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प्रेम प्रसून ( कहानी-संग्रह )

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :286
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8588
आईएसबीएन :978-1-61301-115

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इन कहानियों में आदर्श को यथार्थ से मिलाने की चेष्टा की गई है


आनंदमोहन–विदा होता हूँ, मौज उड़ाओ। नहीं तो बाजार की दूकानें भी बन्द हो जाएंगी। खूब चकमा दिया, मित्र फिर समझेंगे। लाला ज्योतिस्वरूप तो बैठे-बैठे अपनी निराशा को खर्राटों से भुला रहे हैं। मुझे यह संतोष कहाँ! तारे भी तो नहीं हैं कि बैठकर उन्हें ही गिनूँ। इस समय तो स्वादिष्ट पदार्थों का स्मरण कर रहा हूँ।

दयाशंकर–बंधुवर, दो मिनट और सन्तोष करो, आया। लाला ज्योति-स्वरूप से कह दो कि किसी हलवाई की दूकान से पूरियाँ ले आयें। यहाँ कम पड़ गई हैं। आज दोपहर से ही इनकी तबीयत खराब हो गई है। मेरी मेज की दराज में रुपये रखे हुए हैं।

सेवती–साफ-साफ तो यही है कि तुम्हारे परदे ने मुझे पंगु बना दिया है। कोई मेरा गला भी घोंट जाय, तो फरियाद नहीं कर सकती।

दयाशंकर–फिर वही अन्योक्ति! इस विषय का अन्त भी होगा या नहीं।

सेवती–दियासलाई तो थी ही नहीं, फिर आग कैसे जलती?

दयाशंकर–अहा! मैंने जाते समय दियासलाई की डिबिया जेब में रख ली थी… जरा-सी बात का तुमने इतना बतंगड़ बना दिया। शायद मुझे तंग करने के लिए अवसर ढूँढ़ रही थीं। कम-से-कम मुझे तो ऐसा नहीं जान पड़ता है।

सेवती–यह तो तुम्हारी ज्यादती है। ज्यों ही तुम सीढ़ी से उतरे, मेरी दृष्टि डिबिया पर पड़ गई, किन्तु वह लापता थी। ताड़ गई कि तुम ले गए। तुम मुश्किल से दरवाजे तक पहुँचे होगे। अगर जोर से पुकारती,तो तुम सुन लेते। लेकिन नीचे दूकानदारों के कानों में भी आवाज जाती, तो सुनकर न जाने मेरी कौन-कौन दुर्दशा करते। हाथ मलकर रह गई। उसी समय से बहुत व्याकुल हो रही हूँ कि किसी प्रकार भी दियासलाई मिल जाती, तो अच्छा होता। मगर कोई वश न चला। अन्त में लाचार होकर बैठ रही।

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