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उपन्यास >> पाणिग्रहण पाणिग्रहणगुरुदत्त
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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव
उर्मिला आई और प्रणाम कर सामने बैठ गयी। शिवदत्त ने बहुत ही संयत भाषा में पूछा, ‘‘उर्मिला बेटी! यह इन्द्र को रुपये तुमने भेजे हैं?’’
‘‘हाँ पिताजी!’’
‘‘क्यों?’’
‘‘ऐसा प्रतीत होने लगा है कि आपका खर्चा बहुत बढ़ गया है और आप कई उचित खर्चे भी दे नहीं सकते। मैंने सोचा कि इसमें मैं आपका हाथ बटा दूँ।’’
‘‘तो इसको तुम उचित खर्चा मानती हो?’’
‘‘हाँ पिताजी!’’
‘‘ये रुपये देकर तुमने एक बहुत भारी गलती की है। वह मेडिकल कॉलेज में दाखिल हो गया। इस कॉलेज में उसका खर्चा बढ़ता ही जायेगा। अन्त में वह इतना खर्चा न कर सकने पर कॉलेज छोड़ने पर विवश हो जायेगा। तब वह न इधर का रहेगा न ही उधर का। उसका जीवन बरबाद हो जायेगा। इसकी जिम्मेदारी तुम पर होगी, जिसने उसको दाखिल होने में सहायता दी है।’’
‘‘पिताजी! मेरी अन्तरात्मा कहती है कि इन्द्र एक अति योग्य विद्यार्थी है। उसको उचित शिक्षा मिलने का अवसर मिलना चाहिए। मैंने इसमें उसकी सहायता की है।
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