कविता संग्रह >> कामायनी कामायनीजयशंकर प्रसाद
|
92 पाठक हैं |
दया, माया, ममता लो आज,
मधुरिमा लो, अगाध विश्वास,
हमारा हृदय-रत्न-निधि
स्वच्छ तुम्हारे लिए खुला है पास।
बनो संसृति के मूल रहस्य,
तुम्हीं से फैलेगी वह बेल,
विश्व-भर सौरभ से भर जाय
सुमन के खेलो सुंदर खेल।''
''और यह क्या तुम सुनते
नहीं विधाता का मंगल वरदान-
'शक्तिशाली हो, विजयी
बनो' विश्व में गूंज रहा जय-गान।
डरो मत, अरे अमृत संतान!
अग्रसर है मंगलमय वृद्धि,
पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र
खिंची आवेगी सकल समृद्धि।
देव-असफलताओं का ध्वंस
प्रचुर उपकरण जुटाकर आज,
पड़ा है बन मानव-सम्पत्ति
पूर्ण हो मन का चेतन-राज।
चेतना का सुंदर
इतिहास-अखिल मानव भावों का सत्य,
विश्व के हृदय-पटल पर
दिव्य-अक्षरों से अंकित हो नित्य।
विधाता की कल्याणी
सृष्टि, सफल हो इस भूतल पर पूर्ण,
पटें सागर, बिखरें
ग्रह-पुंज और ज्वालामुखियां हों चूर्ण।
उन्हें चिनगारी सदृश
सदर्प कुचलती रहे खड़ी सानंद,
आज से मानवता कीर्ति
अनिल, भू-जल में रहें न बंद।
जलधि के फूटें कितने
उत्स-द्वीप-कच्छप डूबे-उतरायें,
किन्तु वह खड़ी रहे
दृढ़-मूर्ति अम्युदय का कर रही उपाय।
विश्व की दुर्बलता बल
बने, पराजय का बढ़ता व्यापार-
हंसाता रहे उसे सविलास
शक्ति का क्रीड़ामय संचार।
शक्ति के विद्युत्कण जो
व्यस्त विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय,
समन्वय उसका करे समस्त
विजयिनी मानवता हो जाय!''
0 0 0
|