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व्यवहारिक मार्गदर्शिका >> नया भारत गढ़ो

नया भारत गढ़ो

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :111
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9591
आईएसबीएन :9781613013052

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संसार हमारे देश का अत्यंत ऋणी है।


भारत का भविष्य

क्या भारत मर जायगा? तब तो संसार से सारी आध्यात्मिकता का समूल नाश हो जायगा, सारे सदाचारपूर्ण आदर्श जीवन का विनाश हो जायगा, धर्मों के प्रति सारी मधुर सहानुभूति नष्ट हो जायगी, सारी भावुकता का भी लोप हो जायगा। और उसके स्थान में कामरूपी देव और विलासितारूपी देवी राज्य करेगी। धन उनका पुरोहित होगा। प्रतारणा, पाशविक बल और प्रतिद्वंद्विता, ये ही उनकी पूजापद्धति होगी और मानवता उनकी बलिसामग्री हो जायगी। ऐसी दुर्घटना कभी हो नहीं सकती।

फिर से कालचक्र घूमकर आ रहा है, एक बार फिर भारत से वही शक्ति-प्रवाह निःसृत हो रहा है, जो शीघ्र ही समस्त जगत् को प्लावित कर देगा। विश्वास रखो, विश्वास रखो - प्रभु की आशा है कि भारत की उन्नति अवश्य ही होगी और साधारण तथा गरीब लोग सुखी होंगे। भारत का पुनरुत्थान होगा, पर वह जड़ की शक्ति से नहीं, वरन् आत्मा की शक्ति द्वारा। वह उत्थान विनाश की ध्वजा लेकर नहीं, वरन् शांति और प्रेम की ध्वजा से संन्यासियों के वेश से - धन की शक्ति से नहीं, बल्कि भिक्षापात्र की शक्ति से संपादित होगा।

हमारे कार्यों पर भारत का भविष्य निर्भर है। देखिए वह भारतमाता तत्परता से प्रतीक्षा कर रही है। वह केवल सो रही है। अत: यदि भारत को महान् बनाना है, उसका भविष्य उज्जल करना है, तो इसके लिए आवश्यकता है संगठन की, शक्ति-संग्रह की और बिखरी हुई इच्छाशक्ति को एकत्र कर उसमें समन्वय लाने की।

अथर्ववेद संहिता की एक विलक्षण ऋचा याद आ गयी, जिसमें कहा गया है, 'तुम सब लोग एकमन हो जाओ, सब लोग एक ही विचार के बन जाओ।' एकमन हो जाना ही समाजगठन का रहस्य है।.. बस, इच्छाशक्ति का संचय और उसका समन्वय कर उन्हें एकमुखी करना ही वह सारा रहस्य है।

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