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उपन्यास >> कंकाल कंकालजयशंकर प्रसाद
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कंकाल भारतीय समाज के विभिन्न संस्थानों के भीतरी यथार्थ का उद्घाटन करता है। समाज की सतह पर दिखायी पड़ने वाले धर्माचार्यों, समाज-सेवकों, सेवा-संगठनों के द्वारा विधवा और बेबस स्त्रियों के शोषण का एक प्रकार से यह सांकेतिक दस्तावेज हैं।
निंरजन
की ओर देखते हुए क्षण-भर चुप रहकर गोस्वामी कृष्णशरण ने कहा, 'अपनी
असावधानी तो मैं न कहूँगा निरंजन! एक दिन मंगलदेव की प्रार्थना से अपने
विचारों को उद्घोषित करने के लिए मैंने इस कल्याण की व्यवस्था की थी। उसी
दिन से मेरी टेकरी में भीड़ होने लगी। जिन्हें आवश्यकता है, दुःख है, अभाव
है, वे मेरे पास आने लगे। मैंने किसी को बुलाया नहीं। अब किसी को हटा भी
नहीं सकता।'
'तब आप यह नहीं मानते कि
संसार में मानसिक दुःख से पीड़ित प्राणियों को इस संदेश से परिचित कराने
की आवश्यकता है?'
'है, किन्तु मैं आडम्बर
नहीं चाहता। व्यक्तिगत श्रद्धा से जितना जो कर सके, उतना ही पर्याप्त है।'
'किन्तु यह अब एक परिवार
बन गया है, इसकी कोई निश्चित व्यवस्था करनी होगी।'
निरंजन
ने यहाँ का सब समाचार लिखते हुए किशोरी को यह भी लिखा था- 'अपने और उसके
पाप-चिह्न विजय का जीवन नहीं के बराबर है। हम दोनों को संतोष करना चाहिए
और मेरी भी यही इच्छा है कि अब भगवद्भजन करूँ। मैं भारत-संघ के संगठन में
लगा हूँ, विजय को खोजकर उसे और भी संकट में डालना होगा। तुम्हारे लिए भी
संतोष को छोड़कर दूसरा कोई उपाय नहीं।'
पत्र पाकर किशोरी खूब
रोई।
श्रीचन्द्र
अपनी सारी कल्पनाओं पर पानी फिरते देखकर किशोरी की ही चापलूसी करने लगा।
उसकी वह पंजाब वाली चन्दा अपनी लड़की को लेकर चली गयी, क्योंकि ब्याह होना
असम्भव था।
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