संग्राम (नाटक) - प्रेमचन्द Sangraam (Drama) - Hindi book by - Premchand
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संग्राम (नाटक)

प्रेमचन्द


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :283
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8620
आईएसबीएन :978-1-61301-124

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मुंशी प्रेमचन्द्र द्वारा आज की सामाजिक कुरीतियों पर एक करारी चोट

आजकल नाटक लिखने के लिए संगीत का जानना जरूरी है। कुछ कवित्व-शक्ति भी होनी चाहिए। मैं इन दोनों गुणों से असाधारणत: वंचित हूँ। पर इस कथा का ढंग ही कुछ ऐसा था कि मैं उसे उपन्यास का रूप न दे सकता था। यही इस अनधिकार चेष्टा का मुख्य कारण है। आशा है सहृदय पाठक मुझे क्षमा प्रदान करेंगे। मुझसे कदाचित् फिर ऐसी भूल न होगी। साहित्य के इस क्षेत्र में मेरा पहला और अंतिम दुस्साहसपूर्ण पदाक्षेप है।

मुझे विश्वास है यह नाटक रंगभूमि पर खेला जा सकता है। हां, रसज्ञ ‘स्टेज मैनेजर’ को कहीं-कहीं काट-छांट करनी पड़ेगी। मेरे लिए नाटक लिखना ही कम दुस्साहस का काम न था। उसे स्टेज के योग्य बनाने की धृष्टता अक्षम्य होती।

मगर मेरी खताओं का अन्त अभी नहीं हुआ। मैंने एक तीसरी खता भी की है। संगीत से सर्वथा से अनभिज्ञ होते हुए भी मैंने जहां कहीं जी में आया है गाने दे दिये हैं। दो खताएं माफ़ करने की प्रार्थना तो मैंने की; पर तीसरी खता किस मुंह से माफ कराऊं। इसके लिए पाठक वृन्द और समालोचक महोदय जो दंड दें, शिरोधार्य है।


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