लोगों की राय

उपन्यास >> अवतरण

अवतरण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

137 पाठक हैं

हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


एक दिन गान्धारी ने अपने पति धृतराष्ट्र से कह दिया, ‘‘आर्य! मेरे देवर के पुत्र तो अब बड़े-बड़े हो गये होंगे। उनको कभी बुलाइयेगा नहीं?’’

धृतराष्ट्र ने पूछ लिया, ‘‘संजयजी! आपकी क्या सम्मति है?’’

‘‘मैं समझता हूँ महारानी का कहना यथार्थ है। राजकुमारों को यहाँ लाकर उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध राजकुमारों के समान होना ही चाहिए।’’

इस पर द्रोणाचार्य ने कह दिया, ‘‘महारानीजी को अपने सौ पुत्रों से तो अवकाश मिलता नहीं। अब पाँच अन्य को बुलाने से क्या बात सम्पन्न हो सकेगी?’’

इसका उत्तर गान्धारी ने मुस्कराकर दिया, ‘‘आचार्यजी! यही तो मैं कह रही हूँ। जहाँ एक सौ है, वहाँ पाँच अन्य में कोई कठिनाई नहीं पड़ेगी। हैं तो वे भी माताजी की सन्तान।’’

‘‘तो माताजी से पूछ लीजिए। क्या वे भी उनको अपनी सन्तान समझती हैं?’’

‘‘तो वे नहीं मानतीं क्या?’’

‘‘यदि मानती होतीं तो उनको बुला न भेजती अथवा स्वयं उनसे मिलने न चली जातीं?’’

इस पर गान्धारी चुप हो गई। धृतराष्ट्र को यह सब विलक्षण प्रतीत हो रहा था। उसने उसी दिन पृथक् में मुझको बुलाकर पूछा, ‘‘गुरुजी! मुझको अपने परिवार की यह विषय मनोवृत्ति पसन्द नहीं है।’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book