहादुरी के थे कि ‘रहें तो हम रहें या हमारे जातिवाले, कोई दूसरी कौम हर्गिज कदम न जमाने पाए।’ उनकी कार्यावली इस योग्य है कि हमारे धार्मिक साहित्य का अंग बने। इस समय हम केवल राणा प्रताप का जीवन-वृत्तांत पाठकों को भेंट करते हैं, जो जब तक जीवित रहा, अकबरी दबदबे का सामना करता रहा।

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