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उपन्यास >> पाणिग्रहण पाणिग्रहणगुरुदत्त
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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव
‘‘बहन!’’ शारदा ने हिचकिचाते हुए पूछ लिया, ‘‘यह क्या हुआ है, जो एकाएक सबके मुख गम्भीर हो गये हैं?’’
‘‘कुछ भी तो नहीं। यूँ ही बच्चे-बच्चे लड़ रहे हैं। इससे नानीजी नाराज होकर चली गयी हैं। यह सबको भला प्रतीत नहीं हुआ है।’’
शारदा को इतने मात्र से सन्तोष नहीं हुआ, परन्तु वह पहले ही दिन अपने पति के घर के विषय में पूछ नहीं सकी। उसने बात बदल दी। उसने कहा, ‘‘मेरी माताजी कहती थीं कि वे पढ़ते हैं और अभी तीन वर्ष की पढ़ाई और है।’’
‘‘हाँ, परन्तु अब तो दो महीने की छुट्टियाँ हैं। इन छुट्टियों में हम नैनीताल जायेंगे। वहाँ तुम अपने पति के साथ रह सकोगी। पीछे तुम यहाँ अपनी काकी के पास रहोगी। उस समय वह लखनऊ में पड़ाई के लिए चले जायेंगे। पढ़ाई के दिनों में यहाँ आना बहुत कम हो सकेगा।’’
शारदा इस सबका अर्थ विचार कर रही थी। उसको कुछ निराशा नहीं थी। इस पर भी वह विचार करती थी वह यहाँ रहकर क्या करेगी? अपने पिता के घर क्यों नहीं जा सकेगी?
रजनी ने उसको चुप देखकर कह दिया–‘‘भाभी! प्रतीक्षा का फल मीठा होता है। वे डॉक्टर बन जायेंगे तो बहुत-सा रुपया कमा सकेंगे और उससे तुमको सुख दे सकेंगे।’’
‘‘तुम्हारा विवाह हुआ है, दीदी?’’
‘‘नहीं, अभी नहीं हुआ।’’
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