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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


उस दिन भाषण कर्त्ताओं के अभाव में अपूर्व को भी दो-चार बातें कहनी पड़ी थीं। बोलने की आदत तो थी नहीं और जो कुछ कहा भी उसको ठीक तरह से न कह सका। इसके लिए वह मन-ही-मन लज्जित हुआ।

लेकिन आज अचानक खबर मिली कि उस दिन की सभा निष्फल नहीं हुई। बल्कि उसका फल यह हुआ कि अगली सभा में सभी कारखानों में काम बंद करके कारीगरों, मजदूरों के दलों ने उपस्थित होने का संकल्प कर लिया है - तब गर्व तथा आत्मप्रशंसा के आनंद से उसका हृदय रह-रहकर फूल उठने लगा। उस दिन वह अच्छी तरह भाषण न दे सका था। लेकिन प्रशंसा के साथ आगामी सभा में भाषण देने का निमंत्रण पाकर वह चंचल हो उठा।

दोपहर के भोजन पर उसने रामदास को यह बात बता दी। एक दिन अपूर्व के लिए रामदास ने भारती का अपमान किया था, उस दिन से भारती के संबंध में उससे बात करते हुए अपूर्व को संकोच होता था। इन दिनों अपूर्व उस गृहहीन लड़की से चुपके-चुपके जीवन में कितने बड़े काव्य, कितने बड़े सुख-दु:ख के इतिहास का निर्माण कर चुका था, इसकी उसे कोई सूचना नहीं दी थी। आज पुलक और रोमांच की अधिकता से अपूर्व ने सारी बातें बताईं। भारती, सुमित्रा, डॉक्टर साहब, नवतारा। यहां तक कि उस शराबी का भी उल्लेख कर दिया। अपने पथ के दावेदार के कार्यक्रमों और उपदेशों का वर्णन करते हुए उस दिन लाइन वाले कमरे के अभियान का विवरण भी दे दिया।

रामदास ने कोई प्रश्न नहीं किया। एक दिन देश के इस व्यक्ति को जेल जाना पड़ा है, बेंतों की मार खानी पड़ी है और न जाने क्या-क्या दु:ख भोगने पड़े हैं। केवल एक दिन के अतिरिक्त और किसी दिन रामदास ने कोई बात नहीं बताई। आज सुमित्रा के पत्र को रामदास के सामने रखकर स्वयं को पथ के दावेदारों का एक विशिष्ट सदस्य बताकर उसने देश के काम के लिए नियोजित अपने जीवन का वर्णन किया।

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