अमेरिका और कैनेडा की सड़क यात्रा की मनोहर कहानी
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अमेरिकी यायावर

योगेश कुमार दानी

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :150
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9435
आईएसबीएन :9781613018972

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उत्तर पूर्वी अमेरिका और कैनेडा की रोमांचक सड़क यात्रा की मनोहर कहानी

अमेरिकी यायावर

भारतीय मूल का उच्च शिक्षा प्राप्त करने आया एक नवयुवक गर्मी की छुट्टियों में अमेरिका की सड़कों पर भ्रमण करने की योजना बनाता है। उसकी दस दिनों की योजना वाली यात्रा पंद्रह दिनों में पूरी होती है।

छात्र जीवन में पैसों की किल्लत केवल अमीरों को नहीं होती! वरना आम लोगों में लगभग सभी को पैसों की तंगी का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में अमेरिका में तो यह समस्या और अधिक गंभीर हो जाती है।

पैसे बचाने वाली कम पैसों के बजट की योजना के तहत शुरु की गई यात्रा कैसे-कैसे उतार-चढ़ावों से गुजरती है। आज के छात्र के जीवन में क्या खुशियाँ और क्या परेशानियाँ आती हैं। उन सबके बीच भी यह नवयुवक अपनी यात्रा किस प्रकार पूरी करने की कोशिश करता है, यात्रा को बीच में ही छोड़ना पड़ने की स्थिति आने पर वह क्या करता है। इसकी शुरु से आखिर तक एक ही बार में पढ़ने योग्य कथा।

अमेरिका आने वाले लोगों में, बल्कि भारतीय जीवन में भी आगे बढ़ते हुए, जीवन में मिली सफलताओं के फल के रूप में हम अपने जीवन में क्या करना चाहते हैं? इन सफलताओं की क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है।



अंततोगत्वा मैंने फायरफाक्स ब्राउजर को खोला और उसके बाद सबसे पहला काम फेशबुक की वेबसाइट को अवरोधित साइटों की सूची में से हटाने का किया। उत्सुकता और उत्तेजना का अनुभव करते हुए फेशबुक का नाम मैंने वेबसाइट के पते की जगह पर टाइप किया! लगभग एक महीने पहले, परीक्षाओँ में मिल रहे अंको की दुर्दशा पर अपना फतवा सुनाते हुए मैंने फेशबुक को अपने जीवन से कुछ समय के लिए निकाल दिया था। दूसरा सत्र समाप्त होने की अवस्था में था। पहले सत्र में जैसे तैसे पास हो पाया था। इस सत्र के आरंभ में तो कक्षा में सबकुछ समझ में आ रहा था। परंतु अचानक एक-एक करके पांचो विषयों में मामला बिगड़ने लगा। अध्यापक जो कुछ भी पढ़ा रहा था सब सिर के ऊपर निकलने लगा। रेत के महल की तरह इमारतें गिरने लगीं। मेरी इस दुर्दशा में काफी कुछ हिस्सेदारी फेशबुक की भी थी। मुझे पता ही नहीं लगता था कि फेशबुक पर कितना समय निकल जाता था। पढ़ने में सर्वोत्तम विद्यार्थी कभी-भी नहीं रहा। हाँ, बीच-बीच में अचानक किसी न किसी विषय में अच्छे परिणाम आ जाते थे। अपनी इस परिस्थिति पर विचार करते हुए एक माह पहले एक शाम को जब मैं अपने-आपको कोस रहा था, तभी मन में यह विचार आया कि काश कम-से-कम इस बार तो अच्छे अंक आ जाते! व्यक्ति साधारण काम चाहे ठीक से न कर पाये, लेकिन बड़े कामों के सपने देखने में कोई गुरेज नहीं करता। संभवतः मेरे मन में अपने जीवन की आखिरी परीक्षा में मिलने वाले अंकों को किसी प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी के आखिरी मैच की भाँति यादगार बनाने की कोई इच्छा दबी थी!

यूनिवर्सिटी आफ नार्थ कैरोलाइना की स्नातकोत्तर कक्षा के मेरे सहपाठियों द्वारा संचालित फेशबुक पेज पर आज कुछ विशेष चहल-पहल नहीं थी। मैं दो सत्रों की पढ़ाई आज ही पूरी हई थी और अब अगले सत्र में मुझे एम एस की थीसिस (अर्थात् अनुसंधान) के लिए काम करना था। थीसिस के लिए अभी तक विषय का चुनाव ही नहीं हो पाया था, इसलिए थीसिस के विषय के बारे में गाइड की अनुमति मिलने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था! यूनिवर्सिटी का अगला सत्र अब सितम्बर माह में आरंभ होना था, परंतु आप्रवासी होने के कारण गर्मियों की इन तीन महीने लम्बी छुट्टियों में भी, मेरी घर वापस जाने की कोई योजना नहीं थी। बल्कि इन गर्मी की छुट्टियों के समय में ही अगले सत्र की फीस का प्रबंध करना था! साथ-ही-साथ एम एस की रिसर्च की दिशा में अपना सारा ध्यान लगाकर शीघ्रतिशीघ्र एम एस की डिग्री प्राप्त करनी थी। परंतु, इन सबसे भी पहले कुछ समय के लिए मेरे अंदर का जिज्ञासु अब इस सुंदर और व्यवस्थित देश में कुछ स्थलों की यात्रा करना चाहता था! मेरी यह इच्छा मन भर कर पूरी न भी हो, तो भी कम से कम, इस दिशा में कुछ प्रयत्न तो करना ही चाहता था।

मुझे नई-नई जगहों को देखने का और उन स्थानों में रहने वाले लोगों का जीवन तथा वहाँ की वनस्पति आदि को स्वयं निकट से जाकर देखने का कौतूहल सदा से रहा है। मुझे यह स्वभाव अपने पिता से प्राप्त हुआ है, वे व्यापार के सिलसिले में जब भी अवसर मिलता, तो नये लोगों से फोन पर व्यापार करने की अपेक्षा यात्रा करके आमने सामने मिलना अधिक पसंद करते। शायद उनके ज़माने में लोग आमने-सामने मिल कर ही बात और व्यापार करना अधिक पसंद करते थे। इन यात्राओं में जब भी उचित होता मुझे भी अपने साथ ले जाते। पिताजी से जब भी उनकी आगामी यात्रा के बारे में कोई बात सुनता, तो मैं माँ से पिताजी को सिफारिश लगवाता और उस सिफारिश के बदले में माँ से वादा करता कि स्कूल की पढ़ाई पहले से ही कर लूँगा।

रात को सपनों में अपने आपको बस की सवारी करता हुआ देखता। यात्रा के दिन सुबह जल्दी से जल्दी उठकर तैयार हो जाता। बस में बैठते समय हमेशा मेरी कोशिश होती कि ड्राइवर के ठीक पीछे खिड़की वाली सीट पर बैठने को मिले, ताकि हवा भी लगे और सामने और दायें बायें हर तरफ की सड़क और बाहर की दुनिया देखने का मौका भी मिले। यह एक अलग बात है कि भारत के एक छोटे से नगर में छोटा-मोटा व्यवसाय करने वाले को इस प्रकार के कितने अवसर मिल पाते हैं? अपने पिता के साथ बचपन में ही मिलने वाले इस प्रकार के अवसरों ने मुझे भी घुमक्कड़ी का चस्का लगा दिया। आज भी जब मैं किसी नये स्थान की यात्रा करता हूँ तब मेरे पिता उस स्थान के बारे में अवश्य पूछते हैं। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, मेरी भ्रमण करने और इस धरती और इस पर रहने वाले लोगों, अन्य प्रजातियों, वनस्पति तथा इसके भूगोल के बारे में अधिकाधिक जानने की इच्छा बढ़ती चली गई। सुपरिचित स्थानों की यात्रा तो हम सभी के आकर्षण का विषय होती है और वह मुझे भी आकर्षित करती है, परंतु मुझे प्रसिद्ध स्थानों, किलों, पहाड़ों, झीलों और रमणीय स्थलों से अधिक हर स्थान की छोटी-छोटी स्थानीय वस्तुएँ अधिक आकर्षित करती हैं।

गत वर्ष, जब मुझे यहाँ अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला, तब मेरे मन में सबसे पहला विचार अमेरिका के स्थानों का भ्रमण कर सकने की संभावना के बारे में ही आया था! पहले वर्ष का पाठ्यक्रम समझने और यहाँ के वातावरण में अभ्यस्त होने में अभी तक इतना समय लग गया कि इस विषय में कुछ विशेष प्रगति नहीं कर पाया। समय की कमी के साथ-साथ इसके लिए आवश्यक धन भी मेरे पास नहीं था। यदि यहाँ की व्यवस्था को अच्छी समझ लेता तब तो संभवतः हिप्पियों की तरह घुमक्कड़ी का रास्ता भी खोज लेता, परंतु उस तरीके से न तो मुझे घूमने की इच्छा है, और न ही घुमक्कड़ी की वैसी तीव्र कामना।

यूनिवर्सिटी की एक साल की ट्यूशन फीस का प्रबंध तो मैंने किसी प्रकार अपने पिछले चार सालों की कमाई के बाद हुई बचत से कर लिया था! भारत में आई टी में काम करते समय मेरे कुछ सहयोगियों के साथ कुछ ऐसे प्रोजेक्टों में काम करने का मौका मिला कि उससे अतिरिक्त आय तो हुई ही, साथ-ही-साथ धन कमाने के एक और तरीका का पता लग गया। इसका फायदा उठा कर मैं अमेरिका आने के बाद भी उसी तरह के प्रोजेक्टों पर काम करता रहा हूँ।या। पर यहाँ के सामान्य जीवन के खर्चे भी इतने अधिक हैं कि बहुत सावधानी से गुजारा करने पर ही काम चल पाया है। इस धनराशि में मेरी इच्छाओं के अनुरूप अमेरिका घूमने का शौक पूरा हो सके, इसकी संभावना कम ही दिखाई पड़ती है। डॉलर और रुपये में असमानता इतनी अधिक है कि अपने परिवार से पैसे माँगकर अपनी इच्छाएँ पूरी करूँ, इसकी तो कोई संभावना ही नहीं है! वैसे भी, मध्यम वर्ग के लोगों के पास अपना जीवन चलाने के लिए धन होता है, न कि अपने शौक पूरे करने के लिए! इसी कारण नौकरी करते समय जो पैसा बचा सका उसमें से फीस, अमेरिका आने का हवाई टिकट का पैसा और उसके ऊपर हजार डॉलर अपने लिए बचाकर बाकी की सभी जमा-पूँजी और अपना सामान माँ-पिताजी को दे आया था। पिछले 10 महीनों से पढ़ाई और प्रोजेक्ट के अतिरिक्त आस-पास की दुकानों पर छोटे-मोटे काम करके किताबों और जीवन-खर्च के लिए पैसे कमाता रहा हूँ।

अभी तक के काम से बचाए हुए पैसे को भविष्य के लिए भी बचाये रखने की तीव्र आवश्यकता होते हुए भी, जहाँ तक हो सके, इन गर्मियों में मैं उत्तरी पूर्व अमेरिका के कुछ स्थानों की यात्रा करना चाहता था। इसी इच्छा से मैंने अपनी कक्षा के फेश बुक के पेज पर लॉग-इन करके यह जानना चाहा, कि क्या मेरी तरह कोई और भी इस प्रकार की सड़क यात्रा में दिलचस्पी रखता है? इस जिज्ञासा के पीछे मेरी मंशा यह थी कि संभवतः कई लोग इस प्रकार की यात्रा के इच्छुक हों? परंतु, जब पूरा एक दिन निकल जाने के बाद भी मेरे प्रश्न पर किसी ने कोई टिप्पणी नहीं की, तब मुझे निराशा होने लगी।

अंततोगत्वा, दूसरे दिन एक मेरी एन ने फेशबुक पेज पर लिखा कि, यदि मैं कैनेडा की यात्रा करने में इच्छुक होऊँ, तब वह भी यात्रा में साथ जा सकती है। यह क्या बात हुई? मैं हवाई यात्रा की योजना थोड़े ही बना रहा था और यदि सड़क के मार्ग से जाना है तो फिर व्यक्ति मध्य अटलांटिक से सीधा कैनेडा क्यों जायेगा? एक और भी बात थी! ऐसा मैंने क्यों सोचा होगा, यह तो मैं नहीं जानता, परंतु फेश बुक में संदेश लिखने से पहले मेरे मन में यह विचार तो बिल्कुल भी नहीं आया था, कि कोई अपरिचित लड़की मेरे साथ इस प्रकार की यात्रा की बात सोच सकती है? भारत में नौकरी करते समय तो स्त्री-पुरुष एक साथ काम करते ही हैं, परंतु इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई के समय मेरी सभी विभागों की कक्षाओं में सब को मिलाने के बाद भी केवल ग्यारह लड़कियाँ ही पढ़ती थी। यों भी कालेज के समय की मिलनसारिता अब तक मेरा साथ छोड़ चुकी थी। इसी कारण यहाँ पर इतने समय बाद भी मेरे मित्र अधिक संख्या में नहीं थे। जिन्हें मित्र कहा जा सकता था, वे सभी पुरुष ही थे। शायद इसी लिए, मैंने स्वाभाविक तौर पर यह भी सोचा था कि मेरे इस प्रश्न का उत्तर भी कोई लड़का ही देगा, परंतु यह भी सही है कि इंजीनियरिंग के अलावा हमारे इस विश्वविद्यालय में विज्ञान, कला और संगीत आदि के विभिन्न विषय भी पढ़ाए जाते हैं, इसलिए देखा जाये तो जो हुआ वह नितांत सामान्य सी बात ही है। मेरी एन को कोई उत्तर देने से पहले, मैंने सोचा कि कुछ देर और इंतजार कर लूँ, संभव है कोई और भी मेरे प्रश्न का उत्तर दे दे! कैनेडा तक जाने का मतलब यह होगा कि खर्चा और अधिक बढ़ेगा, साथ ही भारतीय पासपोर्ट धारी होने के कारण मुझे कैनेडा के लिए वीसा भी अलग से लेना पड़ेगा, जिसका खर्च अलग से होगा।

दो दिन तक बेसब्री से इंतजार करने के बाद, मैंने एक बार पुनः फेश बुक पेज पर प्रश्न पूछकर इस यात्रा में अन्य लोगों की दिलचस्पी जाननी चाही। दो-तीन घंटों तक कोई उत्तर नहीं आया और मुझे यह मानना ही पड़ा कि अन्य किसी व्यक्ति की दिलचस्पी इस यात्रा में नहीं थी। इस समय तक अधिकांश विद्यार्थी अपने घरों को जा चुके थे। जो ग्रीष्मावकाश के समय में चलने वाली कक्षाओं में भाग लेने वाले थे, वे संभवतः अपनी कक्षाओं में व्यस्त होने से पहले अपने घर होकर वापस आना चाहते थे। मैने फेशबुक के जरिए ही मेरी एन से पूछा कि वह कैनेडा में कहाँ जाना चाहती है? मुझे यह डर था कि कहीं वह पश्चिमी कैनेडा जाने के बारे में न सोच रही हो!

मेरी एन का उत्तर लगभग 2-3 घंटे बाद आया। वह क्यूबैक प्रांत की यात्रा करना चाहती थी, जो कि अमेरिका के उत्तर पूर्वी भाग से भी उत्तर में था। इस हिसाब से हम दोनों की यात्रा की दिशा एक ही थी। मुख्यतः मेरी इच्छा उत्तर पूर्व दिशा की ओर, अर्थात् न्यूयार्क और बॉस्टन की यात्रा करने की थी। मैं इस यात्रा में कम से कम एक और व्यक्ति का साथ चाहता था, ऐसी चाह के पीछे दो कारण थे। एक कारण तो यह था कि यात्रा और रहने का खर्च आधा-आधा बँट जाता। एक और साथी होने से यात्रा का आनन्द और अनुभव भी अच्छा होता। परंतु साथी पुरुष की जगह एक स्त्री के हो जाने से मेरी खर्च बचाने की यह योजना अब खटाई में पड़ने वाली थी। अतः अब इस यात्रा के बारे में ही मुझे पुनः सोचना पड़ गया।

यह बात तो ठीक है कि, अब समय पहले जैसा नहीं रहा, जब लड़के और लड़कियों में बहुत अतंर होता था। परंतु, मैं एक छोटे नगर में पला-बढ़ा हूँ, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में बात-चीत करने और घूमने-फिरने आदि के मामलों में महिलाओं की जगह पुरुष मित्र अधिक पसंद करता हूँ, क्योंकि मेरा अनुभव है कि आम तौर पर लड़कियों की जिंदगी और स्वभाव दोनों ही बड़े पेचीदा होते हैं। यहाँ तो अमेरिका में रहने वाली लड़की की बात है, पता नहीं कौन-कौन सी बातों का ख्याल रखना होगा, जिनके बारे में किसी लड़के के साथ यात्रा करने का कार्यक्रम बनाते हुए शायद मैं एक बार भी विचार नहीं करता! मेरी दृष्टि में यात्रायें तीन तरह की होती हैं। पहली जिसमें आप किसी-न-किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। इस यात्रा में लगभग सारा कार्यक्रम सुनियोजित होता है। कहाँ से जाना है, कहाँ जाना है, किस स्थान पर ठहरना है इन सबकी पहले से योजना बनाई जाती है। इस यात्रा की सफलता इस बात पर निर्भर होती है कि सभी काम सही समय पर हों, अपेक्षित सुविधाएँ बनी रहें। यदि कोई भी कार्य समय पर न हुआ तो बहुत मंजे हुए यात्रियों को छोड़कर लगभग सभी लोग तनाव में आ जाते हैं। रेल या हवाई जहाज समय पर न मिलें, मार्ग में यातायात आदि हो तो इस प्रकार की यात्रा दुष्कर और अत्यधिक परेशान करने वाली हो जाती है।

दूसरे प्रकार की यात्रा अधिकतर लोग सैर सपाटे के लिए परिवार के साथ करते हैं। इस यात्रा का मुख्य ध्येय आनन्द और यात्रा में सुख प्राप्ति करना होता है। तीसरे प्रकार की यात्रा वे लोग करते हैं जो यात्रा के लिए यात्रा करते हैं। यात्रा से उनको किसी विशेष परिणाम की अपेक्षा नहीं होती, जो कुछ यात्रा में होता है, उसी का आनन्द है। इस प्रकार के लोग कई स्थानों पर यात्रा करते हुए लक्ष्य पर पहुँचते तो हैं, परंतु स्वाभवतः वे यात्रा के हर पहलू में आनन्द लेते हैं। उन्हें किसी भी स्थान पर रुकने या छोड़ने की कोई व्यग्रता नहीं होती। यात्रा में होने वाली कोई भी कठिनाई उनके लिए कठिनाई नहीं होती। उनके लिए यात्रा सुख का साधन भी है और साध्य भी। इस प्रकार के लोगों को यायावर के नाम से जाना जाता है।

मैं कुछ सीमा तक यायावर हूँ और इस रूप में यह मेरी पहली स्वतंत्र यात्रा है। मेरी एन किस प्रकार की यात्री है और उसकी इस यात्रा से क्या अपेक्षाएँ है यह तो साथ यात्रा करने पर ही पता चलेगा। इसलिए कुल मिलाकर, यात्रा की योजना सोच समझकर और इन बातों को ध्यान में रखते हुए बनानी पड़ेगी।

मैं आशा कर रहा था कि अपने साथी के साथ रुकने वाले सभी स्थानों पर दो पलंगों वाले कमरे का चुनाव करके, हम अपनी यात्रा में होटल के खर्चे को ठीक आधा कर देंगे। परंतु, एक लड़की के साथ यात्रा करने में ऐसा करना संभव नहीं था। यह भी जानना आवश्यक था कि वह कितने दिनों के लिए जाना चाहती है, मेरी इच्छा तो कम से कम पूरे दो सप्ताहों तक भ्रमण करने की थी। मैंने अपनी यात्रा की एक रूपरेखा बना रखी थी। किन-किन नगरों में जाया जा सकता था, इस बारे में एक ढीला-ढाला प्रारूप मेरे मस्तिष्क में था, परंतु अब कैनेडा के नगरों के बारे में भी सोचना था। उस संबंध में कई पहलुओं पर विचार करना था।

मेरा अंदाजा था कि मेरी एन भी, यहीं किसी-न-किसी छात्रावास या व्यक्तिगत आवास में रहती होगी, यह सोचकर मैंने उससे मिलकर बात करना ही ठीक समझा। एक बात और भी थी कि, जिस व्यक्ति के साथ मैं लगभग पंद्रह दिन और रातें बिताने वाला था, उससे रू-ब-रू मिलना और उसके साथ अपने विचारों का कम-से-कम कुछ हद तक मिलाना अत्यंत आवश्यक था। यदि हममें से, किसी को भी दूसरा व्यक्ति सहज ही पसंद नहीं आया, तब तो किसी और का साथ देखना ही होगा, अन्यथा यात्रा आनन्ददायी होने की बजाय कष्टकारी हो सकती थी।

यही सब सोचते हुए मैने फेशबुक की चैटिंग सुविधा पर मेरी एन से कहीं मिलने का आग्रह किया। मेरा विचार तो मुख्य पुस्तकालय में मिलने का था, परंतु मेरी एन ने “मेकेडो सैंडविच” शाप में मिलने की बात की तो मैं भी सहर्ष ही मान गया। वह शाम के भोजन के बाद 7:30 बजे मिलना चाहती थी, तब तक मैं नित्य प्रति का व्यायाम आदि करके निवृत्त हो सकता था। मेकेडो में मिलने का एक लाभ यह भी था कि मैं कम-से-कम इसी बहाने, यूनिवर्सिटी कैफेटेरिया के भोजन से बचकर कहीं बाहर का “सैंडविच” खा सकता था।

शाम का व्यायाम करने के बाद, अपनी साइकिल से जिस समय तक मैं “मैकेडो” पहुँच पाया, तब तक लगभग 7:35 हो रहा था। मन-ही-मन मैं शर्मिंदा था, कि मैं समय से नहीं पहुँच पाया। परंतु, वहाँ पहुँचने पर, मेज-कुर्सियों अथवा बार दोनों ही जगहों में, मुझे एक भी लड़की नहीं दिखाई दी। वहाँ उसे न पाकर, अब मुझे अचानक ही यह ध्यान आया कि हमने आपस में फोन नंबरों का आदान-प्रदान तो किया ही नहीं था। यदि फोन नंबर लिया होता तो इस समय पूछ सकता था कि उसके यहाँ आने में कितनी देर थी! खैर, मुझे तो विचार ही नहीं आया था, शायद उसने भी न सोचा हो। अब अगर फेशबुक पेज पर देखना चाहूँ, तो इंटरनेट का डाटा प्लान लगेगा। मेरे फोन का “डाटा प्लान” सीमित था, इसलिए मैं उसका प्रयोग काफी किफायत से करता था। इस शाप का वायरलैस इंटरनेट भी मन-मौजी किस्म का था, कभी चलता था, कभी नहीं।

कोई बात नहीं, अब वापस जाने, अथवा यहीं अधिक समय तक इतजार करने से तो यही अच्छा था कि फेशबुक पर देख कर पता किया जाये कि मेरी एन इस समय “आनलाइन” थी या नहीं? इससे उसके कार्यक्रम का पता चल ही जाने वाला था। मैंने खिड़की के बाहर देखते हुए अपने सेल फोन पर अभी “डाटा प्लान” को आन किया और मेरी एन से संपर्क साधने को उन्मुख हुआ। वह इस समय फेशबुक पर सक्रिया नहीं थी, इसका अर्थ यही लगाया जा सकता था कि वह हो सकता है कि रास्ते में हो। मैं सोचने लगा कि ऐसा ही हो तभी फायदा है, अन्यथा मेरा यहाँ आना व्यर्थ था।

बीते सत्र के बारे में सोचते हुए मेरी दृष्टि नेपथ्य में कहीं खो गई। कुछ समय पश्चात् मैंने अपनी दृष्टि के कोने पर अनुभव किया किसी महिला का शरीर जिसकी चाल योरोपियन लोगों की तरह थी मेरी दृष्टि की सीमा में आया। यहाँ के एकाकी जीवन में अन्य लोगों को आते-जाते हुए देखते रहने के कारण अब मैं यहाँ के काकेशियन (योरोपीय उद्भव) स्त्री-पुरुष, एफ्रो-अमेरिकन (अफ्रीकी उद्भव) स्त्री-पुरुष, चाइनीज (चीन) केवल स्त्रियाँ, भारतीय स्त्री-पुरुष को उनकी चाल से पहचान लेने लगा हूँ। मेरा अनुमान अंधेरे-उजाले दोनों परिस्थितियों में अधिकांशतः सही निकलता है, क्योंकि इन सभी वर्गों के लोगों की चाल एक विशिष्ट प्रकार की होती है। अभी-भी मैं चाइनीज पुरुषों और काकेशियन पुरुषों की चाल को सही तरह पहचानने में गड़बड़ कर जाता हूँ, पर पहले लिखे अन्य वर्गों में तो यह पहचान आसान है।

मैंने अपनी दृष्टि नेपथ्य से हटाकर कमरे की वस्तुओं से होते हुए एक दुबली-पतली लड़की पर केंद्रित की। उसके हाव-भाव बता रहे थे कि वहाँ पर किसी को ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी। मैं झिझका और इससे पहले कि उससे कुछ पूछता, वह भी झिझकती हुई बोली, “क्या आप सुरेश हैं?” मैने तुरंत राहत-भरी साँस ली, और प्रतिउत्तर में बोला, “हाँ, और आप मेरी एन?” उसने सहमति में सिर हिलाया। मैं सड़क की ओर वाली कुर्सियों की ओर बढ़ा, पर फिर झिझक कर उससे पूछा, “आप कुछ लेना चाहती हैं?” उसने इनकार में सिर हिलाया। जब मेरी एन ने “मैकडो” में मिलने के लिए कहा था, तब मुझे लगा कि शायद वह भी वहीं खाना चाहती होगी। हो सकता है बात होने और मिलने के बीच में उसका मन बदल गया हो। खैर मुझे क्या करना! सैंडविच तो मुझे भी खाना था, परंतु उसकी कोई विशेष जल्दी नहीं थी। मैं उसके जाने के बाद इतमीनान से खाना चाहता था। यदि बर्गर में साढ़े पाँच डालर खर्च करने ही थे, तो उसका मजा भी क्यों न लिया जाये।

मेरी एन लगभग साढ़े पाँच फुट की दुबले-पतले शरीर की लड़की थी। उसके चेहरे पर कुछ उत्सुकता और कुछ झिझक मिश्रित भाव थे। बाल लालिमा लिए थे और उसके यूरोपीय आनुवांशिकता वाले चेहरे पर कुछ मुहाँसे और कुछ चकत्ते से थे। यहाँ की भाषा में ऐसे चेहरे को “फ्रिकल्ड फेश” कहते हैं। गर्मियों के कारण उसने कैपरी शार्ट और ऊपर एक होजरी का टाप पहना हुआ था। हम दोनों एक मेज के आमने-सामने पड़ी कुर्सियों पर बैठ गये।

देखने में तो वह सामान्य लोगों जैसी ही दिख रही थी, उसके बाल हरे अथवा बैंगनी रंग के नहीं थे, न ही उसके शरीर पर गोदने तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के छल्ले आदि थे। कुल मिलाकर यात्रा में अपने साथी से जितनी उम्मीदें हो सकती थीं, उसके हिसाब से वह ठीक-ही थी। मेरे लिए इतना ही काफी था कि मेरा सहयात्री ऊटपटाँग आदतों वाला न हो, क्योंकि हम महज कुछ दिनों की यात्रा पर ही साथ होने वाले थे, न कि जीवन पर्यंत के मित्र बनने वाले थे! अब मुझे तो आगे केवल यही जानना था कि वह कैनेडा के क्यूबेक में कहाँ जाना चाहती है?

सबसे पहले तो मैंने उसे औपचारिक धन्यवाद दिया, तत्पश्चात् बातचीत आरंभ करने के लिए, पहले अपना परिचय देते हुए उसे अपने बारे में यह बताया, “मैं इन्फार्मेशन सिस्टम्स में मास्टर्स का कोर्स कर रहा हूँ, हो सकता है कि पीएचडी भी करूँ। आजकल चूँकि अपनी थीसिस पर काम कर रहा हूँ, इसलिए थोड़ा समय मिल पा रहा है, इसी विचार से जहाँ तक की दूरी कार की यात्रा से तय की सकती है, उन स्थानों का भ्रमण करना चाहता हूँ।“ उसने भी जवाबी परिचय के रूप में मुझे अपने बारे में बताया, “मैं मानव विज्ञान विभाग में स्नातकोत्तर कर रही हूँ।“

बातचीत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से मैंने कहा, “मैं लम्बे समय से मौका ढूँढ़ रहा था कि आस-पास के स्थानों का भ्रमण कर सकूँ, परंतु आवश्यक पैसा और समय न होने के कारण इसका मुहूर्त नहीं बन पा रहा था।“ मेरी बात सुनकर मेरी एन ने अपने होंठों को हल्की मुस्कराहट में फैला कर मुझे यह इशारा किया कि वह इन दोनों समस्याओं को बहुत अच्छी तरह जानती है। उसकी हल्की मुस्कराहट से प्रोत्साहित होते हुए मैंने आगे बताया, “ मैं अकेले जा सकूँ, इतना पैसा तो अभी मैं यात्रा में खर्च करने की इच्छा नहीं रखता, पर लगता है, समय निकला जा रहा है, क्योंकि यदि एक बार कोई नौकरी पकड़ ली, तब संभवतः इस तरह घूमने के लिए एक साथ समय न मिल पाये। इसीलिए मैं एक साथी को ढूँढ रहा था। इस प्रकार यात्रा का खर्च भी आधा हो जाता और साथ भी हो जाता।“

मैंने आगे कहा, “असल में मेरी यह मजबूरी है, कि, मेरे पास इतने पैसे नहीं है, नहीं तो मैं अकेला ही निकल जाता, क्योंकि आमतौर पर यात्रा में किसी को साथ लेने से खर्च तो हल्का हो जाता है, पर दो लोगों का आपस में यदि मेल न बने तब तो यात्रा का सारा मजा किर-किरा हो जाता है।“ मेरे लिए यह एक बहुत बड़ा प्रयोग था, कि मैं किसी अजनबी के साथ यात्रा का कार्यक्रम बनाऊँ, क्योंकि मैं स्वभावतः स्वतंत्र प्रकृति का व्यक्ति हूँ, और चाहे सुविधाएँ कम ही क्यों न हो पर अपनी जिंदगी को अपनी तरह से बिताना ही पसंद करता हूँ। खैर, मैंने उसे आगे बताया, “मैं वाशिंगटन, फिलाडेल्फिया, न्यूयार्क, बॉस्टन से होते हुए न्यू हैम्पशायर और मेन राज्य तक उत्तरी दिशा में जाना चाहता हूँ। वहाँ से वापस लौटते समय यदि समय मिला, तो न्यागरा फॉल्स और पेन्सेलवेनिया के कुछ स्थानों को भी देखना चाहूँगा। सब कुछ यात्रा में होने वाले खर्चे पर निर्भर करता है। यदि सब कुछ मेरी योजना के अनुसार चला, तब संभवतः मैं इन सभी जगहों पर जा सकूँगा।“

इस सोच के पीछे मेरा मंतव्य अपने मित्र खालिद से उसकी पुरानी निशान अल्टीमा कार उधार लेकर सड़क की यात्रा करना था। हम इस बारे में पहले ही एक दो बार चर्चा कर चुके थे। मैं और खालिद यहाँ अच्छे दोस्त बन चुके थे। हमारे बीच अक्सर लंबी बातें चला करती थीं। 10-15 दिनों के लिए अपनी कार उसे उधार देने मे कोई आपत्ति नहीं थी। बस उसकी शर्त यही थी कि कार में यदि कोई मरम्मत आदि करवानी पड़े तो उसका खर्च मुझे उठाना होगा। इसलिए मेरा पूरा इरादा था कि कार को बहुत संभाल कर चलाऊँगा, ताकि व्यर्थ का खर्च मेरे ऊपर न आये। इसी कारण यह आवश्यक था कि यात्रा में साथ जाने वाला दूसरा व्यक्ति भी उसी तरह संभाल कर, कार का उपयोग करे। साधारण सी यात्रा भी कितनी तैयारी की माँग रखती है, यह अब मुझे समझ में आने लगा था।

मोटे तौर पर शारलोट, नार्थ कैरोलाइना से आरंभ करके मैं पहले वाशिंगटन डी.सी, फिर वहाँ से फिली, फिली से न्यू जर्सी, वहाँ से बास्टन, बास्टन से एकेडिया नेशनल पार्क, एकेडिया से न्यागरा फाल्स्, और न्यागरा फाल्स् से वापस आते समय पिट्सबर्ग, और सबसे अंत में पिट्सबर्ग से वेस्ट वर्जीनिया होते हुए वापसी की इच्छा रखता था।

उसने कहा, “मैं तो मुख्यतः कैनेडा की यात्रा करना चाहती हूँ।“ मैंने उससे विवरण जानने के लिए पूछा, “ आप कैनेडा में कहाँ की यात्रा करना चाहती हैं?” तो वह बोली, “मैं टौरेंटो, मॉन्ट्रियाल और क्यूबैक सिटी तो जाना ही चाहती हूँ, अगर आस-पास के कोई और नगर भी जा सकें तो अच्छा होगा। मुझे कैनेडा में अपने कुछ पुराने परिचितों से मिलने की इच्छा भी है।“

मैने राहत की साँस ली। कम-से-कम यह एक बात अच्छी थी कि वह क्यूबेक के अलावा पश्चिमी कैनेडा की ओर नहीं जाना चाहती थी। मैने आगे कहा, “मेरी योजना लगभग 10-12 दिनों की यात्रा की है, अब यदि कैनेडा भी जायें तो इसका मतलब है कि कम-से-कम 3-4 दिन और लग सकते हैं। आप इतने दिनों के लिए सड़क यात्रा पर जाना चाहती हैं? वह बोली, “मैं तो सोच रही थी कि हम पाँच-सात दिन में वापस आ जायेंगे। आपको नहीं लगता कि 15 दिन बहुत लम्बा समय हो जायेगा?” मैंने सहमति में सिर हिलाया, “हाँ, बात तो सही है, 15 दिन अधिक हो जाते हैं। मेरा खुद का विचार भी 10 दिनों की यात्रा का ही था। ठीक है 10 दिनों में ही वापस लौटने की योजना बनाते हैं।” उसने पूछा, “इस यात्रा में कितना खर्च हो जायेगा?” मैंने कहा, “10 दिनों के हिसाब से लगभग 1500 डॉलर। लेकिन यदि दो लोग जाते हैं, तब होटल और गैस का खर्च आधा हो जाता है। यदि मैं अकेला जाता तो लगभग 90 डॉलर प्रतिदिन रुकने का खर्च होता। इसके ऊपर गैस का खर्च लगभग 30 डॉलर और प्रति व्यक्ति भोजन को मिलाकर लगभग 20 डॉलर और टोल आदि 10 डॉलर लगने वाले थे। इस तरह दस दिनों में डेढ़ हजार डॉलर खर्च होते।“ वह बोली, “प्रति व्यक्ति 750 डॉलर।” मैनें कहा, “हाँ, लगभग।” वह विचारमग्न हो गई।

इतना बजट तो मैंने बनाकर रखा ही था। इसीलिए पिछले दो महीनों से जनरल स्टोर पर कैशियर का काम अलग से करके कुछ अतिरिक्त कमाई भी कर रहा था। परीक्षाओं के बीच में यह सब करना कुछ आसान नहीं था, पर जहाँ चाह वहाँ राह! यदि कोई और भी जाता तो मैं 10 की बजाए 15-16 दिनों की यात्रा आराम से कर सकता था। आर्थिक समस्या का हल तो मिल गया, पर होटल के एक ही कमरे में रात गुजारने की समस्या अभी भी बनी हुई थी।

मैने उसे प्रतिदिन की यात्रा का खर्च और रुकने के खर्च के बारे में बताकर, यह भी स्पष्ट किया कि यदि वह भी चलती है, तब खर्चा किस प्रकार का होगा। मैने कहा, “हम कार की गैस का खर्चा तो आधा-आधा उठा लेंगे, परंतु मेरी योजना अपने साथी के साथ एक ही कमरे में रुकने की थी। अब यदि हम कमरे अलग-अलग लेंगे, तब उस अवस्था में साझे में यात्रा करने में केवल गैस और टोल का पैसा ही बँटता है, जिससे कोई विशेष बचत नहीं हो पायेगी।“ इस हालत में मुझे तो निश्चित तौर पर आर्थिक समस्या आने वाली थी। मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि उसकी आर्थिक स्थिति कैसी थी। उसके कपड़ों इत्यादि से कुछ भी स्पष्ट नहीं हो रहा था।

वह बोली, “कमरा तो एक ही ले सकते हैं, पर उस कमरे में पलंग तो अलग-अलग ही होगें ना?” मैं आश्चर्य चकित हो गया! एक ही पलंग पर अपने सहयात्री के साथ सोने का इरादा तो मेरा, उसको तो छोड़ो, किसी लड़के के साथ भी नहीं था! ऐसा कोई सोच भी कैसे सकता था!

अभी तक उसके अंग्रेजी बोलने के ढंग से मुझे यह अंदाजा लग रहा था कि संभवतः वह भी मेरी तरह अंतरार्ष्ट्रीय छात्रा थी। परंतु होटल के कमरों और उनमें प्रयोग होने वाले बिस्तरों के बारे में उसकी अनभिज्ञता से मेरा शक और बढ़ गया। वैसे ऐसा भी नितांत संभव है कि अमेरिका में ही पली-बढ़ी लड़की बचपन से लेकर आज तक कभी-भी होटल में न रुकी हो। वह बाहर से आई है, इस विचार का कारण उसकी भाषा के साथ-साथ यह भी है, कि अमेरिका में रहने वाले आम लोगों का आर्थिक स्तर भी इतना होता है कि साधारण परिवार वाले लोग भी गर्मियों में कार उठा कर घूमने निकल जाते हैं। इस अवस्था में आवश्यकता पड़ने पर मार्ग में होटल में रुकना भी हो ही जाता है। साधारण परिवारों के लोग दो या तीन सितारा होटलों में आम तौर पर एक किंग बैड या फिर दो क्वीन बैड वाले कमरों में रुकते हैं। इस प्रकार के कमरों का एक रात का किराया आम तौर पर एक ही होता है।

लोगों की राय

Narendra Patidar

romio and juliyet

Anshu  Raj

Interesting book

Sanjay Singh

america ke baare mein achchi jankari

Nupur Masih

Nice road trip in America

Narayan Singh

how much scholarship in American University

Anju Yadav

मनोरंजक कहानी। पढ़ने में मजा आया

MANOJ ANDERIYA

Is it easy make girl friends in America

Abhishek Sharma

where i get full story of this book

Sanjay Nagpal

Very good romantic novel

Gd Mehra

Thank you giving this book for free