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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


सुमित्रा विस्मित होकर मधुर स्वर में बोली, “पिस्तौल के बल पर सभा को भंग कर देना क्या कानून-संगत है? बेकार खून-खराबा मैं नहीं चाहती। लेकिन इस बात की आप पूरी शक्ति से घोषणा कर दें कि आज के अपमान को मजदूर बिल्कुल न भूलें।”

पथ के दावेदार के जो चार-पांच पुरुष सदस्य मंच पर बैठे थे, उनके चेहरों से ही पता चल रहा था कि वह बहुत ही मामूली और निम्न श्रेणी के लोग हैं। शायद कारीगर या इसी प्रकार के लोग थे। अपूर्व नया होते हुए भी समिति का शिक्षित तथा विशिष्ट सदस्य था। इतनी बड़ी भीड़ को सम्बोधित करने का भार इसीलिए उस पर आ पड़ा था। उसने सूखे गले से कहा, “मैं तो हिंदी अच्छी तरह बोल नहीं सकता।”

सुमित्रा बोल नहीं सकती थीं। विवश होकर कहने लगीं, “जो कुछ भी जानते हैं वही दो शब्दों में कह दीजिए अपूर्व बाबू! समय बर्बाद मत कीजिए।”

अपूर्व ने सबकी ओर देखा। भारती मुंह फेरे खड़ी थी इसलिए उसका अभिमत समझ में नहीं आया। लेकिन गोरे नायक के मन का भाव समझ में आ गया। अपूर्व बोलने के लिए उठ खड़ा हुआ। उसके होंठ कांप उठे, लेकिन उन कांपते होंठों से बंगला, अंग्रेजी या हिंदी किसी भी भाषा का एक भी शब्द नहीं निकला।

तलवलकर उठ खड़ा हुआ। सुमित्रा की ओर देखकर बोला, “मैं बाबू जी का मित्र हूं और हिंदी जानता हूं। यदि आज्ञा हो तो मैं वक्तव्य चिल्ला-चिल्लाकर सबको सुना दूं।”

भारती ने मुंह घूमा कर देखा - सुमित्रा आश्चर्य से देखती चुपचाप बैठी रहीं। और उन दोनों नारियों की घूरती आंखों के सामने लज्जित, अभिभूत, वाक्यहीन अपूर्व स्तब्ध, मुंह नीचा किए जड़वत बैठ गया।

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