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प्रेम पचीसी (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :384
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8582
आईएसबीएन :978-1-61301-112

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मुंशी प्रेमचन्द की पच्चीस प्रसिद्ध कहानियाँ


उन्होंने चाहा कि पत्र को छिपा लूँ, पर गौरा ने उसे उनके हाथ से छीन लिया; उसे गौर से पढ़ा और एक क्षण चिन्तामग्न रहने के बाद बोली–वह साड़ी भी लेते जाओ।

रतन–रहने दो, अब तो मैंने झूठ लिख ही दिया।

गौरा–मैं क्या जानती थी कि तुम ऐसी कड़ी प्रतिज्ञा कर रहे हो।

रतन–यह तो मैं तुमसे पहले कह चुका था।

गौरा–मेरी भूल थी, क्षमा कर दो और इसे लेते जाओ।

रतन–जब तुम इसे देना अशगुन समझती हो तो रहने दो। तुम्हारी खातिर थोड़ा-सा झूठ बोलने से मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

गौरा–नहीं, लेते जाओ। अमंगल के भय से तुम्हारी आत्मा का हनन नहीं करना चाहती!

यह कह कर उसने अपनी सुहाग की साड़ी उठा कर पति के हाथों में रख दी। रतन ने देखा, गौरा के चेहरे पर एक रंग आता है, एक रंग जाता है, जैसे कोई रोगी अंतरस्थ विषम वेदना को दबाने की चेष्टा कर रहा हो। उन्हें अपनी अहृदयता पर लज्जा आयी। हा! केवल अपने सिद्धांत की रक्षा के लिए अपनी आत्मा के सम्मान के लिए, मैं इस देवी के भावों का वध कर रहा हूँ! यह अत्याचार है। साड़ी गौरा को दे कर बोले–तुम इसे रख लो, मैं प्रतिज्ञा-पत्र को फाड़े डालता हूँ।

गौरा ने दृढ़ता से कहा–तुम न जाओगे तो मैं खुद जा कर दे आऊँगी।

रतनसिंह विवश हो गये। साड़ी ली और बाहर चले आये।

उसी दिन से गौरा के हृदय पर एक बोझ-सा रहने लगा। वह दिल बहलाने के लिए नाना उपाय करती; जलसों में भाग लेती, सैर करने जाती, मनोरंजक पुस्तकें पढ़ती, यहाँ तक कि कई बार नियम के विरुद्ध थियेटरों में भी गयी, किसी प्रकार अमंगल कल्पना को शान्त करना चाहती थी, पर यह आशंका एक मेघ-मंडल की भाँति हृदय पर छायी रहती थी।

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