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कहानी संग्रह >> प्रेम प्रसून ( कहानी-संग्रह )

प्रेम प्रसून ( कहानी-संग्रह )

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :286
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8588
आईएसबीएन :978-1-61301-115

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इन कहानियों में आदर्श को यथार्थ से मिलाने की चेष्टा की गई है


देवप्रकाश यह पढ़कर अवाक रह गए। फिर आग्रह करने का साहस न हुआ। देवप्रिया ने नाक सिकोड़कर कहा–यह लौड़ा देखने को ही सीधा है, है जहर का बुझाया हुआ! सौ कोस पर बैठा हुआ बरछियों से कैसा छेद रहा है।

किंतु ज्ञानप्रकाश ने यह पत्र पढा, तो उसे मर्माघात पहुँचा। दादा और अम्माँ के अन्याय ने ही उन्हें यह भीषण व्रत धारण करने पर बाध्य किया है। इन्हीं ने उन्हें निर्वासित किया है, और शायद सदा के लिए। न-जाने अम्माँ को उनसे क्यों इतनी जलन हुई। मुझे तो अब याद आता है कि किशोरावस्था ही से वह बड़े आज्ञाकारी, विनयशील और गम्भीर थे। उन्हें अम्माँ की बातों का जवाब देते नहीं सुना। मैं अच्छे से अच्छा खाता था, फिर भी उनके तेवर मैले न हुए; हालाँकि उन्हें जलना चाहिए था। ऐसी दशा में अगर उन्हें गार्हस्थ्य जीवन से घृणा हो गई, तो आश्चर्य ही क्या? मैं ही क्यों इस विपत्ति में फँसूँ? कौन जाने, मुझे भी ऐसी ही परिस्थिति का सामना करना पड़े। भैया ने बहुत सोच-समझकर यह धारणा की है!

संध्या समय जब उसके माता-पिता बैठे हुए समस्या पर विचार कर रहे थे, ज्ञानप्रकाश ने आकर कहा–मैं कल भैया से मिलने जाऊँगा।

देवप्रिया–क्या कलकत्ते जाओगे?

ज्ञानप्रकाश–जी, हाँ।

देवप्रिया–उन्हीं को क्यों नहीं बुलाते?

ज्ञानप्रकाश–उन्हें कौन मुँह लेकर बुलाऊँ! आप लोगों ने तो पहले ही मेरे मुँह में कालिख लगा दी है। ऐसा देव-पुरुष आप लोगों के कारण विदेश में ठोकर खा रहा है, और मैं इतना निर्लज्ज हो जाऊँ कि…।

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