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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘यह यहाँ कैसे आता है?’’

‘‘यह दुर्योधन का मित्र है और गुरु द्रोणाचार्य इससे बहुत प्रसन्न है।’’

‘‘यह बालक तो राजकुमारों से भी अधिक चातुर्य प्राप्त कर रहा है।’’

‘‘यों तो यह दुर्योधन से बड़ी आयु का है। इस समय लगभग तेरह वर्ष का होगा।’’

‘‘यह देखने में अति सुन्दर और क्षत्रिय-पुत्र प्रतीत होता है। अधिरथजी को मैं जानता हूँ। एक बार मैं उनसे मिला था। वे और उनकी पत्नी कृष्णवर्ण की है।’’

‘‘हाँ, यह उनका अपना पुत्र नहीं है। उन्होंने इसको नदी में एक टोकरे में बहते पाया था। उस समय यह एक दिन का ही था। गुरु द्रोणाचार्य का कहना है कि यह अवश्य किसी क्षत्रिय-कन्या से किसी क्षत्रिय का विवाह के अतिरिक्त पुत्र है। अन्यथा इतने सुन्दर बालक को जन्म के पहले दिन ही कौन नदी में बहा देगा?’’

इस सम्भावित जन्म-कथा को सुनकर भी उस युवक के प्रति मेरा आकर्षक बढ़ गया।

दुर्योधन आदि की धनुर्विद्या की शिक्षा से मैं अति सन्तुष्ट था। इस पर भी शकुनि का वहाँ रहना मेरी समझ में नहीं आ रहा था। यह क्यों अपने पिता से और राज्य से दूर यहाँ पड़ा हुआ है, वह अभी भी मेरे लिए एक रहस्य था।

इस विषय में मैंने एक दिन भीष्मजी से बात की। मैंने पूछा, ‘‘श्रीमान्! यह शकुनि यहाँ क्यों पड़ा हुआ है?’’

‘‘यह अच्छा व्यक्ति नहीं है। मैं तो अब तक बलपूर्वक उसको उसके राज्य में वापस भेज चुका होता, परन्तु गान्धारी, दुर्योधन आदि उससे बहुत हिल-मिल गये हैं। दोनों उसके यहाँ से भेजने के सर्वथा विरुद्ध हैं। वास्तव में वह कुमारों पर अत्यधिक प्रभाव रखता प्रतीत होता है।’’

भीष्मजी में एक दोष सदा से रहा था कि वे दूसरों की, विशेष रूप से परिवार की स्त्रियों की बातों को अनुचित मानते हुए भी, उनका विरोध नहीं कर पाते थे। जब भी किसी स्त्री ने उनसे किसी कार्य के लिए हठ किया तो वे उसको न मानते हुए भी यह कह देते थे, ‘हो जायेगा।’

भीष्मजी की दुर्बलता के कारण पहले राजमाता सत्यवती की और तत्पश्चात् गान्धारी की इस परिवार में चलती थी। वे शकुनि को अच्छा युवक न समझते हुए भी सहन कर रहे थे।

इससे भी अधिक भयंकर बात का पता तब चला, जब मैंने पांडु के विषय में बात चलाई। मेरा कहना था, ‘‘महाराज! पांडुजी को राजधानी से चले गये बहुत समय व्यतीत हो गया है। उनको कभी-कभी तो यहाँ बुलाना ही चाहिए और फिर उनके भी तो पुत्र हैं, जिनकी शिक्षा-दीक्षा का उचित प्रबन्ध होना चाहिए।’’

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