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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


गाड़ी में से सुमित्रा ने कहा, “तुम लोग जाओ।”

भारती ने फिर कहा, “चलिए।”

अपूर्व बोला, “पथ के दावेदारों में मेरे लिए स्थान नहीं है।”

भारती उसका हाथ पकड़ने जा रही थी लेकिन अपने-आपको संभालकर एक पल उसके चेहरे पर आंखें टिकाकर धीमे से बोली, “पथ के दावेदारों में स्थान भले ही न हो लेकिन और एक दावे से आपको वंचित कर सके संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है अपूर्व बाबू!”

गाड़ी में से सुमित्रा ने झल्लाकर पूछा, “तुम लोगों के आने में क्या देर होगी भारती?”

भारती ने हाथ हिलाकर गाड़ीवान को जाने का इशारा करते हुए कहा, “आप जाइए। हम लोग पैदल जाएंगे।”

रास्ते में चलते-चलते अपूर्व ने अचानक कहा, “भारती तुम मेरे साथ चलो न।”

भारती ने कहा, “साथ ही तो चल रही हूं।”

अपूर्व बोला, “यह बात नहीं, तलवलकर की पत्नी से जाकर क्या कहूंगा? मेरी समझ में नहीं आ रहा। रामदास को यहां लाने की दुर्बुद्धि क्यों हुई?”

भारती चुप रही।

अपूर्व कहता गया, “अचानक कितना बड़ा अनर्थ हो गया। अब अपना कर्त्तव्य मेरी समझ में नहीं आ रहा।'

भारती फिर भी मौन रही।

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