उपन्यास >> नदी के द्वीप नदी के द्वीपसच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय
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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।
रेखा ने फिर कहा, “डा. भुवन, ही'ज़ ए वेरी फाइन मैन।”
गौरा ने कहा, “चाय ठण्डी हो जाएगी। चन्द्र जी को बुला लूँ।”
रेखा
ने मुस्करा कर कहा, “आइ'ल टेक द हिंट। लेकिन एक बात कह ही डालूँ - क्योंकि
फिर शायद न कह सकूँ - या मौका न मिले। चन्द्र ने आपसे क्या मेरे बारे में
कुछ कहा है, यह नहीं पूछूँगी - कहा ही होगा। क्या, वह भी नहीं पूछूँगी।
अपनी ही ओर से कहूँ - मेरे कारण डा. भुवन का अहित, जहाँ तक हो सकेगा, मैं
नहीं होने दूँगी। चाहती हूँ कि विश्वास के साथ कह सकूँ कि बिल्कुल नहीं
होने दूँगी, पर भीतर वह निश्चय नहीं पाती, और झूठा आश्वासन नहीं देना
चाहती-खासकर आपको।”
गौरा ने तनिक उदासीनता चेहरे पर लाते हुए कहा, “यह सब आप मुझे क्यों कहती
हैं, रेखा जी?”
“क्यों,
यह तो नहीं जानती। पर कह देना चाहती हूँ - भविष्य में शायद-कभी आपको यह
याद करने की ज़रूरत पड़े। किसी के निजी जीवन में - भावना-जगत् में
हस्तक्षेप करना मैं कभी नहीं चाहती, गौरा; मैंने जो-कुछ कहा है, कुछ जानने
के लिए नहीं, केवल अपनी बात कहने के लिए। फिर भी अगर कोई ऐसा स्थल छू गयी
हूँ जिससे मुझे दूर रहना चाहिए था, तो-क्षमा चाहती हूँ।”
सहसा
खड़ी होकर रेखा गौरा के पास चली आयी; दोनों हाथ उसके कन्धे पर रखकर उसने
धीरे से पुकारा, “गौरा!” गौरा ने आँख उठायी; दोनों की आँखें मिलीं और देर
तक मिली रहीं। फिर रेखा ने धीमे स्वर में कहा, “कभी हम किसी से मिलते हैं
और तय कर लेते हैं कि हम अजनबी नहीं हैं; पर उससे ज़रूरी नहीं है कि बात
करना सहज ही हो जाये।” वह कुछ रुकी, कुछ अनिश्चित स्वर में उसने कहा, “है
न?” फिर उसके हाथ धीरे-धीरे खिसकते हुए हट चले; गौरा ने दाहिना हाथ उठाकर
उसका हाथ पकड़ लिया और उसे थामे उठ खड़ी हुई। आमने-सामने खड़े दोनों की
आँखें एक बार फिर मिलीं। फिर रेखा सहसा मुड़कर बाहर के कमरे की ओर चली
गयी। क्षण-भर बाद एक नज़र मेज़ पर लगी हुई चीज़ों पर दौड़ाते हुए और उसके
द्वारा मानो साधारण के स्तर पर उतरते हुए गौरा ने दो-तीन कदम आगे बढ़कर
आवाज़ दी, “आइये, चाय तैयार है।”
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