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उपन्यास >> प्रगतिशील प्रगतिशीलगुरुदत्त
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इस लघु उपन्यास में आचार-संहिता पर प्रगतिशीलता के आघात की ही झलक है।
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मदन दो-ढाई घण्टे के खेल-कूद और पेट-भर रोटी खाने के बाद अपनी चारपाई पर सो गया। जब जागा तो उसकी अम्मा उसके समीप ही बैठी थी और निश्चिन्त हो भोजन कर रही थी। मदन ने अपनी चटाई पर से झांककर उस कमरे की ओर देखा, जिसमें से कराहने का स्वर सुनाई दिया था। कमरे का द्वार अभी भी बन्द ही था। मदन ने पूछा अम्मा! वे गये?’’
‘‘कौन?’’
‘‘वही, जो बकरे की भांति चीख रही थी।’’
‘‘बकरे की भांति?’’
‘‘हां अम्मा! खेत के उस पार जो मियां रहता है न। उन्होंने एक दिन हलाल किया था। जब वे बकरे को काट रहे थे, तो वह ऐसे ही चीखता था जैसे वह उस कोठरी में चीख रही थी।’’
‘‘वह अब नहीं चीखेगी।’’
‘‘तो गई?’’
‘‘नहीं, अभी नहीं। कल जावेगी।’’
‘‘यहां क्या कर रही है?’’
‘‘कल बताऊंगी।’’
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